कानून की जगह ‘प्रचलन’ नहीं ले सकता: 5 साल की देरी से दाखिल चार्जशीट पर इलाहाबाद हाईकोर्ट का सख्त संदेश
प्रस्तावना: देरी केवल प्रक्रिया की त्रुटि नहीं, अधिकार का हनन है
भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली का एक बुनियादी सिद्धांत है— “न्याय त्वरित होना चाहिए।” जब राज्य किसी नागरिक पर अपराध का आरोप लगाता है, तो वह केवल एक कानूनी कार्रवाई नहीं होती, बल्कि व्यक्ति की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और मानसिक शांति पर सीधा प्रभाव डालती है। ऐसे में कानून ने अभियोजन (Prosecution) को असीमित समय नहीं दिया है। परिसीमा काल (Period of Limitation) इसी उद्देश्य से बनाया गया है, ताकि नागरिक अनिश्चित काल तक आपराधिक मुकदमे की तलवार के नीचे न जीते रहें।
फिरोजाबाद के एक मोटरसाइकिल चोरी प्रकरण में घटना के लगभग 5 वर्ष बाद दाखिल चार्जशीट पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जो रुख अपनाया, वह केवल एक केस का निर्णय नहीं, बल्कि निचली अदालतों और जांच एजेंसियों के लिए एक गंभीर चेतावनी है— “सामान्य न्यायिक प्रचलन कानून का स्थान नहीं ले सकता।”
मामले की पृष्ठभूमि: जांच की सुस्ती और न्यायिक चूक
2019 में मोटरसाइकिल चोरी की प्राथमिकी दर्ज हुई। जांच के दौरान कुछ आरोपियों के खिलाफ समय पर कार्यवाही हुई, किंतु दो व्यक्तियों के नाम सामने आने के बावजूद पुलिस ने उनके खिलाफ चार्जशीट दाखिल करने में लगभग 5 वर्षों का विलंब किया। नवंबर 2024 में अचानक चार्जशीट दाखिल की गई और मजिस्ट्रेट ने बिना किसी विस्तृत विचार के उस पर संज्ञान (Cognizance) भी ले लिया।
यहीं से विवाद शुरू हुआ— क्योंकि कानून यह स्पष्ट करता है कि अदालत का संज्ञान लेना ही वैध आपराधिक प्रक्रिया की शुरुआत है, और यही वह बिंदु है जहाँ परिसीमा काल लागू होता है।
परिसीमा काल: दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 468 का उद्देश्य
धारा 468 CrPC (अब BNSS में समान प्रावधान) का मूल उद्देश्य यह है कि छोटे और मध्यम स्तर के अपराधों में अभियोजन अनिश्चित समय तक लंबित न रहे।
| अधिकतम सजा | संज्ञान की अधिकतम सीमा |
|---|---|
| 1 वर्ष तक | 1 वर्ष |
| 3 वर्ष तक | 3 वर्ष |
मोटरसाइकिल चोरी जैसे अपराध (जहाँ सजा 3 वर्ष तक हो सकती है) में अदालत घटना से 3 वर्ष के भीतर ही संज्ञान ले सकती है।
इस मामले में:
- घटना: 2019
- चार्जशीट व संज्ञान: 2024
➡ देरी: लगभग 5 वर्ष
➡ परिणाम: संज्ञान कानूनन अवैध
“संज्ञान” का महत्व: सिर्फ औपचारिकता नहीं
अक्सर निचली अदालतों में यह समझ लिया जाता है कि चार्जशीट आते ही संज्ञान लेना एक नियमित कार्य है। परंतु उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय ने बार-बार स्पष्ट किया है कि संज्ञान लेना एक न्यायिक दायित्व (Judicial Application of Mind) है।
मजिस्ट्रेट को यह देखना होता है:
- क्या आरोपित अपराध प्रथम दृष्टया बनता है?
- क्या पुलिस जांच विधिसम्मत है?
- क्या मामला परिसीमा काल के भीतर है?
यदि ये प्रश्न जांचे बिना संज्ञान ले लिया जाए, तो वह न्यायिक आदेश नहीं, बल्कि यांत्रिक कार्यवाही (Mechanical Order) बन जाता है।
धारा 473 CrPC: क्या देरी माफ की जा सकती थी?
कानून ने एक अपवाद भी दिया है— धारा 473 के तहत, यदि अदालत संतुष्ट हो कि:
- देरी के पीछे पर्याप्त कारण था, या
- न्याय के हित में देरी को माफ करना आवश्यक है,
तो वह देरी को माफ कर सकती है।
लेकिन यहाँ महत्वपूर्ण बात यह है कि:
- मजिस्ट्रेट ने देरी पर विचार ही नहीं किया
- न अभियोजन ने कोई आवेदन दिया
- न कोई कारण रिकॉर्ड किया गया
अर्थात, देरी माफ करने की प्रक्रिया अपनाई ही नहीं गई। इसलिए संज्ञान शून्य (Void) हो गया।
अनुच्छेद 21 और त्वरित न्याय का अधिकार
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 केवल जीवन का अधिकार नहीं देता, बल्कि गरिमामय और न्यायपूर्ण जीवन का अधिकार देता है। सर्वोच्च न्यायालय ने कई निर्णयों में माना है कि “त्वरित न्याय” (Speedy Trial) इसी अनुच्छेद का हिस्सा है।
यदि राज्य 5 वर्षों तक किसी व्यक्ति के विरुद्ध कोई ठोस कदम न उठाए और अचानक मुकदमा शुरू करे, तो यह व्यक्ति की स्वतंत्रता पर अनावश्यक बोझ है।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि:
“कानून की निष्क्रियता का भार नागरिक पर नहीं डाला जा सकता।”
“सामान्य प्रचलन” बनाम “स्थापित विधि”
मजिस्ट्रेट द्वारा दिया गया यह तर्क कि “अदालतों में सामान्यतः ऐसे ही संज्ञान ले लिया जाता है”— न्यायिक दृष्टि से अत्यंत खतरनाक है।
क्यों?
