“एपिसोडिक नहीं, बल्कि ‘वास्तुकला’ भूमिका”: दिल्ली दंगों के कथित बड़े षड्यंत्र मामले में उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत से इनकार — सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणी
भूमिका : जब जमानत नहीं, बल्कि साजिश की संरचना पर बहस हो
दिल्ली दंगों से जुड़े कथित “बड़े षड्यंत्र” मामले में सुप्रीम कोर्ट का 5 जनवरी, सोमवार का आदेश केवल एक जमानत याचिका का निपटारा नहीं है, बल्कि यह उस कानूनी और संवैधानिक बहस का विस्तार है, जिसमें राज्य की सुरक्षा, व्यक्तिगत स्वतंत्रता, और आतंकवाद विरोधी कानूनों की व्याख्या आमने–सामने खड़ी दिखाई देती हैं।
अदालत ने उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत देने से इनकार करते हुए जो शब्द प्रयोग किए — “episodic नहीं, बल्कि architectural role” — वे इस आदेश को साधारण से असाधारण बनाते हैं।
यह टिप्पणी संकेत देती है कि अदालत ने आरोपितों की भूमिका को किसी एक भाषण, एक घटना या एक अलग–थलग कार्रवाई तक सीमित नहीं माना, बल्कि कथित साजिश की पूरी संरचना (architecture) में उनकी भूमिका को केंद्रीय और मौलिक (central and foundational) माना।
मामले की पृष्ठभूमि : दिल्ली दंगे और ‘बड़े षड्यंत्र’ का आरोप
फरवरी 2020 में उत्तर–पूर्वी दिल्ली में हुए दंगों ने न केवल सैकड़ों परिवारों को उजाड़ा, बल्कि भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली के सामने भी कई गंभीर प्रश्न खड़े किए।
इन दंगों में 50 से अधिक लोगों की मृत्यु हुई, सैकड़ों घायल हुए और व्यापक संपत्ति–नुकसान हुआ।
दिल्ली पुलिस ने दंगों को स्वतःस्फूर्त हिंसा नहीं, बल्कि पूर्व नियोजित साजिश का परिणाम बताते हुए UAPA (गैरकानूनी गतिविधि (निवारण) अधिनियम) के तहत कई लोगों के खिलाफ मामले दर्ज किए।
इसी कथित “बड़े षड्यंत्र” में उमर खालिद और शरजील इमाम को प्रमुख आरोपी बनाया गया।
आरोपों का सार : पुलिस का दृष्टिकोण
अभियोजन के अनुसार—
- विरोध प्रदर्शनों की आड़ में
- CAA–NRC के खिलाफ जनभावनाओं को उकसाया गया
- सोशल मीडिया, भाषणों और बैठकों के माध्यम से
- हिंसा को रणनीतिक रूप से भड़काया गया
पुलिस का दावा है कि उमर खालिद और शरजील इमाम केवल वक्ताओं या प्रदर्शनकारियों की भूमिका में नहीं थे, बल्कि वे योजना–निर्माता, वैचारिक सूत्रधार और समन्वयकर्ता थे।
जमानत पर सुप्रीम कोर्ट का दृष्टिकोण
सुप्रीम कोर्ट ने जमानत पर विचार करते समय सामान्य आपराधिक मामलों और UAPA के मामलों के बीच स्पष्ट अंतर रेखांकित किया।
UAPA और जमानत का कठोर मानक
UAPA की धारा 43D(5) के तहत, यदि—
- आरोप prima facie सत्य प्रतीत होते हों
- केस डायरी और चार्जशीट से प्रथम दृष्टया संलिप्तता झलकती हो
तो अदालत को जमानत देने से परहेज़ करना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस चरण पर सबूतों का अंतिम मूल्यांकन नहीं, बल्कि यह देखना पर्याप्त है कि अभियोजन का संस्करण पूरी तरह अविश्वसनीय तो नहीं है।
“एपिसोडिक नहीं, बल्कि वास्तुकला भूमिका” — शब्दों का कानूनी महत्व
अदालत की यह टिप्पणी इस आदेश का केंद्रबिंदु है।
एपिसोडिक भूमिका क्या होती है?
