“केवल काग़ज़ों पर जीवित विवाह को ढोना न्याय का उद्देश्य नहीं” — 24 वर्षों से अलग रह रहे दंपति का विवाह भंग करते हुए सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक निर्णय
भूमिका
भारतीय वैवाहिक कानून में विवाह को एक पवित्र, सामाजिक और कानूनी संस्था माना गया है। सामान्यतः न्यायालय विवाह को बचाने के प्रयासों को प्राथमिकता देते हैं, किंतु जब कोई संबंध केवल औपचारिक रूप से अस्तित्व में हो और वास्तविक जीवन में पूर्णतः टूट चुका हो, तब न्यायालय का दृष्टिकोण व्यावहारिक और मानवीय हो जाता है। इसी सिद्धांत को दोहराते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार, 15 दिसंबर को एक अत्यंत महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए 24 वर्षों से अलग रह रहे एक दंपति का विवाह समाप्त कर दिया।
न्यायालय ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि “ऐसा विवाह, जो केवल काग़ज़ों पर जीवित हो, उसे न्यायालयों द्वारा बनाए रखना न तो न्यायसंगत है और न ही मानवीय।” अदालत ने माना कि पति-पत्नी के वैवाहिक जीवन के प्रति मूलभूत दृष्टिकोण पूरी तरह भिन्न थे, दोनों ने एक-दूसरे के साथ सामंजस्य स्थापित करने से लंबे समय तक इंकार किया और यह स्थिति पारस्परिक क्रूरता (Mutual Cruelty) तथा विवाह के अपूरणीय विघटन (Irretrievable Breakdown of Marriage) का स्पष्ट उदाहरण है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला एक ऐसे दंपति से संबंधित था, जिनका विवाह कई दशक पहले हुआ था। प्रारंभिक वर्षों में ही उनके बीच मतभेद उभरने लगे। समय के साथ ये मतभेद इतने गहरे हो गए कि दोनों अलग-अलग रहने लगे। न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत तथ्यों के अनुसार—
- पति और पत्नी पिछले 24 वर्षों से अलग रह रहे थे
- उनके बीच कोई भावनात्मक, सामाजिक या वैवाहिक संबंध शेष नहीं था
- पुनर्मिलन के सभी प्रयास विफल हो चुके थे
- लंबी न्यायिक कार्यवाही के बावजूद विवाद सुलझ नहीं पाया
इस प्रकार विवाह केवल कानूनी रिकॉर्ड में बना हुआ था, जबकि वास्तविक जीवन में उसका कोई अस्तित्व नहीं था।
न्यायालय के समक्ष प्रमुख प्रश्न
सुप्रीम कोर्ट के समक्ष मुख्य प्रश्न यह था कि—
- क्या ऐसे विवाह को बनाए रखना उचित है, जिसमें पति-पत्नी दशकों से अलग रह रहे हों?
- क्या लंबे समय तक साथ न रहना और एक-दूसरे के प्रति असहयोग, मानसिक क्रूरता की श्रेणी में आता है?
- क्या न्यायालय विवाह के अपूरणीय विघटन के आधार पर तलाक दे सकता है, भले ही यह वैधानिक आधार के रूप में स्पष्ट रूप से अधिनियम में न हो?
पति और पत्नी के तर्क
पति का पक्ष
पति की ओर से यह तर्क दिया गया कि—
- विवाह पूरी तरह असफल हो चुका है
- वर्षों से अलगाव के कारण किसी भी प्रकार का वैवाहिक बंधन शेष नहीं है
- जबरन विवाह को बनाए रखना मानसिक उत्पीड़न के समान है
पत्नी का पक्ष
वहीं पत्नी की ओर से यह कहा गया कि—
- विवाह एक पवित्र संस्था है, जिसे आसानी से भंग नहीं किया जाना चाहिए
- तलाक से सामाजिक और व्यक्तिगत प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचेगी
- विवाह को बचाने की संभावना अभी भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है
सुप्रीम कोर्ट की प्रमुख टिप्पणियाँ
सुप्रीम कोर्ट ने विस्तृत सुनवाई के बाद कई महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ कीं, जो भारतीय पारिवारिक कानून के विकास में मील का पत्थर मानी जा रही हैं।
1. केवल काग़ज़ी विवाह को बनाए रखना अन्यायपूर्ण
अदालत ने कहा कि जब पति-पत्नी दशकों से साथ नहीं रह रहे हों और उनका कोई साझा जीवन न हो, तो ऐसे विवाह को बनाए रखना केवल औपचारिकता है।
2. पारस्परिक क्रूरता की अवधारणा
