कोलकाता की जहरीली हवा और जीवन के अधिकार पर संकट: कलकत्ता हाईकोर्ट में जनहित याचिका, GRAP लागू करने और त्वरित न्यायिक हस्तक्षेप की माँग
भूमिका
तेज़ी से बढ़ते शहरीकरण, अनियंत्रित यातायात, औद्योगिक प्रदूषण और निर्माण गतिविधियों के बीच स्वच्छ वायु का अधिकार आज भारत के महानगरों में एक गंभीर संवैधानिक प्रश्न बन चुका है। दिल्ली जैसे शहरों के बाद अब कोलकाता भी उस मोड़ पर खड़ा है, जहाँ हवा की गुणवत्ता (Air Quality Index – AQI) सीधे-सीधे नागरिकों के जीवन, स्वास्थ्य और गरिमा को प्रभावित कर रही है। इसी पृष्ठभूमि में कलकत्ता हाईकोर्ट के समक्ष दायर एक जनहित याचिका (PIL) ने कोलकाता की खतरनाक और विषाक्त वायु स्थिति को उजागर करते हुए तत्काल न्यायिक हस्तक्षेप और GRAP (Graded Response Action Plan) को लागू करने की माँग की है।
यह याचिका केवल पर्यावरणीय चिंता तक सीमित नहीं है, बल्कि यह संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत जीवन के अधिकार, सार्वजनिक स्वास्थ्य, प्रशासनिक जवाबदेही और सतत विकास के सिद्धांतों से गहराई से जुड़ी हुई है।
कोलकाता की वायु गुणवत्ता: समस्या का स्वरूप
1. AQI के खतरनाक स्तर
हाल के महीनों में कोलकाता के कई इलाकों में AQI “खराब”, “बहुत खराब” और कुछ समय पर “गंभीर” श्रेणी में दर्ज किया गया है।
PM2.5 और PM10 जैसे सूक्ष्म कणों का स्तर—
- विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की सीमा से कई गुना अधिक,
- बच्चों, बुजुर्गों और दमा/हृदय रोगियों के लिए विशेष रूप से घातक,
- और दीर्घकाल में फेफड़ों के कैंसर, हृदय रोग तथा समयपूर्व मृत्यु का कारण बन सकता है।
2. प्रदूषण के प्रमुख कारण
जनहित याचिका में कोलकाता की वायु गुणवत्ता खराब होने के कई कारण गिनाए गए हैं, जैसे—
- पुराने और प्रदूषण फैलाने वाले वाहनों की अधिक संख्या
- सार्वजनिक परिवहन में डीज़ल चालित बसों और ऑटो-रिक्शा का प्रभुत्व
- निर्माण कार्यों में धूल नियंत्रण उपायों का अभाव
- ठोस कचरे और जैविक अपशिष्ट का खुले में जलाया जाना
- औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाला अनियंत्रित उत्सर्जन
याचिका का कहना है कि ये सभी कारण राज्य और नगर प्रशासन की निष्क्रियता के चलते लगातार बढ़ते जा रहे हैं।
जनहित याचिका (PIL): क्या माँग की गई है?
1. GRAP लागू करने की माँग
याचिकाकर्ता ने कलकत्ता हाईकोर्ट से आग्रह किया है कि—
- कोलकाता और उसके आसपास के क्षेत्रों में GRAP (Graded Response Action Plan) को तत्काल लागू किया जाए।
- GRAP के तहत प्रदूषण की श्रेणी के अनुसार चरणबद्ध प्रतिबंध लगाए जाएँ, जैसे—
- निर्माण गतिविधियों पर रोक
- पुराने वाहनों का संचालन प्रतिबंधित करना
- उद्योगों पर अस्थायी नियंत्रण
- स्कूलों और सार्वजनिक गतिविधियों के लिए दिशा-निर्देश
याचिका में कहा गया है कि जब दिल्ली-NCR जैसे क्षेत्रों में GRAP लागू किया जा सकता है, तो कोलकाता को इससे बाहर रखना संवैधानिक समानता और पर्यावरणीय न्याय के सिद्धांतों के विरुद्ध है।
2. आपातकालीन प्रवर्तन (Urgent Enforcement)
PIL में यह भी माँग की गई है कि—
- पश्चिम बंगाल प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (WBPCB)
- कोलकाता नगर निगम (KMC)
- और राज्य सरकार
को प्रदूषण नियंत्रण कानूनों का सख्ती से और तुरंत पालन सुनिश्चित करने का निर्देश दिया जाए।
याचिकाकर्ता का तर्क है कि कानून और नियम पहले से मौजूद हैं, लेकिन उनका प्रभावी क्रियान्वयन नहीं हो रहा, जिससे नागरिकों का जीवन खतरे में पड़ रहा है।
संवैधानिक दृष्टिकोण: स्वच्छ वायु और अनुच्छेद 21
1. जीवन के अधिकार का विस्तार
भारतीय न्यायपालिका ने समय-समय पर यह स्पष्ट किया है कि—
अनुच्छेद 21 के अंतर्गत “जीवन का अधिकार” केवल शारीरिक अस्तित्व तक सीमित नहीं है, बल्कि उसमें स्वच्छ पर्यावरण, स्वच्छ वायु और स्वस्थ जीवन का अधिकार भी शामिल है।
सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न हाईकोर्ट्स के अनेक फैसलों में यह सिद्धांत स्थापित हो चुका है कि—
