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इंटरसेक्स व्यक्तियों के अधिकारों पर ऐतिहासिक पहल: सुप्रीम कोर्ट में PIL की सुनवाई, तीन-न्यायाधीशों की पीठ गठित

इंटरसेक्स व्यक्तियों के अधिकारों पर ऐतिहासिक पहल: सुप्रीम कोर्ट में PIL की सुनवाई, तीन-न्यायाधीशों की पीठ गठित

        भारत के संवैधानिक इतिहास में लैंगिक समानता और मानवीय गरिमा की दिशा में एक और महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए Supreme Court of India ने हाल ही में एक अत्यंत महत्वपूर्ण जनहित याचिका (Public Interest Litigation – PIL) को सुनवाई के लिए स्वीकार किया है। यह याचिका विशेष रूप से इंटरसेक्स व्यक्तियों सहित विविध लैंगिक पहचान (Gender Identity), लैंगिक अभिव्यक्ति (Gender Expression) और लैंगिक विशेषताओं (Sex Characteristics) वाले व्यक्तियों के अधिकारों की सुरक्षा, कानूनी मान्यता और स्पष्ट दिशा-निर्देशों की मांग करती है।

        माननीय न्यायालय ने इस मुद्दे की गंभीरता और व्यापक सामाजिक प्रभाव को स्वीकार करते हुए यह निर्देश दिया है कि इस मामले की सुनवाई तीन-न्यायाधीशों की पीठ (Three-Judge Bench) द्वारा की जाएगी। यह आदेश न केवल न्यायिक दृष्टि से बल्कि मानवाधिकार और समावेशी न्याय (Inclusive Justice) के संदर्भ में भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है।


PIL का संदर्भ और पृष्ठभूमि

        यह जनहित याचिका ऐसे समय में सामने आई है, जब भारत में लैंगिक विविधता को लेकर जागरूकता तो बढ़ी है, लेकिन इंटरसेक्स व्यक्तियों के अधिकारों को लेकर अब भी गंभीर कानूनी अस्पष्टता बनी हुई है।

         इंटरसेक्स व्यक्ति वे होते हैं जिनके जैविक लैंगिक लक्षण (Biological Sex Characteristics) — जैसे क्रोमोसोम, हार्मोन, या जननांग — पारंपरिक “पुरुष” या “महिला” की द्विआधारी (Binary) परिभाषा में पूरी तरह फिट नहीं बैठते। इसके बावजूद, भारतीय कानून व्यवस्था में लंबे समय तक इनकी पहचान और अधिकारों पर स्पष्ट और समग्र कानून का अभाव रहा है।


याचिका में उठाए गए प्रमुख मुद्दे

         इस PIL के माध्यम से याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष कई बुनियादी और संवैधानिक प्रश्न उठाए हैं, जिनमें प्रमुख हैं:

1. इंटरसेक्स व्यक्तियों की कानूनी पहचान

याचिका में यह मांग की गई है कि:

  • इंटरसेक्स व्यक्तियों को स्पष्ट और स्वतंत्र कानूनी पहचान प्रदान की जाए
  • उनकी पहचान को केवल “पुरुष”, “महिला” या “ट्रांसजेंडर” की सीमाओं में न बांधा जाए, यदि वे स्वयं ऐसा नहीं चाहते

2. शारीरिक स्वायत्तता और चिकित्सा अधिकार

PIL में विशेष रूप से यह मुद्दा उठाया गया है कि:

  • इंटरसेक्स बच्चों पर बिना सहमति के किए जाने वाले चिकित्सकीय या सर्जिकल हस्तक्षेप
  • उनके शारीरिक स्वायत्तता (Bodily Autonomy) और गरिमा के अधिकार का उल्लंघन करते हैं

याचिका में मांग की गई है कि ऐसे हस्तक्षेपों को केवल चिकित्सकीय आवश्यकता और सूचित सहमति के आधार पर ही अनुमति दी जाए।


3. संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 का उल्लंघन

याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि इंटरसेक्स व्यक्तियों के साथ होने वाला भेदभाव:

  • अनुच्छेद 14 (कानून के समक्ष समानता)
  • अनुच्छेद 15 (भेदभाव का निषेध)
  • अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार)

का सीधा उल्लंघन है।


सुप्रीम कोर्ट का रुख और तीन-न्यायाधीशों की पीठ

माननीय सुप्रीम कोर्ट ने प्रारंभिक सुनवाई में यह स्पष्ट किया कि:

“यह मामला केवल एक वर्ग के अधिकारों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह संविधान द्वारा प्रदत्त मानवीय गरिमा और समानता के मूल सिद्धांतों से जुड़ा हुआ है।”

