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खनन पट्टा नीलामी नियमों की स्पष्ट व्याख्या: ‘दो वर्ष का विस्तार अधिकार है, विकल्प नहीं’ — बॉम्बे हाईकोर्ट का निर्णायक निर्णय

खनन पट्टा नीलामी नियमों की स्पष्ट व्याख्या: ‘दो वर्ष का विस्तार अधिकार है, विकल्प नहीं’ — बॉम्बे हाईकोर्ट का निर्णायक निर्णय

भूमिका

      खनन क्षेत्र भारत की औद्योगिक और बुनियादी ढांचे की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। सीमेंट, इस्पात और ऊर्जा जैसे क्षेत्रों के लिए खनिजों की उपलब्धता सीधे राष्ट्रीय विकास से जुड़ी हुई है। इसी पृष्ठभूमि में खनिजों के आवंटन हेतु Mineral (Auction) Rules, 2015 को पारदर्शिता, प्रतिस्पर्धा और निश्चितता सुनिश्चित करने के उद्देश्य से अधिसूचित किया गया।

     हालाँकि, व्यावहारिक स्तर पर खनन पट्टों के निष्पादन में अक्सर पर्यावरणीय स्वीकृतियाँ, भूमि हस्तांतरण, वन मंज़ूरी और प्रशासनिक विलंब जैसी बाधाएँ सामने आती हैं। इन्हीं जटिलताओं के संदर्भ में Bombay High Court ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण और दूरगामी प्रभाव वाला निर्णय दिया है, जिसने Rule 10(6) की व्याख्या को लेकर राज्य सरकारों के विवेकाधिकार की सीमाएँ स्पष्ट कर दी हैं।


मामले की पृष्ठभूमि

     यह मामला Dalmia Cement (Bharat) Limited द्वारा दायर एक रिट याचिका से उत्पन्न हुआ। याचिकाकर्ता को वर्ष 2019 में महाराष्ट्र के चंद्रपुर ज़िले में स्थित Gojoli Limestone Mineral Block के लिए नीलामी प्रक्रिया के तहत Preferred Bidder घोषित किया गया था।

      इसके पश्चात 10 सितंबर 2020 को राज्य सरकार द्वारा Letter of Intent (LOI) जारी किया गया, जिसकी वैधता अवधि तीन वर्ष थी, जिसे नियमों के अनुसार आगे दो वर्षों तक बढ़ाया जा सकता था।


विवाद का मूल प्रश्न

     याचिकाकर्ता कंपनी निर्धारित अवधि के भीतर खनन पट्टा निष्पादित नहीं कर सकी, जिसका कारण कंपनी के अनुसार उसके नियंत्रण से बाहर की परिस्थितियाँ थीं, जैसे—

  • वैधानिक स्वीकृतियों में विलंब
  • प्रशासनिक प्रक्रियाओं की जटिलता
  • पर्यावरण एवं वन संबंधी मंज़ूरियाँ

इन परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए कंपनी ने Rule 10(6) के दूसरे प्रावधान (Second Proviso) के अंतर्गत दो वर्षों के पूर्ण विस्तार की माँग की।


राज्य सरकार का दृष्टिकोण

महाराष्ट्र सरकार ने यह स्वीकार किया कि विलंब याचिकाकर्ता के नियंत्रण से बाहर था, किंतु इसके बावजूद उसने केवल 9 सितंबर 2025 तक ही LOI की वैधता बढ़ाई।

राज्य का तर्क था कि:

  • LOI की कुल अवधि (मूल + विस्तार) 5 वर्ष से अधिक नहीं हो सकती
  • अतः विस्तार “दो वर्ष तक” (up to two years) सीमित होना चाहिए

यही सीमित विस्तार याचिका का मुख्य विवाद बना।


न्यायालय के समक्ष प्रमुख विधिक प्रश्न

  1. क्या Rule 10(6) का दूसरा प्रावधान राज्य सरकार को दो वर्ष से कम अवधि का विस्तार देने का विवेकाधिकार देता है?
  2. क्या “further period of two years” का अर्थ “up to two years” लगाया जा सकता है?
  3. क्या राज्य सरकार की यह व्याख्या नियम के उद्देश्य और विधायी मंशा के अनुरूप है?