- प्रदूषण-मुक्त वातावरण
- मानव गरिमा के साथ जीवन
- और सार्वजनिक स्वास्थ्य
संविधान द्वारा संरक्षित मौलिक अधिकार हैं।
2. राज्य का कर्तव्य
संविधान के—
- अनुच्छेद 48A (राज्य का पर्यावरण संरक्षण का दायित्व)
- अनुच्छेद 51A(g) (नागरिकों का पर्यावरण संरक्षण का कर्तव्य)
स्पष्ट करते हैं कि पर्यावरण की रक्षा केवल नीति का विषय नहीं, बल्कि संवैधानिक दायित्व है।
PIL में कहा गया है कि राज्य सरकार इस दायित्व में विफल रही है।
पर्यावरणीय कानून और नियामक ढाँचा
1. वायु (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम, 1981
यह अधिनियम—
- वायु प्रदूषण को रोकने
- और प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों को शक्तियाँ देने
के लिए बनाया गया था।
याचिका का आरोप है कि इस अधिनियम के तहत—
- नियमित निरीक्षण
- दोषी इकाइयों पर दंड
- और उत्सर्जन मानकों का पालन
ठीक से नहीं किया जा रहा।
2. पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986
इस अधिनियम के अंतर्गत केंद्र और राज्य सरकारों को—
- आपातकालीन उपाय
- प्रदूषणकारी गतिविधियों पर प्रतिबंध
- और विशेष निर्देश जारी करने
की व्यापक शक्तियाँ प्राप्त हैं।
PIL का कहना है कि खतरनाक AQI स्तर होने के बावजूद इन शक्तियों का प्रयोग नहीं किया गया।
GRAP: क्या है और क्यों ज़रूरी है?
1. GRAP की अवधारणा
Graded Response Action Plan (GRAP) एक ऐसा तंत्र है जिसमें—
- वायु प्रदूषण के स्तर के अनुसार
- पहले से तय कदम
- स्वतः लागू किए जाते हैं।
यह योजना निवारक (preventive) और प्रतिक्रियात्मक (reactive) दोनों प्रकार की होती है।
2. कोलकाता में GRAP की आवश्यकता
याचिका में तर्क दिया गया है कि—
- कोलकाता की भौगोलिक स्थिति
- घनी आबादी
- और सीमित हरित क्षेत्र
इसे प्रदूषण के प्रति अधिक संवेदनशील बनाते हैं।
ऐसे में GRAP लागू न करना वैज्ञानिक चेतावनियों की अनदेखी है।
सार्वजनिक स्वास्थ्य पर प्रभाव
1. बच्चों और बुजुर्गों पर असर
खराब हवा—
- बच्चों के फेफड़ों के विकास को प्रभावित करती है
- बुजुर्गों में दमा, हृदय रोग और स्ट्रोक का खतरा बढ़ाती है
PIL में कहा गया है कि यह स्थिति स्वास्थ्य आपातकाल जैसी है।
2. आर्थिक और सामाजिक प्रभाव
- बढ़ती बीमारियाँ → स्वास्थ्य खर्च में वृद्धि
- कामकाजी दिनों का नुकसान
- उत्पादकता में गिरावट
इस प्रकार, वायु प्रदूषण केवल पर्यावरणीय नहीं बल्कि आर्थिक और सामाजिक संकट भी है।
न्यायपालिका की भूमिका: पर्यावरणीय संरक्षक
भारतीय न्यायपालिका ने कई मामलों में—
- उद्योगों को बंद करने
- प्रदूषणकारी गतिविधियों पर रोक
- और सरकारों को नीति बदलने
का निर्देश दिया है।
कलकत्ता हाईकोर्ट के समक्ष यह PIL एक बार फिर यह प्रश्न रखती है कि—
क्या न्यायपालिका को नागरिकों के जीवन की रक्षा के लिए सक्रिय हस्तक्षेप करना चाहिए?
संभावित न्यायिक निर्देश
यदि हाईकोर्ट याचिका को गंभीरता से स्वीकार करता है, तो वह—
- GRAP लागू करने का आदेश दे सकता है
- प्रदूषण नियंत्रण एजेंसियों को समयबद्ध कार्ययोजना बनाने को कह सकता है
- दोषी अधिकारियों और संस्थाओं पर जवाबदेही तय कर सकता है
- नियमित AQI मॉनिटरिंग और रिपोर्टिंग के निर्देश दे सकता है
निष्कर्ष
कोलकाता की जहरीली हवा केवल पर्यावरणीय आँकड़ों का विषय नहीं है; यह मानव जीवन, गरिमा और संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकारों से जुड़ा गंभीर मुद्दा है।
कलकत्ता हाईकोर्ट में दायर यह जनहित याचिका इस सच्चाई को रेखांकित करती है कि—
स्वच्छ वायु कोई विशेषाधिकार नहीं, बल्कि मौलिक अधिकार है।
कानूनों की मौजूदगी पर्याप्त नहीं, उनका सख्त और ईमानदार क्रियान्वयन आवश्यक है।
जब कार्यपालिका विफल हो, तब न्यायपालिका का हस्तक्षेप लोकतंत्र और संविधान की रक्षा करता है।
अब यह न्यायालय पर निर्भर है कि वह इस चेतावनी को किस प्रकार लेता है। लेकिन इतना स्पष्ट है कि यदि आज निर्णायक कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में कोलकाता की हवा केवल साँस लेना ही नहीं, जीवन जीना भी कठिन बना देगी।