- कोई एक भाषण
- किसी एक दिन की भागीदारी
- किसी एक घटना से जुड़ा कृत्य
यदि भूमिका केवल इतनी सीमित हो, तो अदालत अक्सर जमानत पर सहानुभूतिपूर्ण दृष्टिकोण अपना सकती है।
वास्तुकला (Architectural) भूमिका का अर्थ
- साजिश की रूपरेखा तैयार करना
- वैचारिक दिशा देना
- अलग–अलग कड़ियों को जोड़ना
- रणनीति और समय–निर्धारण में भूमिका
सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, उमर खालिद और शरजील इमाम की भूमिका इसी श्रेणी में आती है, जो उन्हें कथित साजिश की श्रृंखला के शीर्ष (top of the chain) पर रखती है।
“केंद्रीय और मौलिक भूमिका” — अदालत का निष्कर्ष
अदालत ने यह भी कहा कि—
- दोनों आरोपियों की भूमिका peripheral नहीं थी
- वे महज़ समर्थक या अनुयायी नहीं थे
- बल्कि कथित योजना के मुख्य स्तंभ थे
यह टिप्पणी जमानत की संभावना को लगभग समाप्त कर देती है, क्योंकि UAPA मामलों में नेतृत्वकारी भूमिका को अत्यंत गंभीर माना जाता है।
बचाव पक्ष के तर्क : स्वतंत्रता बनाम सुरक्षा
उमर खालिद और शरजील इमाम की ओर से यह दलील दी गई कि—
- उनके भाषण संवैधानिक अधिकार के दायरे में थे
- असहमति और आलोचना को आतंकवाद से नहीं जोड़ा जा सकता
- वर्षों से ट्रायल शुरू नहीं हुआ है
- लंबी कैद “सज़ा से पहले दंड” के समान है
बचाव पक्ष ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता (Article 21) और स्पीडी ट्रायल के सिद्धांत पर ज़ोर दिया।
अदालत का संतुलन : व्यक्तिगत स्वतंत्रता बनाम सामूहिक शांति
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता संविधान का मूल है, लेकिन यह भी स्पष्ट किया कि—
“जब आरोप राष्ट्रीय अखंडता, सार्वजनिक व्यवस्था और सामूहिक शांति को प्रभावित करने वाले हों, तब अदालत को अत्यधिक सतर्क रहना होता है।”
अदालत ने संकेत दिया कि स्वतंत्रता का अधिकार पूर्ण (absolute) नहीं है, विशेषकर तब, जब आरोप गंभीर प्रकृति के हों।
लंबी हिरासत और ट्रायल में देरी का सवाल
यह मामला भारत में UAPA के तहत लंबी न्यायिक हिरासत की बहस को फिर से जीवित करता है।
- कई आरोपी वर्षों से जेल में हैं
- ट्रायल अभी भी प्रारंभिक चरण में है
- गवाहों की संख्या सैकड़ों में है
हालांकि, इस आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि केवल हिरासत की अवधि, जमानत का स्वतः आधार नहीं बन सकती, यदि आरोप गंभीर और prima facie विश्वसनीय हों।
राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रियाएँ
इस आदेश के बाद—
- एक वर्ग ने इसे कानून–व्यवस्था की जीत बताया
- दूसरे वर्ग ने इसे असहमति के अपराधीकरण के रूप में देखा
मानवाधिकार संगठनों ने ट्रायल में देरी पर चिंता जताई, जबकि सरकार समर्थक हलकों ने अदालत की टिप्पणी को “सख़्त लेकिन आवश्यक” कहा।
कानूनी दृष्टि से दूरगामी प्रभाव
यह आदेश भविष्य में—
- UAPA मामलों में जमानत की कसौटी
- “नेतृत्वकारी भूमिका” की परिभाषा
- भाषण और साजिश के बीच अंतर
पर गहरा प्रभाव डालेगा।
विशेष रूप से “architectural role” जैसी भाषा, निचली अदालतों और उच्च न्यायालयों के लिए एक नया न्यायिक संकेत (judicial signal) बन सकती है।
निष्कर्ष : जमानत से इनकार, पर बहस जारी
सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश यह स्पष्ट करता है कि दिल्ली दंगों का मामला केवल कानून का नहीं, बल्कि लोकतंत्र की सीमाओं, असहमति के स्वरूप, और राज्य की सुरक्षा की अवधारणा से जुड़ा है।
उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत न देना इस बात का संकेत है कि अदालत ने अभियोजन के कथन को इस स्तर पर पर्याप्त गंभीर माना।
हालाँकि, अंतिम सत्य का निर्धारण अभी शेष है, जो केवल पूर्ण ट्रायल के बाद ही संभव होगा।
जब तक वह दिन नहीं आता, यह मामला भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली में स्वतंत्रता बनाम सुरक्षा की बहस का एक सशक्त और विवादास्पद अध्याय बना रहेगा।