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कोविड-19 में रद्द हुई उड़ानें और उपभोक्ता अधिकार: ‘फोर्स मेज्योर’ बनाम ‘सेवा में कमी’ का कानूनी संघर्ष

कोविड-19 में रद्द हुई उड़ानें और उपभोक्ता अधिकार: ‘फोर्स मेज्योर’ बनाम ‘सेवा में कमी’ का कानूनी संघर्ष

प्रस्तावना

        कोविड-19 महामारी ने न केवल वैश्विक स्वास्थ्य व्यवस्था को हिलाकर रख दिया, बल्कि व्यापार, परिवहन और उपभोक्ता अधिकारों की बुनियाद को भी गंभीर चुनौती दी। भारत में मार्च 2020 से लागू हुए संपूर्ण लॉकडाउन के दौरान हवाई सेवाएं अचानक बंद कर दी गईं। लाखों यात्रियों की पहले से बुक की गई उड़ानें रद्द हो गईं। इस अप्रत्याशित स्थिति में सबसे बड़ा प्रश्न यह उठा कि क्या एयरलाइंस यात्रियों को उनके टिकट का पूरा पैसा लौटाने के लिए बाध्य हैं, या महामारी को ‘फोर्स मेज्योर’ बताकर वे अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो सकती हैं?

एयरलाइंस ने बड़े पैमाने पर यात्रियों को नकद रिफंड देने के बजाय ‘क्रेडिट शेल’, री-बुकिंग वाउचर या भविष्य की यात्रा का विकल्प थमा दिया। कई मामलों में यात्रियों की स्पष्ट असहमति के बावजूद भी पैसा वापस नहीं किया गया। यहीं से उपभोक्ता अधिकारों और कॉर्पोरेट नीतियों के बीच एक गंभीर कानूनी टकराव शुरू हुआ, जिसका समाधान अंततः उपभोक्ता आयोगों और सर्वोच्च न्यायालय के हस्तक्षेप से निकला।


टिकट बुकिंग: एक वैधानिक अनुबंध

जब कोई यात्री एयरलाइन का टिकट खरीदता है, तो यह केवल एक यात्रा योजना नहीं होती, बल्कि भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 के अंतर्गत एक वैध अनुबंध (Contract) होता है। इस अनुबंध में:

  • यात्री का दायित्व: टिकट मूल्य का भुगतान
  • एयरलाइन का दायित्व: तय समय और शर्तों पर सुरक्षित यात्रा उपलब्ध कराना

यदि किसी कारणवश सेवा प्रदान नहीं की जाती, तो सामान्य नियम यही है कि प्रतिफल (Consideration) विफल होने पर धन की वापसी अनिवार्य होती है। कोविड जैसी आपदा ने इस सिद्धांत को चुनौती दी, लेकिन समाप्त नहीं किया।


‘फोर्स मेज्योर’ का तर्क और उसकी सीमाएँ

एयरलाइंस ने अपने बचाव में यह तर्क दिया कि कोविड-19 और सरकारी लॉकडाउन ‘फोर्स मेज्योर’ की श्रेणी में आते हैं—अर्थात ऐसी परिस्थितियाँ जिन पर किसी पक्ष का नियंत्रण नहीं होता।

निस्संदेह, महामारी एक असाधारण परिस्थिति थी। किंतु उपभोक्ता मंचों ने स्पष्ट किया कि:

  • फोर्स मेज्योर सेवा रद्द होने का कारण हो सकता है
  • लेकिन यह रिफंड न देने का वैधानिक लाइसेंस नहीं बन सकता

यदि सेवा दी ही नहीं गई, तो भुगतान को रोके रखना न तो न्यायसंगत है और न ही कानूनी।


उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 और ‘सेवा में कमी’

उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 की धारा 2(11) के अनुसार:

“सेवा में कमी” का अर्थ है सेवा की गुणवत्ता, प्रकृति, निष्पादन या समयबद्धता में कोई भी दोष, अपूर्णता या चूक।

कोविड काल में उपभोक्ता आयोगों ने यह माना कि:

  • बिना सहमति क्रेडिट शेल थोपना
  • महीनों तक रिफंड रोके रखना
  • बार-बार शिकायत के बावजूद जवाब न देना

ये सभी ‘सेवा में कमी’ के स्पष्ट उदाहरण हैं।


अनुचित व्यापार व्यवहार (Unfair Trade Practice)

केवल सेवा में कमी ही नहीं, बल्कि कई मामलों में एयरलाइंस का आचरण अनुचित व्यापार व्यवहार की श्रेणी में भी आया। विशेष रूप से तब, जब:

  • वेबसाइट पर “रिफंडेबल टिकट” लिखा गया हो
  • लेकिन रद्दीकरण पर केवल वाउचर दिया जाए
  • या शर्तें बाद में एकतरफा बदल दी जाएँ

