“कानून-व्यवस्था नहीं, एक ‘काल्पनिक भूत’”: थिरुपरनकुंड्रम विवाद पर मद्रास हाईकोर्ट की सरकार को कड़ी फटकार — धर्मनिरपेक्षता, शासन और न्यायिक स्वतंत्रता पर बड़ा संदेश
भूमिका
भारत जैसे विविधतापूर्ण और बहुधार्मिक देश में धार्मिक परंपराएँ, सार्वजनिक व्यवस्था और राज्य की जिम्मेदारी—इन तीनों के बीच संतुलन बनाए रखना हमेशा से चुनौतीपूर्ण रहा है। इसी संतुलन की कसौटी पर परखा गया तमिलनाडु का थिरुपरनकुंड्रम पहाड़ी विवाद, जिसमें मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै पीठ ने न केवल कार्तिकै दीपम जलाने की अनुमति को बरकरार रखा, बल्कि राज्य सरकार की भूमिका पर भी तीखी टिप्पणी की।
न्यायालय ने “कानून-व्यवस्था की समस्या” को एक ‘काल्पनिक भूत’ (imaginary ghost) करार देते हुए यह स्पष्ट किया कि धार्मिक आस्था पर अनावश्यक प्रतिबंध, प्रशासनिक असफलता को छिपाने का साधन नहीं बन सकते। यह फैसला उस समय आया है जब इसी विवाद को लेकर न्यायमूर्ति जी.आर. स्वामीनाथन के विरुद्ध महाभियोग प्रस्ताव जैसी अभूतपूर्व स्थिति सामने आई है। इसने इस मामले को स्थानीय धार्मिक विवाद से निकालकर राष्ट्रीय बहस—शासन, धर्मनिरपेक्षता और न्यायिक स्वतंत्रता—के केंद्र में ला खड़ा किया है।
थिरुपरनकुंड्रम पहाड़ी और कार्तिकै दीपम: धार्मिक-ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
थिरुपरनकुंड्रम पहाड़ी तमिलनाडु के मदुरै क्षेत्र में स्थित है और इसका धार्मिक-ऐतिहासिक महत्व अत्यंत प्राचीन है। यह स्थल—
- हिंदुओं के लिए भगवान मुरुगन से जुड़ा पवित्र स्थान है
- वहीं मुस्लिम समुदाय के लिए भी इससे संबंधित धार्मिक मान्यताएँ प्रचलित रही हैं
कार्तिकै दीपम तमिल संस्कृति और शैव-मुरुगन परंपरा में एक अत्यंत महत्वपूर्ण पर्व है, जिसमें पहाड़ी पर दीप प्रज्वलन की परंपरा सदियों पुरानी बताई जाती है।
विवाद की शुरुआत: ‘कानून-व्यवस्था’ का तर्क
राज्य सरकार और प्रशासन की ओर से यह तर्क दिया गया कि—
- कार्तिकै दीपम जलाने से सांप्रदायिक तनाव उत्पन्न हो सकता है
- इससे कानून-व्यवस्था की स्थिति बिगड़ने की आशंका है
इन्हीं आशंकाओं के आधार पर अनुमति देने से इनकार या सीमित करने का प्रयास किया गया, जिसे हाईकोर्ट में चुनौती दी गई।
मद्रास हाईकोर्ट (मदुरै पीठ) का फैसला
मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै पीठ ने—
- कार्तिकै दीपम जलाने की अनुमति देने के आदेश को बरकरार रखा
- सरकार के तर्कों को अपर्याप्त और असंतोषजनक माना
“कानून-व्यवस्था कोई काल्पनिक बहाना नहीं हो सकती”
न्यायालय ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि—
“कानून-व्यवस्था का मुद्दा एक ऐसा ‘काल्पनिक भूत’ बन गया है, जिसे हर बार आगे कर दिया जाता है, जब राज्य अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी निभाने में असमर्थ रहता है।”
अदालत ने स्पष्ट किया कि—
- यदि प्रशासन को संभावित तनाव की आशंका है, तो उसका कर्तव्य है कि वह पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था करे
- धार्मिक स्वतंत्रता पर प्रतिबंध लगाना समाधान नहीं, बल्कि प्रशासनिक विफलता का स्वीकार है
धर्मनिरपेक्षता का सही अर्थ: अदालत की दृष्टि
हाईकोर्ट ने धर्मनिरपेक्षता (Secularism) को लेकर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की—
- धर्मनिरपेक्षता का अर्थ धर्म का दमन नहीं, बल्कि सभी धर्मों के प्रति समान सम्मान है
- राज्य का दायित्व है कि वह—
- शांतिपूर्ण धार्मिक आचरण को संरक्षित करे
- न कि काल्पनिक आशंकाओं के आधार पर उसे रोके
यह टिप्पणी उस व्यापक बहस को बल देती है, जिसमें अकसर यह सवाल उठता है कि क्या राज्य धर्मनिरपेक्षता के नाम पर धार्मिक अधिकारों को सीमित कर सकता है?
