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उपभोक्ता अधिकार बनाम सेलिब्रिटी एंडोर्समेंट: क्या ब्रांड एंबेसडर अनुचित व्यापार व्यवहार या सेवा में कमी के लिए उत्तरदायी हो सकता है?

उपभोक्ता अधिकार बनाम सेलिब्रिटी एंडोर्समेंट: क्या ब्रांड एंबेसडर अनुचित व्यापार व्यवहार या सेवा में कमी के लिए उत्तरदायी हो सकता है? — केरल हाईकोर्ट का ऐतिहासिक दृष्टिकोण

भूमिका

      आज के डिजिटल और विज्ञापन-प्रधान युग में, उपभोक्ता का भरोसा केवल उत्पाद या सेवा पर नहीं, बल्कि उसे प्रचारित करने वाले सेलिब्रिटी ब्रांड एंबेसडर पर भी टिका होता है। टेलीविजन, सोशल मीडिया और प्रिंट मीडिया में प्रसिद्ध चेहरों के माध्यम से प्रचारित उत्पाद उपभोक्ताओं के निर्णय को गहराई से प्रभावित करते हैं।

ऐसे में एक बड़ा प्रश्न उठता है—
यदि किसी सेवा या उत्पाद में कमी हो, या वह उपभोक्ता के साथ धोखा करे, तो क्या उसका प्रचार करने वाला सेलिब्रिटी भी कानूनी रूप से जिम्मेदार ठहराया जा सकता है?

       इसी प्रश्न का उत्तर हाल ही में केरल हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में दिया, जिसमें कहा गया कि ब्रांड एंबेसडर को तब तक उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता, जब तक उसका उपभोक्ता के साथ प्रत्यक्ष लेन-देन से कोई स्पष्ट संबंध न हो।

      यह फैसला उपभोक्ता कानून, विज्ञापन नैतिकता और सेलिब्रिटी जिम्मेदारी — तीनों के लिए एक नया मानक स्थापित करता है।


मामले की पृष्ठभूमि

     यह विवाद एक गोल्ड लोन सेवा से जुड़ा था, जिसमें एक प्रसिद्ध कंपनी ने अपने प्रचार के लिए एक लोकप्रिय सेलिब्रिटी को ब्रांड एंबेसडर नियुक्त किया था। उपभोक्ता ने कंपनी से गोल्ड लोन लिया, लेकिन बाद में सेवा में कथित कमी और अनुचित व्यवहार को लेकर शिकायत दर्ज की।

      उपभोक्ता ने न केवल कंपनी के खिलाफ, बल्कि उसके विज्ञापन में दिखाई देने वाले सेलिब्रिटी ब्रांड एंबेसडर के खिलाफ भी उपभोक्ता मंच में शिकायत कर दी।

तर्क यह दिया गया कि—

“मैंने इस सेवा पर भरोसा इसलिए किया क्योंकि एक प्रसिद्ध और विश्वसनीय व्यक्ति इसका प्रचार कर रहा था।”

      यहीं से यह कानूनी बहस शुरू हुई कि क्या केवल प्रचार करना किसी व्यक्ति को सेवा प्रदाता बना देता है?


केरल हाईकोर्ट का स्पष्ट रुख

     केरल हाईकोर्ट ने इस प्रश्न का सीधा और व्यावहारिक उत्तर दिया—

ब्रांड एंबेसडर को उपभोक्ता कानून के अंतर्गत तब तक उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता, जब तक वह उपभोक्ता के साथ प्रत्यक्ष लेन-देन या सेवा प्रदान करने की प्रक्रिया में शामिल न हो।

अदालत ने कहा कि—

  • ब्रांड एंबेसडर केवल प्रचारक होता है, सेवा प्रदाता नहीं।
  • उपभोक्ता और ब्रांड एंबेसडर के बीच कोई संविदात्मक (contractual) संबंध नहीं होता।
  • उत्तरदायित्व तभी बनता है जब “ट्रांजैक्शनल नेक्सस” अर्थात लेन-देन से प्रत्यक्ष संबंध साबित हो।

उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 के संदर्भ में

उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 में—

  • सेवा प्रदाता वह होता है जो प्रत्यक्ष रूप से सेवा प्रदान करता है।
  • अनुचित व्यापार व्यवहार वह है जो उपभोक्ता को धोखा दे या भ्रमित करे।

लेकिन अदालत ने स्पष्ट किया कि—

केवल किसी उत्पाद का प्रचार करना, सेवा प्रदान करने के बराबर नहीं है।

यदि कोई सेलिब्रिटी जानबूझकर झूठा दावा करे, भ्रामक जानकारी दे या धोखाधड़ी में सक्रिय रूप से शामिल हो, तभी उस पर उत्तरदायित्व बन सकता है।


“ट्रांजैक्शनल नेक्सस” का कानूनी अर्थ

अदालत ने “Transactional Nexus” को इस निर्णय की आत्मा बताया। इसका अर्थ है—

  • क्या ब्रांड एंबेसडर ने उपभोक्ता को सीधे कोई सेवा दी?
  • क्या उसने पैसे लिए?
  • क्या वह अनुबंध का पक्षकार था?
  • क्या उसने सेवा की शर्तें तय कीं?

