कमाने वाली पत्नी और भरण-पोषण का अधिकार: धारा 125 CrPC / धारा 144 BNSS के तहत इलाहाबाद हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण निर्णय (अंकित साहा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, 2025)
प्रस्तावना: क्या भरण-पोषण एक स्वतःसिद्ध अधिकार है?
भारतीय पारिवारिक कानून में भरण-पोषण (Maintenance) को सामाजिक न्याय का एक महत्वपूर्ण उपकरण माना गया है। इसका उद्देश्य उस व्यक्ति को आर्थिक सुरक्षा देना है जो स्वयं का भरण-पोषण करने में असमर्थ हो। परंतु बदलते सामाजिक-आर्थिक परिदृश्य में, जहाँ महिलाएँ उच्च शिक्षा प्राप्त कर स्वतंत्र रूप से रोजगार कर रही हैं, वहाँ एक जटिल प्रश्न उभरता है—
क्या एक कमाने वाली, शिक्षित और आत्मनिर्भर पत्नी भी पति से भरण-पोषण की हकदार हो सकती है?
इसी प्रश्न का उत्तर इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अंकित साहा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य (2025) के निर्णय में स्पष्ट और तर्कपूर्ण ढंग से दिया है।
मामले की पृष्ठभूमि
इस मामले में विवाद का केंद्र था:
- पत्नी द्वारा धारा 125 CrPC / धारा 144 BNSS के अंतर्गत भरण-पोषण की मांग
- जबकि पत्नी स्वयं:
- पोस्ट-ग्रेजुएट (Post-Graduate)
- वेब डिज़ाइनर
- तथा सीनियर सेल्स कोऑर्डिनेटर के पद पर कार्यरत थी
पति की स्थिति:
- पति की मासिक आय: ₹36,000/-
- पति पर:
- वृद्ध माता-पिता के भरण-पोषण
- तथा अन्य सामाजिक दायित्वों का भार
पत्नी ने यह तर्क दिया कि पति की आय पर्याप्त है और उसे भरण-पोषण मिलना चाहिए।
कानूनी प्रावधान: धारा 125 CrPC / धारा 144 BNSS
धारा 125 CrPC का उद्देश्य
धारा 125 का मूल उद्देश्य है:
- दरिद्रता और भिक्षावृत्ति को रोकना
- उन व्यक्तियों को सहायता देना:
- पत्नी
- बच्चे
- माता-पिता
जो स्वयं का भरण-पोषण करने में असमर्थ हों।
धारा 125(1)(a) CrPC / धारा 144 BNSS
पत्नी को भरण-पोषण तभी मिल सकता है जब:
- वह कानूनी रूप से विवाहित पत्नी हो
- वह स्वयं का भरण-पोषण करने में असमर्थ हो
- पति के पास पर्याप्त साधन हों
- पति ने उसे उपेक्षित या त्याग दिया हो
इन सभी शर्तों का एक साथ पूरा होना अनिवार्य है।
मुख्य कानूनी प्रश्न
इलाहाबाद हाईकोर्ट के समक्ष मुख्य प्रश्न यह था:
क्या एक शिक्षित, कार्यरत और आत्मनिर्भर पत्नी, जो स्वयं अच्छा कमा रही है, धारा 125 CrPC के अंतर्गत पति से भरण-पोषण पाने की हकदार है?