उपभोक्ता आयोगों ने इसे भ्रामक व्यापार नीति मानते हुए एयरलाइंस को फटकार लगाई।


सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप: प्रवासी लीगल सेल मामला

प्रवासी लीगल सेल बनाम भारत संघ मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने एक संतुलित दृष्टिकोण अपनाया। न्यायालय ने माना कि:

  • महामारी ने एयरलाइंस की वित्तीय स्थिति को प्रभावित किया
  • लेकिन उपभोक्ताओं का पैसा अनिश्चित काल तक रोके रखना अस्वीकार्य है

मुख्य निर्देश

  1. लॉकडाउन अवधि की रद्द उड़ानों पर पूरा रिफंड दिया जाए
  2. क्रेडिट शेल केवल यात्री की स्वैच्छिक पसंद हो
  3. क्रेडिट शेल की अवधि समाप्त होने पर नकद रिफंड अनिवार्य
  4. अनावश्यक देरी पर ब्याज और हर्जाना भी लगाया जा सकता है

यह फैसला उपभोक्ता कानून के इतिहास में एक मील का पत्थर माना गया।


उपभोक्ता आयोगों के व्यावहारिक निर्णय

कोविड के बाद जिला, राज्य और राष्ट्रीय आयोगों में सैकड़ों शिकायतें दर्ज हुईं। आयोगों का रुख स्पष्ट रूप से उपभोक्ता-हितैषी रहा।

विवाद का प्रकार आयोग की दृष्टि प्रदान की गई राहत
रिफंड में देरी सेवा में कमी राशि + ब्याज
केवल क्रेडिट शेल अनुचित व्यापार नकद रिफंड
एजेंट-एयरलाइन विवाद संयुक्त उत्तरदायित्व हर्जाना
मानसिक उत्पीड़न गंभीर चूक मुआवजा

कई मामलों में आयोगों ने यह भी कहा कि यात्री को बार-बार ईमेल, कॉल और शिकायत करने की मजबूरी स्वयं में मानसिक प्रताड़ना है


जिला आयोग से NCDRC तक: उपभोक्ता के लिए सुलभ न्याय

  • जिला उपभोक्ता आयोग:
    छोटे दावों के लिए सबसे सरल मंच। बिना वकील भी शिकायत संभव।
  • राज्य आयोग:
    अपील और बड़े मामलों के लिए। यहाँ एयरलाइंस की दलीलों की गहन जांच होती है।
  • राष्ट्रीय आयोग (NCDRC):
    जब कॉर्पोरेट नीतियाँ उपभोक्ता अधिकारों को कुचलती हैं, तब NCDRC कठोर संदेश देता है।

वकालत के क्षेत्र में उभरते अवसर

महामारी के बाद उपभोक्ता विवादों में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है। विशेषकर:

  • ट्रैवल और टूरिज़्म
  • एयरलाइंस
  • होटल और इवेंट बुकिंग

एक युवा वकील के लिए यह क्षेत्र कम लागत, तेज़ परिणाम और सामाजिक प्रभाव वाला है। कोविड-संबंधी उपभोक्ता मामले आज भी मिसाल के रूप में उद्धृत किए जा रहे हैं।


व्यापार के लिए सीख: उपभोक्ता कानून केवल बचाव नहीं, रणनीति है

यदि आप किसी भी प्रकार का व्यापार कर रहे हैं—चाहे वह शुद्ध घी, खाद्य उत्पाद या सेवा हो—तो यह कानून आपके लिए चेतावनी नहीं, बल्कि मार्गदर्शन है।

  • गुणवत्ता में कमी = सेवा में कमी
  • भ्रामक दावा = अनुचित व्यापार
  • स्पष्ट रिटर्न नीति = ब्रांड विश्वास

एक वकील-व्यवसायी के रूप में यदि आप उपभोक्ता अधिकारों का सम्मान करते हैं, तो विवाद नहीं, विश्वसनीयता बनती है।


निष्कर्ष

कोविड-19 ने यह स्पष्ट कर दिया कि आपदा चाहे जितनी बड़ी क्यों न हो, कानून का शासन समाप्त नहीं होता। एयरलाइंस की आर्थिक कठिनाइयाँ वास्तविक थीं, लेकिन उपभोक्ता का पैसा रोक लेना न तो नैतिक था, न वैधानिक।

उपभोक्ता आयोगों और सर्वोच्च न्यायालय ने यह संदेश दिया कि बड़ी कॉर्पोरेट इकाइयाँ भी उपभोक्ता के प्रति जवाबदेह हैं। यह केवल रिफंड का प्रश्न नहीं था, बल्कि यह तय करने का समय था कि संकट में भी न्याय किसके साथ खड़ा रहेगा।

उत्तर स्पष्ट है—उपभोक्ता के साथ।