चुनावी सुधार और राजनीतिक दल कानून (Electoral Reforms & Political Party Law): भारत में लोकतंत्र, पारदर्शिता और निष्पक्ष चुनाव की कानूनी यात्रा
भूमिका
लोकतंत्र की आत्मा स्वतंत्र, निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव में निहित होती है। भारत, जो दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, वहाँ चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन का माध्यम नहीं, बल्कि जन-इच्छा की अभिव्यक्ति का संवैधानिक उपकरण है।
लेकिन समय के साथ चुनावी प्रक्रिया में भ्रष्टाचार, धनबल, बाहुबल, मीडिया प्रभाव, राजनीतिक चंदे की अपारदर्शिता और तकनीकी विवाद जैसी समस्याएँ उभरती गईं। इन्हीं चुनौतियों से निपटने के लिए भारत में चुनावी सुधार (Electoral Reforms) और राजनीतिक दलों को विनियमित करने वाले कानून विकसित हुए।
यह लेख भारत में चुनावी सुधारों, आदर्श आचार संहिता, राजनीतिक चंदे की पारदर्शिता तथा EVM–VVPAT विवाद का विस्तृत कानूनी विश्लेषण प्रस्तुत करता है।
1. भारतीय चुनावी व्यवस्था का संवैधानिक ढांचा
भारतीय संविधान चुनावों की नींव निम्न प्रावधानों पर रखता है:
अनुच्छेद 324
- चुनाव आयोग (Election Commission of India – ECI) की स्थापना।
- संसद, राज्य विधानसभाओं, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनावों का पर्यवेक्षण, निर्देशन और नियंत्रण।
अनुच्छेद 325–329
- सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार।
- चुनावी विवादों के लिए न्यायिक सीमाएँ।
चुनाव आयोग को एक स्वतंत्र संवैधानिक संस्था का दर्जा देकर चुनावों की निष्पक्षता सुनिश्चित की गई।
2. राजनीतिक दलों का कानूनी ढांचा
जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 (Representation of the People Act, 1951)
- राजनीतिक दलों का पंजीकरण (धारा 29A)।
- उम्मीदवारों की अयोग्यता।
- चुनावी अपराधों की परिभाषा।
राजनीतिक दलों के दायित्व
- संविधान और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति निष्ठा।
- आंतरिक लोकतंत्र और पारदर्शिता।
- चुनाव आयोग को वित्तीय विवरण प्रस्तुत करना।
3. चुनावी सुधारों की आवश्यकता
चुनावी सुधारों की मांग निम्न कारणों से उत्पन्न हुई:
- धनबल और आपराधिक पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवार।
- मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए लालच और धमकी।
- राजनीतिक चंदे की गोपनीयता।
- तकनीकी अविश्वास (EVM विवाद)।
इन समस्याओं ने लोकतंत्र की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगाया।
4. चुनावी भ्रष्टाचार: अवधारणा और प्रकार
चुनावी भ्रष्टाचार क्या है?
जनप्रतिनिधित्व अधिनियम के अंतर्गत वे सभी कृत्य, जो मतदाता की स्वतंत्र इच्छा को प्रभावित करें, चुनावी भ्रष्टाचार माने जाते हैं।
मुख्य प्रकार
- रिश्वत देना या लेना (धन, वस्तु, सुविधा)।
- धमकी या दबाव।
- धर्म, जाति या भाषा के आधार पर वोट माँगना।
- झूठा प्रचार और फर्जी समाचार।
- मतदान में बाधा डालना।
दंड
- चुनाव निरस्त।
- उम्मीदवार की अयोग्यता।
- कारावास और जुर्माना।
5. आदर्श आचार संहिता (Model Code of Conduct – MCC)
परिचय
आदर्श आचार संहिता चुनाव आयोग द्वारा जारी नैतिक दिशानिर्देशों का संकलन है, जो चुनाव की घोषणा के साथ लागू होती है।
मुख्य प्रावधान
- सरकारी संसाधनों का दुरुपयोग निषिद्ध।
- नई योजनाओं और घोषणाओं पर रोक।
