गवाह के मुकरने पर भी न्याय की जीत इलाहाबाद हाई कोर्ट का ऐतिहासिक दृष्टिकोण: कानून, साक्ष्य और न्यायिक विवेक का संतुलन
प्रस्तावना
भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली की संरचना तीन प्रमुख स्तंभों पर आधारित है— जांच (Investigation), अभियोजन (Prosecution) और न्यायनिर्णयन (Adjudication)। इन तीनों को जोड़ने वाला केंद्रीय तत्व है साक्ष्य (Evidence), और साक्ष्य की आत्मा है गवाह (Witness)। गवाहों के बयान न केवल अपराध की घटना-श्रृंखला को स्पष्ट करते हैं, बल्कि अपराधी की पहचान, अपराध के तरीके (Modus Operandi), उद्देश्य (Motive) और परिस्थितिजन्य कड़ियों (Circumstantial Links) को भी स्थापित करते हैं।
किन्तु व्यावहारिक न्यायिक प्रक्रिया में एक गंभीर समस्या बार-बार सामने आती है— गवाहों का मुकर जाना (Hostile Witness)। भय, सामाजिक दबाव, पारिवारिक संबंध, समझौते, धमकी, आर्थिक प्रलोभन, तथा आपराधिक प्रभाव जैसे कारणों से गवाह अपने पूर्व बयानों से पलट जाते हैं। परिणामस्वरूप अभियोजन का मामला कमजोर होता है और कई बार दोषी व्यक्ति दंड से बच निकलता है। यही कारण है कि भारतीय न्यायपालिका लंबे समय से इस प्रश्न से जूझती रही है कि—
क्या केवल गवाह के मुकरने मात्र से संपूर्ण अभियोजन साक्ष्य अविश्वसनीय हो जाता है?
इसी संदर्भ में इलाहाबाद हाई कोर्ट का हालिया निर्णय एक ऐतिहासिक न्यायिक दृष्टांत (Judicial Precedent) के रूप में उभरकर सामने आया है, जिसमें न्यायालय ने स्पष्ट रूप से यह सिद्धांत प्रतिपादित किया कि—
“केवल इस आधार पर कि कोई गवाह अपने बयान से मुकर गया है, उसके संपूर्ण बयान को पूर्णतः अस्वीकार नहीं किया जा सकता, यदि उसके कथनों का समर्थन अन्य स्वतंत्र, विश्वसनीय एवं वैज्ञानिक साक्ष्यों से हो रहा हो।”
यह निर्णय केवल एक आपराधिक मामले तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872, आपराधिक न्यायशास्त्र, पीड़ित-केंद्रित न्याय (Victim-Centric Justice) और न्यायिक विवेक (Judicial Discretion) के क्षेत्र में दूरगामी प्रभाव रखने वाला निर्णय है।
मामला: विवाहिता की हत्या और न्यायिक प्रक्रिया
यह प्रकरण उत्तर प्रदेश के अलीगढ़/बुलंदशहर क्षेत्र से संबंधित है, जहाँ एक विवाहिता महिला ममता की विषाक्त पदार्थ देकर हत्या कर दी गई।
प्राथमिकी (FIR) का विवरण
30 जुलाई 2019 को चोखेलाल (निवासी – चौगानपुर, हरदुआगंज, अलीगढ़) द्वारा थाना रामघाट, जनपद बुलंदशहर में प्राथमिकी दर्ज कराई गई। उन्होंने बताया कि उन्होंने अपनी दो बेटियों— ममता और चंद्रावती— की शादी क्रमशः तेजवीर और राकेश पुत्र नानकराम से की थी।
घटना के दिन छोटी बेटी चंद्रावती ने फोन पर सूचना दी कि—
“बहन ममता को उसके पति, सास, ससुर और ननद ने ज़हर दे दिया है।”
परिजन तत्काल मौके पर पहुंचे, किन्तु तब तक ज़हर शरीर में फैल चुका था और ममता की स्थिति अत्यंत गंभीर हो चुकी थी।
फोरेंसिक साक्ष्य और वैज्ञानिक प्रमाण
गाजियाबाद स्थित फोरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला (FSL) की 8 अगस्त 2019 की रिपोर्ट में यह स्पष्ट रूप से स्थापित हुआ कि—
विसरा (Viscera) में ऑर्गेनो-क्लोरो कीटनाशक (Organochlorine Pesticide) की उपस्थिति पाई गई।
यह वैज्ञानिक निष्कर्ष अत्यंत महत्वपूर्ण था, क्योंकि इसने यह स्थापित कर दिया कि मृत्यु न प्राकृतिक थी, न आकस्मिक, बल्कि विषाक्त पदार्थ सेवन से हुई हत्या (Poisoning Homicide) थी।
यहाँ न्यायिक दृष्टि से दो महत्वपूर्ण बिंदु उभरते हैं—
- वैज्ञानिक साक्ष्य की स्वतंत्र प्रकृति (Independence of Forensic Evidence)
- मानवीय गवाहों की अनिश्चितता के बावजूद वैज्ञानिक प्रमाण की वस्तुनिष्ठता (Objectivity of Scientific Evidence)
यही वह आधार बना, जिस पर न्यायालय ने अपने निर्णय को टिकाया।
गवाह का मुकरना और अभियोजन की चुनौती
विचारण के दौरान प्रमुख गवाह अपने पूर्व बयानों से मुकर गया। भारतीय आपराधिक मुकदमों में यह एक सामान्य परिघटना बन चुकी है। विधिक दृष्टि से यह स्थिति भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 154 के अंतर्गत आती है, जहाँ अभियोजन को अपने ही गवाह से प्रतिपरीक्षा (Cross-Examination) की अनुमति दी जाती है।
परंतु महत्वपूर्ण प्रश्न यह होता है कि—
क्या Hostile Witness होने से संपूर्ण अभियोजन कहानी स्वतः अविश्वसनीय हो जाती है?
