ART Act 2021 में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की अनुपस्थिति पर केंद्र का विरोध: केरल हाईकोर्ट में ट्रांस मैन की याचिका ने उठाए अधिकारों और विधिक समानता के सवाल
भारत में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की पहचान, गरिमा और उनके मूलभूत अधिकारों को लेकर न्यायालयों में लगातार महत्वपूर्ण बहसें चल रही हैं। इसी संदर्भ में हाल ही में एक अहम मामला केरल हाईकोर्ट में सामने आया, जहां एक ट्रांस मैन (जन्म से महिला लेकिन स्वयं को पुरुष पहचानने वाले व्यक्ति) ने अपनी gender-affirming surgery से पहले अपने अंडों (eggs) के संरक्षण की अनुमति के लिए याचिका दाखिल की।
यह याचिका केवल एक व्यक्ति की प्रजनन क्षमता को सुरक्षित रखने का प्रश्न नहीं थी, बल्कि इससे जुड़े बड़े संवैधानिक सवालों — समानता, स्वायत्तता, निजता, और प्रजनन अधिकार — को भी न्यायालय के सामने लेकर आई।
लेकिन इस याचिका का केंद्र सरकार ने कड़े शब्दों में विरोध किया और अपनी दलीलों में कहा कि Assisted Reproductive Technology (ART) Act, 2021 के तहत ट्रांसजेंडर व्यक्ति, सिंगल पुरुष, या पुरुष के रूप में पहचाने जाने वाले किसी भी व्यक्ति को ART सेवाएं प्राप्त करने की अनुमति नहीं है।
केंद्र का यह रुख न केवल ट्रांस समुदाय के अधिकारों की दिशा में एक बड़ा झटका माना जा रहा है, बल्कि यह न्यायपालिका के सामने यह भी प्रश्न रखता है कि क्या वर्तमान ART कानून संविधान के अनुरूप है या नहीं।
मामले की पृष्ठभूमि: क्यों मांगी गई थी ‘egg preservation’ की अनुमति?
याचिकाकर्ता एक ट्रांस मैन है, जो अपनी gender-affirming surgery (जिसमें uterus एवं ovaries को हटाया जाता है) से पहले अपने biological eggs को फ्रीज कराना चाहता था ताकि भविष्य में यदि वह संतान चाहें, तो surrogate या किसी अन्य ART प्रक्रिया के माध्यम से ऐसा संभव हो सके।
इस प्रकार की आवश्यकता सामान्यतः उन ट्रांस व्यक्तियों में देखी जाती है जो अपने शारीरिक बदलावों के कारण प्रजनन क्षमता खोने से पहले biological continuity बनाए रखना चाहते हैं।
उनका तर्क स्पष्ट था—
- प्रजनन क्षमता मेरे जीवन और पहचान का हिस्सा है।
- लिंग परिवर्तन प्रक्रिया के कारण मेरी जैविक क्षमता समाप्त हो जाएगी, इसलिए उसे पहले से सुरक्षित करने का संवैधानिक अधिकार मुझे है।
लेकिन केंद्र सरकार की प्रतिक्रिया बेहद सख्त और सीमित दृष्टिकोण वाली रही।
केंद्र का पक्ष: ART Act 2021 “ट्रांसजेंडर व्यक्ति या सिंगल पुरुष” को शामिल नहीं करता
केंद्र सरकार ने केरल हाईकोर्ट में दलील दी कि:
- ART Act, 2021 स्पष्ट रूप से केवल निम्नलिखित व्यक्तियों को ART सेवाएं प्रदान करता है—
- विवाहित विषमलैंगिक दंपति (married heterosexual couple)
- एकल महिला (single woman)
- इसका अर्थ यह हुआ कि—
- ट्रांसजेंडर व्यक्ति
- सिंगल पुरुष
- ट्रांस मैन
- गैर-पारंपरिक परिवार संरचनाएँ
… इन सभी को ART सेवाओं से बाहर रखा गया है।
- इसलिए केंद्र का तर्क था कि—
- “कानून में स्पष्ट रूप से अनुमति नहीं है, इसलिए egg preservation की इजाजत नहीं दी जा सकती।”
यह दृष्टिकोण केवल एक तकनीकी व्याख्या पर आधारित था, न कि संवैधानिक सिद्धांतों या मानवाधिकारों पर।
ART Act 2021 में इस तरह का प्रतिबंध क्यों? एक आलोचनात्मक समझ
भारत का ART Act 2021 मुख्य रूप से infertility treatment को नियमित करने के लिए बनाया गया था। लेकिन इसकी सबसे प्रमुख आलोचना यह रही है कि यह कानून—
- अत्यधिक heteronormative है,
- संकीर्ण सामाजिक संरचना को ध्यान में रखकर बनाया गया है,
- और इसमें ट्रांसजेंडर व्यक्तियों, LGBTQ+ समुदाय, live-in couples, एवं single men को बाहर रखा गया है।
इसके विपरीत दुनिया के अधिकांश देशों में gender identity की परवाह किए बिना प्रजनन सेवाएं उपलब्ध हैं।
इस कानून की आलोचना कई बार यह कहकर भी की गई है कि यह Transgender Persons (Protection of Rights) Act, 2019 और Supreme Court के NALSA (2014) तथा Puttaswamy (2017) निजता अधिकार फैसलों की भावना के विपरीत है।
ट्रांसजेंडर व्यक्ति के प्रजनन अधिकार: संविधान क्या कहता है?
