“कास्टिंग काउच” के नाम पर शोषण: महिलाओं की गरिमा पर गंभीर आघात — जमानत देते हुए भी हाईकोर्ट का सख़्त संदेश और कठोर शर्तें
भारतीय न्यायपालिका ने समय–समय पर यह स्पष्ट किया है कि महिलाओं की गरिमा, शारीरिक स्वायत्तता और पेशेवर स्वतंत्रता संविधान के मूल्यों के केंद्र में हैं। हाल ही में एक महत्वपूर्ण मामले में, हाईकोर्ट ने “कास्टिंग काउच” जैसी प्रथाओं को महिलाओं की गरिमा पर grave affront बताते हुए कहा कि ऐसे कृत्य पेशेवर आकांक्षाओं का दुरुपयोग कर यौन शोषण की श्रेणी में आते हैं और न्यायालयों को इन्हें “heavy hand” यानी कठोर दृष्टिकोण से देखना चाहिए। हालांकि, तथ्यों और परिस्थितियों का समग्र मूल्यांकन करते हुए अदालत ने अभियुक्त को जमानत दी, लेकिन अत्यंत सख़्त शर्तों के साथ—ताकि पीड़िता की सुरक्षा, जांच की निष्पक्षता और न्याय की विश्वसनीयता बनी रहे।
यह निर्णय एक संतुलित न्यायिक दृष्टिकोण को रेखांकित करता है—जहाँ एक ओर अपराध की गंभीरता और सामाजिक दुष्प्रभावों की स्पष्ट निंदा है, वहीं दूसरी ओर जमानत के सिद्धांतों, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और निष्पक्ष प्रक्रिया का सम्मान भी।
कास्टिंग काउच: शक्ति, असमानता और शोषण का संगम
“कास्टिंग काउच” शब्द केवल फिल्म या मनोरंजन उद्योग तक सीमित नहीं रहा। यह उन सभी पेशेवर क्षेत्रों में पनप सकता है जहाँ अवसर, नियुक्ति, पदोन्नति या प्रोजेक्ट देने की शक्ति कुछ हाथों में केंद्रित हो और इच्छुक उम्मीदवार असमान स्थिति में हों। हाईकोर्ट ने अपने अवलोकन में कहा कि जब कोई व्यक्ति अपनी पद–सत्ता या प्रभाव का उपयोग कर किसी महिला की पेशेवर आकांक्षाओं को यौन अनुकूलता से जोड़ता है, तो यह सहमति की अवधारणा को दूषित करता है। ऐसी परिस्थितियों में दी गई “सहमति” वास्तविक, स्वतंत्र और स्वैच्छिक नहीं मानी जा सकती।
अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि यह केवल व्यक्तिगत अपराध नहीं, बल्कि कार्यस्थल की गरिमा, लैंगिक समानता और सामाजिक नैतिकता पर सीधा प्रहार है। ऐसे कृत्य महिलाओं को अवसरों से वंचित करते हैं, उन्हें भय और दबाव में रखते हैं तथा प्रतिभा और योग्यता के स्थान पर शोषण को बढ़ावा देते हैं।
जमानत का सिद्धांत और न्यायिक संतुलन
भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली में जमानत कोई दंड नहीं, बल्कि मुकदमे के दौरान स्वतंत्रता का संरक्षण है। हाईकोर्ट ने दोहराया कि “जेल अपवाद है और जमानत नियम”—लेकिन यह नियम निरपेक्ष नहीं है। जमानत पर विचार करते समय अदालत अपराध की प्रकृति, आरोपों की गंभीरता, साक्ष्यों की स्थिति, अभियुक्त के आचरण, पीड़िता की सुरक्षा और जांच पर संभावित प्रभाव जैसे कारकों का सम्यक आकलन करती है।
इस मामले में अदालत ने स्पष्ट किया कि कास्टिंग काउच जैसे आरोपों को हल्के में नहीं लिया जा सकता। ये आरोप सामाजिक रूप से अत्यंत घातक हैं और महिलाओं की गरिमा को चोट पहुँचाते हैं। इसलिए, जमानत देते समय यह अनिवार्य है कि अभियुक्त की स्वतंत्रता पीड़िता के अधिकारों और जांच की निष्पक्षता पर हावी न हो।
“Heavy Hand” की आवश्यकता क्यों?
हाईकोर्ट ने “heavy hand” शब्दावली का प्रयोग करते हुए यह संदेश दिया कि न्यायालयों को ऐसे मामलों में कठोर और संवेदनशील दोनों होना चाहिए। कठोर—ताकि शोषणकारी प्रवृत्तियों को स्पष्ट संदेश मिले कि कानून उन्हें बर्दाश्त नहीं करेगा; और संवेदनशील—ताकि पीड़िता को न्यायिक प्रक्रिया में पुनः आघात (re-traumatization) का सामना न करना पड़े।
अदालत ने यह भी कहा कि ऐसे मामलों में सामाजिक प्रभाव को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। यदि न्यायिक प्रतिक्रिया ढीली होगी, तो यह पीड़िताओं को चुप रहने के लिए प्रेरित कर सकती है और अपराधियों को प्रोत्साहन दे सकती है।
सख़्त शर्तों के साथ जमानत: क्या–क्या शर्तें?
