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कमज़ोर साक्ष्य पर नहीं टिक सकती दोषसिद्धि: 24 वर्ष पुराने बलात्कार मामले में गुजरात के डॉक्टर को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत

कमज़ोर साक्ष्य पर नहीं टिक सकती दोषसिद्धि: 24 वर्ष पुराने बलात्कार मामले में गुजरात के डॉक्टर को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत

          भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली में “संदेह से परे प्रमाण” (Proof Beyond Reasonable Doubt) का सिद्धांत सर्वोपरि माना जाता है। इसी सिद्धांत को पुनः पुष्ट करते हुए Supreme Court of India ने गुजरात के एक डॉक्टर को 24 वर्ष पुराने बलात्कार के मामले में बरी कर दिया। शीर्ष अदालत ने अपने ऐतिहासिक फैसले में स्पष्ट किया कि अपराध चाहे कितना भी गंभीर क्यों न हो, दोषसिद्धि केवल मजबूत, सुसंगत और विश्वसनीय साक्ष्यों के आधार पर ही की जा सकती है। विरोधाभासी गवाही, कमजोर चिकित्सा प्रमाण और अनुमानों के सहारे किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता छीनी नहीं जा सकती।


मामले की पृष्ठभूमि

       यह मामला वर्ष 2001 का है, जब गुजरात के हिम्मतनगर में स्थित एक निजी क्लिनिक में उपचार के दौरान एक महिला ने डॉक्टर पर यौन उत्पीड़न और बलात्कार का आरोप लगाया। महिला की शिकायत के आधार पर पुलिस ने प्राथमिकी (FIR) दर्ज की और डॉक्टर जयंतीभाई चतुरभाई पटेल को भारतीय दंड संहिता की संबंधित धाराओं के तहत आरोपी बनाया गया।

      उस समय यह मामला अत्यंत संवेदनशील माना गया, क्योंकि आरोप चिकित्सा पेशे से जुड़े एक व्यक्ति पर था। प्रारंभिक जांच और चार्जशीट दाखिल होने के बाद मामला सत्र न्यायालय के समक्ष विचाराधीन हुआ।


ट्रायल कोर्ट का फैसला

      सत्र न्यायालय ने वर्ष 2003 में निर्णय सुनाते हुए डॉक्टर को दोषी ठहराया और उन्हें छह वर्ष के कठोर कारावास की सजा दी। ट्रायल कोर्ट ने माना कि—

  • शिकायतकर्ता की FIR
  • अभियोजन पक्ष की गवाही
  • तथा उपलब्ध चिकित्सा साक्ष्य

दोषसिद्धि के लिए पर्याप्त हैं।

हालांकि, बचाव पक्ष ने तभी से यह तर्क दिया कि—

  • शिकायतकर्ता की गवाही में गंभीर विरोधाभास हैं
  • चिकित्सा प्रमाण आरोपों की पुष्टि नहीं करते
  • और अभियोजन का पूरा मामला संदेहास्पद है

इसके बावजूद सत्र न्यायालय ने डॉक्टर को दोषी करार दिया।


गुजरात उच्च न्यायालय का निर्णय

      डॉक्टर ने दोषसिद्धि के विरुद्ध Gujarat High Court में अपील दायर की। वहीं राज्य सरकार ने सजा बढ़ाने की मांग की, यह कहते हुए कि छह वर्ष की सजा न्यूनतम वैधानिक सजा से कम है।

उच्च न्यायालय ने—

  • दोषसिद्धि को बरकरार रखा
  • सजा को छह वर्ष से बढ़ाकर दस वर्ष कर दिया

यह निर्णय आरोपी के लिए और अधिक कठोर सिद्ध हुआ। इसके बाद डॉक्टर ने अंतिम उपाय के रूप में सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया।


सुप्रीम कोर्ट में विचारणीय मुख्य प्रश्न

सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष निम्नलिखित प्रमुख प्रश्न थे:

  1. क्या अभियोजन पक्ष अपराध को संदेह से परे साबित कर पाया?
  2. क्या विरोधी (Hostile) गवाहों की गवाही पर दोषसिद्धि टिक सकती है?
  3. क्या चिकित्सा एवं फोरेंसिक साक्ष्य अभियोजन के आरोपों का समर्थन करते हैं?
  4. क्या निचली अदालतों ने अनुमानों और अटकलों के आधार पर दोषसिद्धि की?