भारत का संविधान हर नागरिक को निम्न अधिकार प्रदान करता है—
1. अनुच्छेद 14 – समानता का अधिकार
किसी भी व्यक्ति को केवल उसकी gender identity के आधार पर ART से वंचित करना भेदभाव होगा।
2. अनुच्छेद 19(1)(a) – व्यक्ति की पहचान, अभिव्यक्ति और स्वायत्तता
जेंडर-आइडेंटिटी स्वयं व्यक्त करने का मौलिक अधिकार है।
3. अनुच्छेद 21 – व्यक्तिगत स्वतंत्रता और निजता
इसमें reproductive autonomy भी शामिल है।
Supreme Court ने कहा था:
“मां बनना या न बनना एक व्यक्तिगत चुनाव है।”
अगर cisgender महिलाओं को यह अधिकार है, तो ट्रांस व्यक्तियों को भी होना चाहिए।
कानूनी संघर्ष का केंद्र: क्या egg preservation ‘ART Act’ के अंतर्गत आता है?
याचिकाकर्ता का तर्क था कि egg freezing केवल preservation है, न कि ART प्रक्रिया का संपूर्ण उपयोग।
केंद्र सरकार का तर्क था कि—
“ART Act की परिभाषा में gamete preservation भी ART सेवाओं में आता है, इसलिए वही सीमाएँ लागू होंगी।”
लेकिन कई विशेषज्ञ यह मानते हैं कि—
- सिर्फ संरक्षण (preservation) करना भविष्य की reproductive autonomy का हिस्सा है।
- इसे पूरी ART प्रक्रिया की तरह नहीं समझा जाना चाहिए।
इस बिंदु पर न्यायालय को विस्तृत व्याख्या करनी होगी।
ट्रांस समुदाय पर इसका प्रभाव: एक व्यापक सामाजिक दृष्टिकोण
केंद्र द्वारा इस याचिका का विरोध करने से—
- ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की प्रजनन क्षमता सुरक्षित रखने की संभावना सीमित हो जाती है।
- पहले से ही हाशिए पर खड़ा समुदाय और अधिक अधिकारों से वंचित हो जाता है।
- LGBTQ+ समुदाय के लिए परिवार बनाने की राह कठिन हो जाती है।
- भारत में reproductive rights का “heterosexual/biological family” मॉडल मजबूत होता है।
यह स्थिति कई activists और विशेषज्ञों के अनुसार दायरे को सीमित करने वाला कदम है, न कि समावेशी नीति की ओर।
न्यायपालिका की भूमिका: क्या हाईकोर्ट सामाजिक न्याय के पक्ष में विस्तारवादी व्याख्या कर सकता है?
भारतीय न्यायालयों ने—
- महिलाओं,
- सिंगल मदर्स,
- लाइव-इन कपल्स
… सभी को समानता के आधार पर अधिकार दिए हैं।
काफी संभावना है कि केरल हाईकोर्ट इस मामले में एक संवैधानिक दृष्टिकोण अपनाए और यह कहे कि—
- “किसी भी व्यक्ति को उसकी पहचान के आधार पर प्रजनन अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।”
यदि ऐसा होता है, तो यह निर्णय पूरे देश में ट्रांसजेंडर अधिकारों की दिशा बदल सकता है।
क्या ART Act 2021 में संशोधन की आवश्यकता है?
विशेषज्ञों का मानना है कि कानून में निम्न सुधार जरूरी हैं—
- ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को ART सेवाओं में शामिल किया जाए
- पुरुषों को भी अकेले ART सेवाएं लेने की अनुमति मिले
- LGBTQ+ कपल्स के लिए स्पष्ट प्रावधान बनाए जाएँ
- surrogate एवं donor नियमों में समानता और सरलता लाई जाए
विश्व स्तर पर जहां प्रजनन अधिकार gender neutral हो चुके हैं, वहीं भारत का कानून अभी भी पुरानी सामाजिक संरचना से बंधा हुआ है।
निष्कर्ष: एक याचिका, जो भविष्य के अधिकारों की दिशा तय कर सकती है
केरल हाईकोर्ट में लंबित यह मामला केवल एक ट्रांस मैन की reproductive choice तक सीमित नहीं है।
यह भारतीय कानूनों और संविधान के बीच टकराव की एक बड़ी मिसाल है।
यह प्रश्न आज भारतीय समाज के सामने है—
- क्या ट्रांसजेंडर व्यक्ति समान नागरिक हैं?
- क्या उन्हें भी वही reproductive rights मिलें, जो दूसरों को मिलते हैं?
- क्या कानून को gender-neutral बनाना समय की मांग नहीं है?
जैसे ही हाईकोर्ट अपना निर्णय देगा, इसका प्रभाव—
- ART Act की व्याख्या,
- LGBTQ+ अधिकारों,
- और gender-affirming surgery से पहले प्रजनन विकल्पों पर—
पूरे देश में महसूस किया जाएगा।
यह मामला भविष्य के लिए एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर बन सकता है, जो तय करेगा कि भारत वास्तव में अपनी संवैधानिक मूल्यों— समानता, गरिमा और स्वतंत्रता —का कितना पालन करता है।