न्यायालय का विश्लेषण और दृष्टिकोण
1. “असमर्थता” (Inability to Maintain Herself) की व्याख्या
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि:
- भरण-पोषण का अधिकार स्वतःसिद्ध नहीं है
- यह अधिकार आवश्यकता-आधारित (Need-Based) है
यदि पत्नी:
- शिक्षित है
- कार्यरत है
- स्वयं की आय से अपना जीवन निर्वाह कर सकती है
तो उसे “असमर्थ” नहीं कहा जा सकता।
2. पत्नी की आय और योग्यता
अदालत ने विशेष रूप से ध्यान दिया कि पत्नी:
- पोस्ट-ग्रेजुएट है
- एक तकनीकी पेशे (Web Designer) से जुड़ी है
- सीनियर पद पर कार्यरत है
न्यायालय ने कहा:
ऐसी महिला, जो पेशेवर रूप से योग्य और कार्यरत है, उसे केवल ‘पत्नी’ होने के आधार पर भरण-पोषण नहीं दिया जा सकता।
3. पति की आय “कम” नहीं मानी गई
पति की आय ₹36,000 प्रतिमाह थी।
न्यायालय ने कहा कि:
- एक अकेली पत्नी के लिए
- जिस पर कोई आश्रित नहीं है
₹36,000 को कम आय नहीं कहा जा सकता, विशेषकर तब जब:
- पति पर वृद्ध माता-पिता का भरण-पोषण
- तथा सामाजिक दायित्व भी हों
4. भरण-पोषण का उद्देश्य: समानता, न कि दुरुपयोग
कोर्ट ने यह भी कहा कि:
- भरण-पोषण कानून का उद्देश्य:
- आर्थिक शोषण रोकना है
- न कि:
- एक सक्षम व्यक्ति को दूसरे पर आश्रित बनाना
यदि कमाने वाली पत्नी को भी स्वतः भरण-पोषण दिया जाए, तो यह कानून का दुरुपयोग होगा।
लैंगिक समानता और आधुनिक दृष्टिकोण
यह निर्णय लैंगिक समानता की दिशा में भी महत्वपूर्ण है।
न्यायालय का संदेश:
- कानून केवल महिलाओं के पक्ष में नहीं
- बल्कि न्याय और संतुलन के पक्ष में है
यदि:
- पत्नी सक्षम है
- और पति सीमित साधनों में अन्य दायित्व निभा रहा है
तो कानून पति को अत्यधिक बोझ नहीं डाल सकता।
पूर्ववर्ती न्यायिक दृष्टांतों से सामंजस्य
यह निर्णय सुप्रीम कोर्ट के अनेक फैसलों की भावना के अनुरूप है, जिनमें कहा गया है कि:
- भरण-पोषण गरीबी उन्मूलन का उपाय है, आय-समानता का नहीं
- सक्षम पत्नी को भरण-पोषण देना अनिवार्य नहीं
याचिका का परिणाम
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने:
- पत्नी की भरण-पोषण याचिका को
- खारिज (Dismiss) कर दिया
और स्पष्ट किया कि:
धारा 125 CrPC / धारा 144 BNSS के तहत भरण-पोषण केवल उसी पत्नी को मिल सकता है, जो स्वयं का भरण-पोषण करने में असमर्थ हो।
इस फैसले का व्यापक प्रभाव
1. पारिवारिक न्यायालयों के लिए मार्गदर्शन
- कमाने वाली पत्नी के मामलों में
- आय, योग्यता और वास्तविक आवश्यकता का मूल्यांकन अनिवार्य
2. भरण-पोषण कानून के दुरुपयोग पर रोक
- केवल वैवाहिक विवाद के कारण
- भरण-पोषण नहीं दिया जा सकता
3. पुरुषों के अधिकारों पर संतुलित दृष्टिकोण
- पति की जिम्मेदारियों और सीमाओं को भी महत्व
आलोचना और समर्थन
समर्थन
- न्यायसंगत और यथार्थवादी दृष्टिकोण
- लैंगिक तटस्थता को बढ़ावा
आलोचना
- कुछ का मत कि
- पत्नी की जीवन-शैली और सामाजिक स्तर भी देखना चाहिए
हालाँकि अदालत ने स्पष्ट किया कि कानून आवश्यकता पर आधारित है, सुविधा पर नहीं।
निष्कर्ष: आत्मनिर्भरता के युग में भरण-पोषण का नया अर्थ
अंकित साहा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2025) का यह निर्णय स्पष्ट करता है कि:
भरण-पोषण कोई पुरस्कार नहीं, बल्कि एक सामाजिक सुरक्षा उपाय है।
यदि पत्नी:
- शिक्षित
- कार्यरत
- और आत्मनिर्भर है
तो उसे पति से भरण-पोषण की मांग करने का स्वतः अधिकार नहीं है।
यह फैसला:
- कानून
- समानता
- और सामाजिक यथार्थ
तीनों के बीच संतुलन स्थापित करता है और भारतीय पारिवारिक कानून को आधुनिक संदर्भ में व्याख्यायित करता है।