पीठ और सुनवाई

इस मामले की सुनवाई Justice Anil S. Kilor और Justice Rajnish R. Vyas की द्वि-सदस्यीय पीठ द्वारा की गई।


Rule 10(6) की न्यायालय द्वारा व्याख्या

न्यायालय ने शाब्दिक (Literal) और उद्देश्यपरक (Purposive)—दोनों प्रकार की व्याख्या अपनाई।

(i) भाषा की स्पष्टता

न्यायालय ने विशेष रूप से इस तथ्य पर ज़ोर दिया कि नियम में शब्द हैं—

“further period of two years”

और कहीं भी “up to two years” शब्दों का प्रयोग नहीं किया गया है।

न्यायालय ने कहा कि जब विधायिका ने जानबूझकर “up to” जैसे शब्दों का प्रयोग नहीं किया, तो न्यायालय या प्रशासन उन्हें जोड़ नहीं सकता।


(ii) विवेकाधिकार का अभाव

पीठ ने स्पष्ट कहा कि—

जब प्राधिकारी इस निष्कर्ष पर पहुँच जाता है कि विलंब Preferred Bidder के नियंत्रण से बाहर के कारणों से हुआ है,
तब दो वर्षों का विस्तार अनिवार्य (mandatory) हो जाता है,
न कि वैकल्पिक (discretionary)।

इस प्रकार राज्य सरकार के पास अवधि घटाने का कोई अधिकार नहीं है।


राज्य सरकार की दलील पर न्यायालय की प्रतिक्रिया

राज्य सरकार का यह तर्क कि LOI की कुल अवधि पाँच वर्ष से अधिक नहीं हो सकती, न्यायालय ने अस्वीकार कर दिया।

न्यायालय ने कहा—

  • तीन वर्ष की मूल अवधि और
  • दो वर्ष की विस्तार अवधि

एक-दूसरे से स्वतंत्र नहीं, बल्कि नियम की संरचना के अनुसार परस्पर पूरक हैं।


Rule 10(6) का उद्देश्य

न्यायालय ने स्पष्ट किया कि Rule 10(6) का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि Preferred Bidder

  • Mine Development and Production Agreement निष्पादित कर सके
  • आवश्यक वैधानिक और पर्यावरणीय स्वीकृतियाँ प्राप्त कर सके
  • केवल प्रक्रियात्मक विलंब के कारण नीलामी अधिकार से वंचित न हो

यदि विस्तार अवधि को मनमाने ढंग से घटा दिया जाए, तो यह उद्देश्य ही विफल हो जाएगा।


न्यायालय का निर्णायक अवलोकन

न्यायालय ने कहा—

“…once the authority is satisfied that there are reasons for delay which were beyond the control of the Preferred Bidder, the period extendable shall be of two years, and the same cannot be curtailed…”

यह टिप्पणी न केवल इस मामले तक सीमित है, बल्कि भविष्य के सभी खनन नीलामी मामलों में मार्गदर्शक सिद्धांत बनेगी।


निर्णय (Final Order)

  • दिनांक 1 सितंबर 2025 का वह पत्र, जिसमें विस्तार सीमित किया गया था, रद्द (quashed) किया गया।
  • दिनांक 4 अप्रैल 2025 का पूर्व पत्र भी उस सीमा तक निरस्त किया गया, जहाँ दो वर्ष से कम विस्तार दिया गया था।
  • राज्य सरकार को निर्देश दिया गया कि वह नियमों के अनुरूप पूर्ण दो वर्ष का विस्तार प्रदान करे।

निर्णय का व्यापक प्रभाव

(i) प्रशासनिक विवेक पर नियंत्रण

यह निर्णय स्पष्ट करता है कि जहाँ नियम स्पष्ट हों, वहाँ प्रशासनिक विवेक की कोई गुंजाइश नहीं।

(ii) निवेशकों के लिए कानूनी निश्चितता

खनन और अवसंरचना क्षेत्र के निवेशकों को यह भरोसा मिला कि वैधानिक नियमों की मनमानी व्याख्या नहीं की जा सकती।

(iii) Rule of Law की पुष्टि

न्यायालय ने यह दोहराया कि राज्य भी कानून के अधीन है, न कि उसके ऊपर।


निष्कर्ष

    Dalmia Cement (Bharat) Limited v. Union of India & Ors. का यह निर्णय केवल एक कंपनी के अधिकारों की रक्षा नहीं करता, बल्कि यह Mineral (Auction) Rules, 2015 की आत्मा को संरक्षित करता है।

यह फैसला एक स्पष्ट संदेश देता है—

“जहाँ कानून ‘दो वर्ष’ कहता है, वहाँ ‘कुछ महीने’ नहीं चलेंगे।”

      यह निर्णय भविष्य में खनन पट्टा नीलामी से जुड़े सभी विवादों में एक मील का पत्थर (landmark precedent) के रूप में उद्धृत किया जाएगा।


मामले का विवरण

Case Title: Dalmia Cement (Bharat) Limited v. Union of India & Ors.
Writ Petition No.: 5113 of 2025
न्यायालय: बॉम्बे हाईकोर्ट