इसी कारण न्यायालय ने निर्देश दिया कि:

  • इस मामले की सुनवाई तीन-न्यायाधीशों की पीठ द्वारा की जाएगी
  • ताकि इस विषय पर व्यापक, संतुलित और दीर्घकालिक प्रभाव वाला निर्णय दिया जा सके

यह निर्णय इस बात का संकेत है कि न्यायालय इस विषय को गंभीर संवैधानिक महत्व का मानता है।


पूर्व न्यायिक दृष्टांत और उनका प्रभाव

भारत में लैंगिक अधिकारों के संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व में भी कई ऐतिहासिक फैसले दिए हैं, जिनमें:

  • लैंगिक पहचान को व्यक्ति की आत्म-पहचान (Self-Identification) से जोड़ना
  • गरिमा, निजता और समानता को केंद्रीय मूल्य मानना

शामिल है।

हालाँकि, इंटरसेक्स व्यक्तियों के संदर्भ में अब तक कोई विशेष और व्यापक दिशा-निर्देश नहीं थे। यह PIL उसी कानूनी रिक्तता (Legal Vacuum) को भरने की दिशा में एक प्रयास है।


सामाजिक और संवैधानिक महत्व

इस मामले का महत्व केवल कानूनी नहीं, बल्कि सामाजिक और नैतिक भी है।

✔️ यह याचिका हाशिए पर पड़े समुदायों की आवाज को मुख्यधारा में लाती है
✔️ यह राज्य को याद दिलाती है कि संविधान केवल बहुसंख्यकों के लिए नहीं है
✔️ यह न्यायपालिका की भूमिका को संविधान के संरक्षक के रूप में पुनः रेखांकित करती है


मानवाधिकार और गरिमा का प्रश्न

इंटरसेक्स व्यक्तियों को अक्सर:

  • सामाजिक बहिष्कार
  • शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं में भेदभाव
  • रोजगार में असमानता
  • और पारिवारिक स्तर पर अस्वीकृति

का सामना करना पड़ता है।

यह PIL इस मूल प्रश्न को सामने लाती है कि:

क्या किसी व्यक्ति की जैविक भिन्नता उसे संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकारों से वंचित कर सकती है?

संविधान का उत्तर स्पष्ट है — नहीं।


Law Oath जैसे विधिक मंचों की भूमिका

जैसा कि Law Oath जैसे विधिक मंचों ने भी रेखांकित किया है, ऐसे संवैधानिक विकासों पर करीबी नजर रखना आवश्यक है।

  • ये मंच समानता, गरिमा और मौलिक अधिकारों की वकालत करते हैं
  • और यह सुनिश्चित करने का प्रयास करते हैं कि कानून समाज के सबसे कमजोर वर्गों तक पहुंचे

कानूनी स्पष्टता और न्यायिक दिशा-निर्देश ही वह माध्यम हैं, जिनसे वास्तविक सामाजिक परिवर्तन संभव है।


भविष्य की संभावनाएं

यदि यह PIL सफल होती है, तो इसके परिणामस्वरूप:

  • इंटरसेक्स व्यक्तियों के लिए विशेष कानूनी ढांचा विकसित हो सकता है
  • बिना सहमति चिकित्सा हस्तक्षेप पर स्पष्ट प्रतिबंध लग सकता है
  • सरकारी नीतियों में समावेशी सुधार हो सकते हैं
  • और समाज में संवेदनशीलता और स्वीकार्यता बढ़ सकती है

निष्कर्ष (Conclusion)

       सुप्रीम कोर्ट में इंटरसेक्स व्यक्तियों के अधिकारों पर सुनवाई हेतु स्वीकार की गई यह जनहित याचिका भारतीय संवैधानिक न्यायशास्त्र में एक मील का पत्थर सिद्ध हो सकती है। तीन-न्यायाधीशों की पीठ द्वारा सुनवाई का आदेश यह दर्शाता है कि न्यायालय इस विषय को केवल कानूनी विवाद नहीं, बल्कि मानवीय गरिमा, समानता और समावेशी समाज के निर्माण से जुड़ा प्रश्न मानता है।

संविधान की आत्मा यही है कि वह हर व्यक्ति को — उसकी पहचान, शरीर और अस्तित्व सहित — समान सम्मान और संरक्षण प्रदान करे।

        यह मामला आने वाले समय में न केवल इंटरसेक्स व्यक्तियों, बल्कि संपूर्ण भारतीय समाज के लिए अधिक संवेदनशील, न्यायपूर्ण और समावेशी भविष्य की दिशा तय कर सकता है।