अभियोजन गवाहों की विरोधाभासी गवाही

सुप्रीम कोर्ट ने विशेष रूप से शिकायतकर्ता और उसके पति की गवाही पर ध्यान केंद्रित किया। ट्रायल के दौरान—

  • दोनों ने अभियोजन का पूर्ण समर्थन नहीं किया
  • उन्हें विरोधी गवाह (Hostile Witness) घोषित किया गया

न्यायालय ने दो टूक कहा कि:

“विरोधी गवाह की गवाही को स्वतः खारिज नहीं किया जाता, लेकिन जब वही गवाही अविश्वसनीय, असंगत और अस्थिर हो, तो उस पर दोषसिद्धि आधारित नहीं की जा सकती।”

पीठ ने पाया कि शिकायतकर्ता की गवाही FIR से मेल नहीं खाती थी और कई महत्वपूर्ण तथ्यों पर वह अपने ही बयान से पलट गई।


चिकित्सा एवं फोरेंसिक साक्ष्यों की समीक्षा

सुप्रीम कोर्ट ने चिकित्सा साक्ष्यों का भी गहन परीक्षण किया। रिकॉर्ड से यह सामने आया कि—

  • पीड़िता के शरीर पर ऐसे कोई घाव या निशान नहीं थे जो जबरन यौन संबंध का संकेत दें
  • डॉक्टरों की रिपोर्ट निर्णायक नहीं थी
  • फोरेंसिक साक्ष्य अभियोजन के पक्ष को मजबूत नहीं करते

न्यायालय ने कहा:

“चिकित्सा साक्ष्य यदि अभियोजन की कहानी की पुष्टि नहीं करते, तो केवल मौखिक आरोपों के आधार पर दोषसिद्धि नहीं की जा सकती।”


बरामदगी और पंच गवाहों पर संदेह

उच्च न्यायालय ने कपड़ों और अन्य वस्तुओं की बरामदगी को महत्वपूर्ण माना था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस पर भी गंभीर सवाल उठाए।

  • पंच गवाहों ने स्वीकार किया कि उनसे तैयार दस्तावेजों पर हस्ताक्षर कराए गए
  • उन्हें सामग्री की वास्तविक जानकारी नहीं थी

अदालत ने माना कि ऐसी बरामदगी साक्ष्य की विश्वसनीयता संदेहास्पद है और इसे दोषसिद्धि का आधार नहीं बनाया जा सकता।


अनुमानों पर आधारित निष्कर्षों की आलोचना

सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालतों द्वारा अपनाए गए “अनुमान सिद्धांत” की कड़ी आलोचना की। विशेष रूप से इस धारणा को अस्वीकार किया गया कि—

  • शिकायतकर्ता और उसका पति आरोपी के प्रभाव में आ गए होंगे

न्यायालय ने स्पष्ट कहा:

“अनुमान, संदेह या अटकलें कानूनी प्रमाण का स्थान नहीं ले सकतीं।”


सुप्रीम कोर्ट का अंतिम निर्णय

सभी साक्ष्यों और परिस्थितियों का मूल्यांकन करने के बाद सुप्रीम कोर्ट इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि—

  • अभियोजन पक्ष अपराध को संदेह से परे साबित करने में असफल रहा
  • ट्रायल कोर्ट और गुजरात उच्च न्यायालय ने गंभीर त्रुटियां कीं
  • दोषसिद्धि कमजोर और अविश्वसनीय साक्ष्यों पर आधारित थी

परिणामस्वरूप—

  • दोषसिद्धि और सजा रद्द कर दी गई
  • आरोपी डॉक्टर को पूर्ण रूप से बरी किया गया

चूंकि आरोपी पहले से जमानत पर थे, उनकी जमानत समाप्त कर दी गई और 24 वर्षों से चला आ रहा यह मामला समाप्त हो गया।


फैसले का व्यापक प्रभाव

यह निर्णय कई महत्वपूर्ण सिद्धांतों को दोहराता है:

  1. गंभीर आरोप भी प्रमाण के मानक को कम नहीं कर सकते
  2. विरोधी गवाहों पर आंख मूंदकर भरोसा नहीं किया जा सकता
  3. चिकित्सा साक्ष्य की भूमिका निर्णायक होती है
  4. अनुमान दोषसिद्धि का आधार नहीं बन सकते

यह फैसला न केवल आरोपी के लिए न्याय का प्रतीक है, बल्कि यह न्यायालयों को यह भी याद दिलाता है कि भावनाओं या सामाजिक दबाव के बजाय कानून और साक्ष्य के आधार पर निर्णय लिया जाना चाहिए।


निष्कर्ष

       24 वर्ष पुराने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली में एक मजबूत संदेश देता है कि न्याय केवल आरोपों से नहीं, बल्कि प्रमाणों से चलता है। यह निर्णय यह भी सुनिश्चित करता है कि निर्दोष व्यक्ति को केवल आरोपों की गंभीरता के कारण दंडित न किया जाए।


केस विवरण

  • केस संख्या: आपराधिक अपील संख्या 890-891 / 2017
  • अपीलकर्ता: जयंतीभाई चतुरभाई पटेल
  • प्रतिवादी: गुजरात राज्य
  • न्यायालय: Supreme Court of India