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आरोपी को तलब करने में न्यायिक सावधानी: रिश्तेदारों व सहयोगियों को गलत तरीके से फंसाए जाने की बढ़ती प्रवृत्ति पर पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय की सख़्त टिप्पणी

आरोपी को तलब करने में न्यायिक सावधानी: रिश्तेदारों व सहयोगियों को गलत तरीके से फंसाए जाने की बढ़ती प्रवृत्ति पर पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय की सख़्त टिप्पणी

भूमिका

        भारतीय आपराधिक न्याय व्यवस्था में आरोपी को तलब करना (Summoning of Accused) एक अत्यंत गंभीर न्यायिक प्रक्रिया है। यह वह चरण है जहाँ मजिस्ट्रेट या न्यायालय यह तय करता है कि किसी व्यक्ति को आपराधिक मुकदमे का सामना करने के लिए बुलाया जाए या नहीं। यह निर्णय किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और सामाजिक जीवन को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करता है।

      हाल के वर्षों में न्यायालयों के समक्ष यह चिंता लगातार उभरकर सामने आ रही है कि आपराधिक मामलों—विशेष रूप से पारिवारिक, संपत्ति विवाद, वैवाहिक विवाद और आपसी रंजिश से जुड़े मामलों—में मुख्य आरोपी के रिश्तेदारों, परिवार के सदस्यों और सहयोगियों को भी बिना ठोस आधार के अभियुक्त बना दिया जाता है।

       इसी संदर्भ में पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में गंभीर टिप्पणी करते हुए कहा कि शिकायतकर्ताओं में यह प्रवृत्ति बढ़ रही है कि वे गलत तरीके से अधिक से अधिक लोगों को मामले में फंसा दें, जिससे न केवल न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग होता है बल्कि निर्दोष व्यक्तियों के मौलिक अधिकारों का भी हनन होता है।


मामले की पृष्ठभूमि

      प्रस्तुत मामले में शिकायतकर्ता द्वारा एक आपराधिक शिकायत दर्ज कराई गई थी, जिसमें मुख्य आरोपी के साथ-साथ उसके कई रिश्तेदारों, परिवार के सदस्यों और कथित सहयोगियों को भी आरोपी बनाया गया। शिकायत में यह आरोप लगाया गया कि सभी ने मिलकर अपराध को अंजाम दिया या उसकी साजिश रची।

       निचली अदालत द्वारा प्रारंभिक स्तर पर सभी नामजद व्यक्तियों को तलब करने के आदेश पारित कर दिए गए। इस आदेश को चुनौती देते हुए याचिकाकर्ताओं ने पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाया।


याचिकाकर्ताओं की दलीलें

याचिकाकर्ताओं की ओर से यह प्रमुख तर्क प्रस्तुत किए गए—

  1. सामान्य और अस्पष्ट आरोप
    शिकायत में याचिकाकर्ताओं के विरुद्ध कोई विशिष्ट भूमिका (Specific Role) नहीं बताई गई है। केवल यह कहा गया है कि वे मुख्य आरोपी के रिश्तेदार या सहयोगी हैं।
  2. रंजिशवश फंसाने की आशंका
    यह दलील दी गई कि मुख्य विवाद व्यक्तिगत या पारिवारिक प्रकृति का है, और उसी के कारण पूरे परिवार को घसीटा गया है।
  3. प्रथम दृष्टया साक्ष्य का अभाव
    न तो शिकायत में और न ही प्रारंभिक साक्ष्यों में ऐसा कोई ठोस तथ्य है जिससे यह प्रतीत हो कि याचिकाकर्ताओं ने कोई अपराध किया।
  4. न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग
    आपराधिक कानून का उपयोग दबाव बनाने और प्रतिशोध लेने के लिए किया जा रहा है, जो विधि के उद्देश्य के विपरीत है।

राज्य/शिकायतकर्ता की ओर से तर्क

शिकायतकर्ता की ओर से यह कहा गया कि—

  • अपराध सामूहिक रूप से किया गया है।
  • सभी आरोपी एक-दूसरे के साथ जुड़े हुए हैं।
  • इस स्तर पर विस्तृत साक्ष्य की मांग करना उचित नहीं है।