न्यायमूर्ति जी.आर. स्वामीनाथन और महाभियोग विवाद
इस पूरे प्रकरण को और अधिक संवेदनशील बना देता है यह तथ्य कि—
- इसी विवाद से जुड़े न्यायिक दृष्टिकोण के कारण
- न्यायमूर्ति जी.आर. स्वामीनाथन के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव की बात सामने आई
यह स्थिति भारतीय न्यायिक इतिहास में अत्यंत दुर्लभ और गंभीर मानी जाती है।
न्यायिक स्वतंत्रता पर प्रश्न?
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि—
- किसी न्यायाधीश द्वारा दिए गए संवैधानिक और तर्कसंगत निर्णय के आधार पर
- महाभियोग जैसे कदम उठाना
- न्यायिक स्वतंत्रता के सिद्धांत को कमजोर कर सकता है
मद्रास हाईकोर्ट का यह फैसला अप्रत्यक्ष रूप से यह संदेश देता है कि—
न्यायिक निर्णयों को राजनीतिक या प्रशासनिक असहमति के आधार पर दंडित नहीं किया जा सकता।
शासन (Governance) पर अदालत की कठोर टिप्पणी
अदालत ने राज्य सरकार की भूमिका पर भी सवाल उठाए—
- क्या सरकार का कर्तव्य केवल आशंका व्यक्त करना है?
- या फिर संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत नागरिकों के धार्मिक अधिकारों की रक्षा करना?
न्यायालय ने यह संकेत दिया कि—
- बार-बार “law and order” का बहाना
- प्रशासनिक इच्छाशक्ति की कमी को दर्शाता है
स्थानीय विवाद से राष्ट्रीय विमर्श तक
यह मामला अब—
- केवल थिरुपरनकुंड्रम पहाड़ी या कार्तिकै दीपम तक सीमित नहीं
- बल्कि निम्नलिखित बड़े सवालों को जन्म देता है—
1. क्या राज्य धार्मिक आचरण को रोकने का आसान रास्ता चुन रहा है?
2. क्या धर्मनिरपेक्षता का अर्थ बहुसंख्यक या अल्पसंख्यक आस्थाओं पर प्रतिबंध है?
3. क्या न्यायाधीशों की स्वतंत्र राय अब राजनीतिक विवाद का कारण बन रही है?
आम नागरिकों और लोकतंत्र के लिए संदेश
इस फैसले से—
- आम नागरिकों को यह भरोसा मिलता है कि
अदालतें संवैधानिक मूल्यों की रक्षा के लिए तैयार हैं - यह संदेश जाता है कि
धार्मिक स्वतंत्रता को केवल प्रशासनिक डर के नाम पर कुचला नहीं जा सकता
आलोचनात्मक दृष्टिकोण
कुछ आलोचक यह तर्क देते हैं कि—
- भारत में धार्मिक तनाव वास्तविक हैं
- प्रशासन को सावधानी बरतने का अधिकार होना चाहिए
हालाँकि, अदालत ने इस चिंता को नकारा नहीं, बल्कि कहा कि—
“सावधानी का अर्थ निषेध नहीं, बल्कि बेहतर प्रशासन है।”
निष्कर्ष
मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै पीठ का यह निर्णय—
- धर्मनिरपेक्षता की संवैधानिक व्याख्या को स्पष्ट करता है
- शासन को उसकी जिम्मेदारियों की याद दिलाता है
- और न्यायिक स्वतंत्रता के पक्ष में मजबूत संदेश देता है
“कानून-व्यवस्था” को एक काल्पनिक भूत बताकर अदालत ने यह साफ कर दिया है कि—
संविधानिक अधिकारों को डर के साये में नहीं रखा जा सकता।
यह फैसला आने वाले समय में धार्मिक स्वतंत्रता, राज्य की भूमिका और न्यायपालिका की स्वायत्तता पर होने वाली बहसों में एक महत्वपूर्ण न्यायिक संदर्भ बनकर उभरेगा।