- न्याय प्रणाली परंपराओं से नहीं, विधि से चलती है
- यदि “प्रचलन” कानून से ऊपर हो जाए, तो न्याय की एकरूपता समाप्त हो जाएगी
- इससे नागरिकों के मौलिक अधिकार असुरक्षित हो जाएंगे
हाईकोर्ट ने यह संदेश दिया कि न्यायाधीश का पहला कर्तव्य “कानून की किताब” है, न कि “कोर्ट रूम की परंपरा”।
न्यायिक उत्तरदायित्व: केवल पुलिस की गलती नहीं
यह निर्णय एक महत्वपूर्ण सिद्धांत स्थापित करता है—
जांच एजेंसी की त्रुटि को न्यायालय अपनी चूक से वैध नहीं बना सकता।
यदि पुलिस ने समय सीमा का उल्लंघन किया:
- मजिस्ट्रेट को उसे सुधारना चाहिए था
- संज्ञान लेने से पहले कानून की कसौटी पर परखना चाहिए था
अदालतें अभियोजन की “रबर स्टाम्प” नहीं हो सकतीं।
न्यायिक प्रशिक्षण की आवश्यकता
उच्च न्यायालय द्वारा न्यायिक प्रशिक्षण संस्थान को दिए गए निर्देश यह दर्शाते हैं कि समस्या केवल एक केस तक सीमित नहीं है।
निचली अदालतों में:
- परिसीमा काल पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता
- संज्ञान को औपचारिक प्रक्रिया समझ लिया जाता है
यह फैसला न्यायिक शिक्षा के महत्व को रेखांकित करता है।
विधि व्यवसाय के लिए सीख
1. बचाव पक्ष के लिए
वकीलों के लिए यह निर्णय अत्यंत महत्वपूर्ण है:
- चार्जशीट की तिथि बनाम घटना की तिथि जांचें
- संज्ञान आदेश को पढ़ें
- यदि देरी है, तो धारा 468–473 का प्रश्न अवश्य उठाएँ
कई मामलों में यह तकनीकी नहीं, बल्कि मौलिक अधिकार का मुद्दा होता है।
2. अभियोजन के लिए
राज्य को यह समझना होगा कि:
- जांच में सुस्ती न्याय में बाधा है
- देरी का कारण रिकॉर्ड करना अनिवार्य है
- न्यायालय को समय पर सूचित करना चाहिए
न्याय प्रणाली के लिए व्यापक प्रभाव
यह निर्णय निम्नलिखित सिद्धांतों को मजबूत करता है:
✔ कानून सर्वोपरि है
✔ न्यायिक विवेक का प्रयोग अनिवार्य है
✔ प्रक्रियात्मक प्रावधान मौलिक अधिकारों से जुड़े हैं
✔ देरी को सामान्य नहीं माना जा सकता
समाज के दृष्टिकोण से महत्व
जब अदालतें ऐसे मामलों में हस्तक्षेप करती हैं, तो संदेश केवल न्यायपालिका को नहीं, बल्कि समाज को भी जाता है कि:
- राज्य असीमित शक्ति का प्रयोग नहीं कर सकता
- नागरिक कानून के संरक्षण में है
- प्रक्रिया की शुचिता (Procedural Fairness) ही न्याय की आत्मा है
निष्कर्ष: विधि शासन की पुनः पुष्टि
इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह निर्णय एक मूलभूत सिद्धांत को पुनर्स्थापित करता है—
“विधि शासन (Rule of Law)” का अर्थ है कि हर कार्य कानून के अनुसार हो, न कि सुविधा या परंपरा के अनुसार।
यदि अदालतें स्वयं “सामान्य प्रचलन” को कानून से ऊपर रखने लगें, तो न्याय प्रणाली की विश्वसनीयता कमजोर पड़ जाएगी।
यह फैसला बताता है कि:
- समय सीमा केवल तकनीकी प्रावधान नहीं
- यह नागरिक स्वतंत्रता की सुरक्षा कवच है
अंततः, यह निर्णय याद दिलाता है कि न्याय केवल अपराधियों को दंडित करने का साधन नहीं, बल्कि निर्दोषों को राज्य की लापरवाही से बचाने का भी तंत्र है।
और यही सच्चे अर्थों में न्यायपालिका की संवैधानिक भूमिका है।