न्यायालय ने माना कि दोनों पक्षों द्वारा लंबे समय तक एक-दूसरे के साथ सामंजस्य न बैठाना, संवाद समाप्त कर देना और वैवाहिक दायित्वों से विमुख रहना पारस्परिक मानसिक क्रूरता के दायरे में आता है।
3. विवाह का अपूरणीय विघटन
अदालत ने स्पष्ट किया कि यह विवाह सभी व्यावहारिक उद्देश्यों के लिए समाप्त हो चुका है और इसे पुनर्जीवित करने की कोई वास्तविक संभावना नहीं है।
4. न्यायालय का मानवीय दृष्टिकोण
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कानून का उद्देश्य लोगों को पीड़ा में बनाए रखना नहीं, बल्कि न्याय प्रदान करना है।
विवाह के अपूरणीय विघटन का सिद्धांत
भारतीय कानून में Irretrievable Breakdown of Marriage को अभी तक स्पष्ट वैधानिक आधार नहीं बनाया गया है, किंतु सुप्रीम कोर्ट ने अनेक मामलों में इसे न्यायिक आधार के रूप में स्वीकार किया है।
इस सिद्धांत के अंतर्गत यह माना जाता है कि—
- जब विवाह पूरी तरह टूट चुका हो
- पति-पत्नी के बीच कोई भावनात्मक या सामाजिक संबंध शेष न हो
- पुनर्मिलन की कोई संभावना न हो
तो ऐसे विवाह को जारी रखना केवल दोनों पक्षों को मानसिक पीड़ा देना है।
पूर्ववर्ती न्यायिक दृष्टांत
सुप्रीम कोर्ट ने अपने पूर्व निर्णयों का उल्लेख करते हुए कहा कि:
- लंबे समय तक अलगाव स्वयं में विवाह के टूटने का प्रमाण है
- विवाह को जबरन बनाए रखना संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत सम्मानपूर्वक जीवन के अधिकार का उल्लंघन हो सकता है
- न्यायालय को सामाजिक वास्तविकताओं से आंख नहीं मूंदनी चाहिए
न्यायिक संयम और संवैधानिक शक्तियाँ
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि वह संविधान के अनुच्छेद 142 के अंतर्गत पूर्ण न्याय करने की अपनी शक्ति का प्रयोग कर रही है। यह शक्ति न्यायालय को यह अधिकार देती है कि वह किसी मामले में संपूर्ण न्याय सुनिश्चित करने हेतु आवश्यक आदेश पारित कर सके।
समाज और वैवाहिक कानून पर प्रभाव
इस निर्णय का प्रभाव केवल संबंधित दंपति तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके व्यापक सामाजिक और कानूनी निहितार्थ हैं—
- लंबे समय से लंबित वैवाहिक विवादों के समाधान का मार्ग प्रशस्त
- विवाह को केवल सामाजिक दबाव के कारण बनाए रखने की प्रवृत्ति पर रोक
- मानसिक स्वास्थ्य और व्यक्तिगत गरिमा को कानूनी मान्यता
आलोचनात्मक दृष्टिकोण
कुछ विधि विशेषज्ञों का मत है कि—
- विवाह के अपूरणीय विघटन को विधायी रूप से मान्यता मिलनी चाहिए
- प्रत्येक मामले में न्यायालय को सावधानी बरतनी चाहिए, ताकि इस सिद्धांत का दुरुपयोग न हो
फिर भी, अधिकांश विशेषज्ञ इसे न्यायपूर्ण और यथार्थवादी निर्णय मानते हैं।
विश्लेषण
यदि इस मामले में तलाक से इनकार किया जाता, तो—
- दोनों पक्षों को जीवन भर कानूनी बंधन में रहना पड़ता
- व्यक्तिगत स्वतंत्रता और मानसिक शांति प्रभावित होती
- न्यायालय की भूमिका केवल औपचारिक बनकर रह जाती
सुप्रीम कोर्ट ने व्यावहारिक, संवेदनशील और मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए इस स्थिति को समाप्त किया।
निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय भारतीय वैवाहिक न्यायशास्त्र में एक महत्वपूर्ण मोड़ है। यह फैसला स्पष्ट करता है कि—
- विवाह का उद्देश्य साथ रहना, समझ और सहयोग है
- जब यह उद्देश्य पूरी तरह समाप्त हो जाए, तो विवाह केवल एक बोझ बन जाता है
- न्यायालयों का कर्तव्य है कि वे केवल काग़ज़ों पर जीवित रिश्तों को ढोने के बजाय वास्तविक न्याय करें
यह निर्णय उन असंख्य दंपतियों के लिए आशा की किरण है, जो वर्षों से निष्प्राण विवाह में फंसे हुए हैं और न्याय की प्रतीक्षा कर रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने यह सिद्ध कर दिया कि कानून केवल नियमों का संकलन नहीं, बल्कि मानव गरिमा और न्याय का माध्यम है।