जमानत देते हुए हाईकोर्ट ने कई कठोर शर्तें लगाईं, जिनका उद्देश्य तीन प्रमुख लक्ष्यों को साधना था—(i) पीड़िता की सुरक्षा, (ii) जांच/मुकदमे की निष्पक्षता, और (iii) न्यायिक प्रक्रिया में विश्वास। प्रमुख शर्तें इस प्रकार रहीं:
- पीड़िता से किसी भी प्रकार का संपर्क निषिद्ध
अभियुक्त को सीधे या परोक्ष रूप से—फोन, संदेश, सोशल मीडिया या किसी तीसरे व्यक्ति के माध्यम से—पीड़िता से संपर्क करने पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया गया। - गवाहों को प्रभावित न करने का निर्देश
अभियुक्त किसी भी गवाह को धमकाने, प्रलोभन देने या प्रभावित करने का प्रयास नहीं करेगा। - जांच में पूर्ण सहयोग
पुलिस/जांच एजेंसी द्वारा बुलाए जाने पर अभियुक्त की उपस्थिति अनिवार्य होगी और वह जांच में सहयोग करेगा। - यात्रा संबंधी प्रतिबंध
बिना अनुमति क्षेत्राधिकार से बाहर जाने या विदेश यात्रा पर रोक/पूर्व अनुमति की शर्त। - कार्यस्थल या पेशेवर दायरे में सीमाएँ
जहाँ आवश्यक हो, अभियुक्त के कार्यस्थल या पेशेवर गतिविधियों पर अस्थायी सीमाएँ—ताकि पीड़िता की सुरक्षा और मानसिक शांति बनी रहे। - कानून–व्यवस्था बनाए रखने का दायित्व
किसी भी नए अपराध में संलिप्तता या शर्तों के उल्लंघन पर जमानत निरस्त की जा सकती है।
इन शर्तों के माध्यम से अदालत ने स्पष्ट किया कि जमानत स्वतंत्रता का लाइसेंस नहीं है, बल्कि जिम्मेदारी के साथ दी गई अस्थायी राहत है।
सहमति, दबाव और शक्ति–संतुलन: न्यायिक दृष्टि
निर्णय का एक महत्वपूर्ण पहलू सहमति की अवधारणा पर अदालत का दृष्टिकोण है। जब अवसर और भविष्य किसी एक व्यक्ति की इच्छा पर निर्भर कर दिए जाएँ, तब “हाँ” कहना अक्सर दबाव का परिणाम होता है। हाईकोर्ट ने संकेत दिया कि शक्ति–संतुलन की असमानता में प्राप्त सहमति की वैधता पर गहन परीक्षण आवश्यक है।
यह दृष्टिकोण भारतीय दंड कानून, कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न से संबंधित कानूनों और संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप है, जहाँ गरिमा और समानता सर्वोपरि हैं।
सामाजिक संदेश और निवारक प्रभाव
इस आदेश का सामाजिक महत्व भी कम नहीं है। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि कास्टिंग काउच जैसी प्रथाएँ समाज में प्रतिभा, योग्यता और मेहनत के मूल्यों को कमजोर करती हैं। न्यायालय का कड़ा रुख संभावित अपराधियों के लिए निवारक (deterrent) का काम करता है और पीड़िताओं को यह भरोसा देता है कि कानून उनकी बात सुनेगा।
निष्कर्ष
हाईकोर्ट का यह आदेश एक संतुलित लेकिन सशक्त न्यायिक वक्तव्य है। एक ओर यह महिलाओं की गरिमा पर होने वाले गंभीर आघात को पहचानते हुए कास्टिंग काउच जैसी प्रथाओं की तीखी निंदा करता है, वहीं दूसरी ओर जमानत के सिद्धांतों का पालन करते हुए सख़्त शर्तों के माध्यम से न्यायिक प्रक्रिया की रक्षा करता है।
यह निर्णय हमें याद दिलाता है कि न्याय केवल दंड देने का नाम नहीं, बल्कि अधिकारों, स्वतंत्रताओं और सामाजिक मूल्यों के बीच संतुलन साधने की प्रक्रिया है। कास्टिंग काउच के विरुद्ध “heavy hand” अपनाने का संदेश स्पष्ट है—पेशेवर आकांक्षाओं के नाम पर शोषण को न तो समाज स्वीकार करेगा और न ही कानून।