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इस प्रश्न का उत्तर स्पष्ट शब्दों में दिया— नहीं।
न्यायिक सिद्धांत: Hostile Witness Doctrine
भारतीय न्यायशास्त्र में यह स्थापित सिद्धांत है कि—
- Hostile Witness का बयान पूर्णतः त्याज्य नहीं होता
- उसके बयान के विश्वसनीय अंशों को स्वीकार किया जा सकता है
- यदि उसके कथनों की पुष्टि अन्य साक्ष्यों से होती है, तो उन पर भरोसा किया जा सकता है
यह सिद्धांत पूर्व में सुप्रीम कोर्ट द्वारा भी अनेक मामलों में प्रतिपादित किया गया है, जैसे—
- State of U.P. v. Ramesh Prasad Misra
- Koli Lakhmanbhai Chanabhai v. State of Gujarat
- Khujji v. State of Madhya Pradesh
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इन्हीं सिद्धांतों को वर्तमान मामले में व्यवहारिक रूप से लागू किया।
न्यायालय का दृष्टिकोण: साक्ष्य का समेकित मूल्यांकन (Holistic Appreciation of Evidence)
न्यायालय ने यह कहा कि आपराधिक न्याय केवल एकल साक्ष्य पर आधारित नहीं होता, बल्कि यह—
सभी साक्ष्यों के समेकित मूल्यांकन (Cumulative Assessment) पर आधारित होता है।
यहाँ तीन प्रकार के साक्ष्य निर्णायक बने—
- वैज्ञानिक साक्ष्य (Forensic Evidence)
- परिस्थितिजन्य साक्ष्य (Circumstantial Evidence)
- पूर्व कथन व अन्य सहायक साक्ष्य (Corroborative Evidence)
इन तीनों ने मिलकर अपराध की श्रृंखला (Chain of Circumstances) को पूर्ण किया, जो भारतीय आपराधिक विधि में Circumstantial Evidence Doctrine के अंतर्गत एक सुसंगत सिद्धांत है।
विधिक महत्व (Legal Significance)
यह निर्णय कई स्तरों पर विधिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है—
1. साक्ष्य कानून की व्याख्या
यह निर्णय भारतीय साक्ष्य अधिनियम की आधुनिक व्याख्या प्रस्तुत करता है, जहाँ गवाह-केंद्रित न्याय के बजाय साक्ष्य-केंद्रित न्याय (Evidence-Centric Justice) को प्राथमिकता दी गई।
2. पीड़ित-केंद्रित न्यायशास्त्र (Victim-Centric Jurisprudence)
यह निर्णय यह संदेश देता है कि न्यायिक प्रणाली केवल अभियुक्त के अधिकारों तक सीमित नहीं है, बल्कि पीड़ित और समाज के अधिकार भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।
3. आपराधिक न्याय प्रणाली की विश्वसनीयता
यदि केवल गवाह के मुकरने से अपराधी बच जाए, तो न्याय प्रणाली की विश्वसनीयता समाप्त हो जाती है। यह निर्णय उस क्षरण को रोकने की दिशा में एक मजबूत कदम है।
सामाजिक प्रभाव (Societal Impact)
यह निर्णय समाज को यह संदेश देता है कि—
- धमकी और दबाव से न्याय को पराजित नहीं किया जा सकता
- वैज्ञानिक और वस्तुनिष्ठ साक्ष्य अंततः सत्य को उजागर करते हैं
- न्यायपालिका केवल तकनीकीताओं पर नहीं, बल्कि न्याय के मूल उद्देश्य पर आधारित होती है
निष्कर्ष
इलाहाबाद हाई कोर्ट का यह निर्णय भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली में एक न्यायिक मील का पत्थर (Judicial Milestone) है। यह निर्णय यह स्थापित करता है कि—
न्याय केवल गवाहों की भाषा पर निर्भर नहीं करता, बल्कि साक्ष्यों की समग्र संरचना, वैज्ञानिक प्रमाणों और न्यायिक विवेक पर आधारित होता है।
यह निर्णय यह भी स्पष्ट करता है कि—
- Hostile Witness न्याय की हार नहीं है
- सत्य का अंतिम आधार वैज्ञानिक और वस्तुनिष्ठ साक्ष्य होते हैं
- न्यायपालिका का दायित्व केवल कानून लागू करना नहीं, बल्कि न्याय सुनिश्चित करना है
अंततः यह कहा जा सकता है कि यह निर्णय तकनीकी विधिकता (Technical Legality) और नैतिक न्याय (Substantive Justice) के बीच एक संतुलित सेतु का निर्माण करता है, जो भारतीय न्यायशास्त्र को अधिक मानवीय, वैज्ञानिक और न्यायोचित बनाता है।