यदि इन सभी का उत्तर “नहीं” है, तो वह उपभोक्ता विवाद में पक्षकार नहीं बन सकता।


उपभोक्ता के अधिकार फिर भी सुरक्षित

यह फैसला यह नहीं कहता कि उपभोक्ता पूरी तरह असहाय है। उपभोक्ता अब भी—

  • कंपनी के खिलाफ
  • सेवा प्रदाता के खिलाफ
  • विज्ञापन एजेंसी के खिलाफ
    कानूनी कार्रवाई कर सकता है।

बस, बिना ठोस आधार के सेलिब्रिटी को घसीटना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग माना जाएगा।


विज्ञापन नैतिकता और सेलिब्रिटी की भूमिका

हालांकि अदालत ने कानूनी उत्तरदायित्व से राहत दी, लेकिन नैतिक जिम्मेदारी को नकारा नहीं।

आज एक सेलिब्रिटी का एक शब्द लाखों लोगों के फैसले बदल देता है। इसलिए—

  • उन्हें प्रचार से पहले उत्पाद की सच्चाई समझनी चाहिए।
  • भ्रामक, अतिशयोक्तिपूर्ण या झूठे दावों से बचना चाहिए।
  • समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझनी चाहिए।

कानून भले ही उन्हें तुरंत दोषी न ठहराए, लेकिन जनता की नजर में उनकी साख दांव पर होती है।


पूर्व न्यायिक दृष्टांत

भारतीय न्यायालयों ने पहले भी यह माना है कि—

  • हर प्रचारक को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
  • जिम्मेदारी तभी बनेगी जब मंशा, जानकारी और भागीदारी सिद्ध हो।

यह फैसला उसी न्यायिक परंपरा को आगे बढ़ाता है।


सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स पर प्रभाव

यह निर्णय केवल फिल्मी सितारों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि—

  • यूट्यूबर्स
  • इंस्टाग्राम इन्फ्लुएंसर्स
  • डिजिटल प्रमोटर्स

सभी पर लागू होगा।

यदि वे केवल प्रचार कर रहे हैं और सेवा का हिस्सा नहीं हैं, तो वे स्वतः सेवा प्रदाता नहीं बन जाते।


उपभोक्ता मंचों के लिए संदेश

इस फैसले से उपभोक्ता मंचों को भी यह मार्गदर्शन मिला है कि—

  • हर प्रसिद्ध नाम को पक्षकार बनाना आवश्यक नहीं।
  • पहले यह देखा जाए कि उसका वास्तविक कानूनी संबंध क्या है।
  • केवल भावनात्मक या अनुमानित आधार पर उत्तरदायित्व तय न किया जाए।

कंपनियों के लिए चेतावनी

कंपनियों को अब यह नहीं मान लेना चाहिए कि—

“सेलिब्रिटी को आगे कर दो, जिम्मेदारी उससे बच जाएगी।”

असल जिम्मेदारी कंपनी की ही रहती है। उपभोक्ता संरक्षण कानून में सेवा प्रदाता ही मुख्य उत्तरदायी होता है।


उपभोक्ता के लिए व्यावहारिक सीख

इस फैसले से उपभोक्ताओं को यह समझना चाहिए कि—

  • विज्ञापन केवल सूचना है, गारंटी नहीं।
  • निर्णय हमेशा शर्तें, दस्तावेज और सेवा गुणवत्ता देखकर लें।
  • केवल चेहरे पर भरोसा करके वित्तीय निर्णय न करें।

अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण से तुलना

अमेरिका और यूरोप में भी यही सिद्धांत लागू होता है कि—

  • प्रचारक तभी जिम्मेदार होगा जब उसने भ्रामक प्रचार में जानबूझकर भाग लिया हो।
  • अन्यथा उत्तरदायित्व कंपनी पर ही रहता है।

केरल हाईकोर्ट का फैसला भारतीय कानून को वैश्विक मानकों के अनुरूप बनाता है।


मीडिया और न्यायिक संतुलन

यह निर्णय न्यायपालिका की उस संतुलित सोच को दर्शाता है, जिसमें—

  • उपभोक्ता संरक्षण भी सुरक्षित है
  • और निर्दोष व्यक्तियों को अनावश्यक मुकदमों से भी बचाया गया है

भविष्य में इसके प्रभाव

आने वाले समय में—

  • उपभोक्ता मामले अधिक स्पष्ट आधार पर दर्ज होंगे
  • सेलिब्रिटी अनुबंध अधिक सावधानी से किए जाएंगे
  • कंपनियां विज्ञापन सामग्री में अधिक सतर्क होंगी
  • उपभोक्ता अधिक जागरूक बनेंगे

निष्कर्ष

केरल हाईकोर्ट का यह निर्णय केवल एक मामले तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उपभोक्ता कानून, विज्ञापन उद्योग और सामाजिक जिम्मेदारी के बीच संतुलन का प्रतीक है।

अदालत ने साफ संदेश दिया है कि—

ब्रांड एंबेसडर केवल प्रचारक है, सेवा प्रदाता नहीं — जब तक वह सीधे लेन-देन से जुड़ा न हो।

यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से व्यावहारिक है, बल्कि समाज को यह भी सिखाता है कि भरोसा सोच-समझकर किया जाना चाहिए, केवल चेहरे देखकर नहीं।