- मतदाताओं को प्रभावित करने वाले उपहार, धन या वादे प्रतिबंधित।
- भाषणों में घृणा और विभाजनकारी भाषा वर्जित।
कानूनी स्थिति
हालाँकि MCC कोई विधायी कानून नहीं है, लेकिन:
- चुनाव आयोग इसे संवैधानिक शक्ति के तहत लागू करता है।
- उल्लंघन पर चेतावनी, प्रतिबंध और FIR तक की कार्रवाई।
सुप्रीम कोर्ट ने MCC को निष्पक्ष चुनाव का आवश्यक उपकरण माना है।
6. राजनीतिक चंदा और पारदर्शिता नियम
चुनौती
भारत में चुनाव अत्यंत खर्चीले हो गए हैं। राजनीतिक दलों को मिलने वाला चंदा:
- अक्सर गोपनीय रहता था।
- इससे नीतिगत भ्रष्टाचार की आशंका बढ़ती थी।
6.1 चुनावी चंदे के स्रोत
- व्यक्तिगत दान।
- कॉरपोरेट चंदा।
- सदस्यता शुल्क।
6.2 चुनावी बांड (Electoral Bonds)
परिचय
- 2018 में शुरू की गई योजना।
- बैंक के माध्यम से गुमनाम चंदा।
विवाद
- दानकर्ता की पहचान सार्वजनिक न होना।
- सत्तारूढ़ दल को असमान लाभ।
न्यायिक हस्तक्षेप
- सुप्रीम कोर्ट ने पारदर्शिता और मतदाता के जानने के अधिकार पर जोर दिया।
- योजना की संवैधानिक वैधता पर गंभीर प्रश्न उठे।
6.3 पारदर्शिता के लिए अन्य नियम
- राजनीतिक दलों को वार्षिक ऑडिट रिपोर्ट देना।
- ₹20,000 से अधिक दान का विवरण।
- उम्मीदवारों को खर्च का लेखा प्रस्तुत करना।
7. चुनावी सुधारों में न्यायपालिका की भूमिका
एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) मामला
- उम्मीदवारों को अपनी आपराधिक पृष्ठभूमि, संपत्ति और शिक्षा घोषित करना अनिवार्य।
लिली थॉमस बनाम भारत संघ
- दोषसिद्ध सांसद/विधायक की तत्काल अयोग्यता।
न्यायपालिका ने चुनावी शुचिता को मजबूत करने में निर्णायक भूमिका निभाई।
8. EVM और VVPAT विवाद
EVM (Electronic Voting Machine)
- तेज, किफायती और त्रुटिरहित मतदान का दावा।
- फर्जी मतदान पर नियंत्रण।
VVPAT (Voter Verifiable Paper Audit Trail)
- मतदाता को यह देखने का अधिकार कि उसका वोट किसे गया।
- पारदर्शिता बढ़ाने का प्रयास।
8.1 विवाद के मुख्य बिंदु
- मशीनों में छेड़छाड़ की आशंका।
- 100% VVPAT मिलान की मांग।
- तकनीकी विशेषज्ञों और राजनीतिक दलों की शंकाएँ।
8.2 न्यायालय और चुनाव आयोग का रुख
- सुप्रीम कोर्ट ने सीमित VVPAT सत्यापन को पर्याप्त माना।
- चुनाव आयोग ने EVM को छेड़छाड़-रोधी बताया।
यह विवाद लोकतंत्र में विश्वास बनाम तकनीक की बहस को दर्शाता है।
9. सुधार की दिशा में सुझाव
- राजनीतिक दलों में आंतरिक लोकतंत्र।
- चुनावी खर्च की वास्तविक सीमा।
- चंदे की पूर्ण पारदर्शिता।
- EVM–VVPAT पर स्वतंत्र तकनीकी ऑडिट।
- चुनाव आयोग को और अधिक दंडात्मक शक्तियाँ।
10. लोकतंत्र और मतदाता की भूमिका
चुनावी सुधार केवल कानून से नहीं, बल्कि:
- जागरूक मतदाता,
- निष्पक्ष मीडिया,
- और सक्रिय नागरिक समाज से संभव हैं।
मतदाता का सूचित और निर्भीक निर्णय लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत है।
निष्कर्ष
भारत में चुनावी सुधार और राजनीतिक दल कानून लोकतंत्र को मजबूत करने की सतत प्रक्रिया है। चुनावी भ्रष्टाचार पर नियंत्रण, आदर्श आचार संहिता का पालन, राजनीतिक चंदे में पारदर्शिता और EVM–VVPAT जैसे तकनीकी सुधार—ये सभी प्रयास निष्पक्ष और विश्वसनीय चुनाव सुनिश्चित करने के लिए हैं।
हालाँकि चुनौतियाँ बनी हुई हैं, लेकिन संवैधानिक संस्थाएँ, न्यायपालिका और नागरिक मिलकर एक ऐसे चुनावी तंत्र की ओर अग्रसर हैं, जो जनता के विश्वास, लोकतांत्रिक मूल्यों और संविधान की आत्मा के अनुरूप हो।