न्यायालय का विश्लेषण

पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने दोनों पक्षों की दलीलों पर गहन विचार करते हुए आरोपी को तलब करने के सिद्धांतों पर विस्तार से चर्चा की।

1. आरोपी को तलब करना एक गंभीर कार्य

न्यायालय ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति को आपराधिक मुकदमे में तलब करना रूटीन प्रक्रिया नहीं है। मजिस्ट्रेट को यह संतोष होना चाहिए कि—

  • शिकायत और साक्ष्य से प्रथम दृष्टया अपराध बनता है, और
  • आरोपी की विशिष्ट भूमिका स्पष्ट रूप से उभरती है।

2. रिश्तेदारों को घसीटने की बढ़ती प्रवृत्ति

न्यायालय ने सख़्त शब्दों में कहा कि—

“आजकल शिकायतकर्ताओं में यह प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है कि वे मुख्य आरोपी के साथ-साथ उसके रिश्तेदारों, परिवार के सदस्यों और सहयोगियों को भी बिना किसी ठोस आधार के फंसा देते हैं।”

यह प्रवृत्ति विशेष रूप से वैवाहिक विवाद, संपत्ति विवाद और आपसी दुश्मनी के मामलों में देखने को मिलती है।

3. विशिष्ट आरोपों का महत्व

न्यायालय ने कहा कि केवल यह तथ्य कि कोई व्यक्ति आरोपी का रिश्तेदार है, उसे अभियुक्त बनाने के लिए पर्याप्त नहीं है। शिकायत में यह स्पष्ट होना चाहिए कि—

  • उसने कौन-सा कृत्य किया,
  • कब और कैसे किया, और
  • उस कृत्य का अपराध से सीधा संबंध क्या है।

4. न्यायिक विवेक का प्रयोग

उच्च न्यायालय ने यह भी कहा कि मजिस्ट्रेट को तलब आदेश पारित करते समय यांत्रिक तरीके से कार्य नहीं करना चाहिए। उन्हें उपलब्ध सामग्री का सावधानीपूर्वक मूल्यांकन करना चाहिए, ताकि निर्दोष व्यक्तियों को अनावश्यक उत्पीड़न से बचाया जा सके।


निर्णय

उपरोक्त तथ्यों के आधार पर पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने—

  • निचली अदालत द्वारा पारित तलब आदेश को आंशिक/पूर्ण रूप से निरस्त किया (मामले के तथ्यों के अनुसार), और
  • यह स्पष्ट किया कि जिन व्यक्तियों के विरुद्ध कोई ठोस और विशिष्ट आरोप नहीं हैं, उन्हें अभियुक्त बनाए रखना न्यायसंगत नहीं है।

निर्णय का विधिक महत्व

यह निर्णय कई महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांतों को पुष्ट करता है—

  1. आपराधिक कानून का दुरुपयोग रोकना
    यह फैसला शिकायत प्रक्रिया के दुरुपयोग पर अंकुश लगाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
  2. व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा
    अनावश्यक तलब आदेश व्यक्ति की स्वतंत्रता और प्रतिष्ठा पर गंभीर प्रभाव डालते हैं।
  3. मजिस्ट्रेट की सक्रिय भूमिका
    तलब आदेश पारित करते समय न्यायिक विवेक का प्रयोग अनिवार्य है।

समकालीन न्यायिक दृष्टिकोण

देश के विभिन्न उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय ने भी समय-समय पर यह चेतावनी दी है कि आपराधिक मुकदमे बदले की भावना से नहीं चलाए जाने चाहिए। यह निर्णय उसी न्यायिक प्रवृत्ति को आगे बढ़ाता है।


निष्कर्ष

       पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय का यह निर्णय आपराधिक न्याय प्रणाली के लिए एक महत्वपूर्ण मार्गदर्शक सिद्धांत प्रस्तुत करता है। यह स्पष्ट संदेश देता है कि—

  • केवल रिश्तेदारी या संबंध के आधार पर किसी को आरोपी नहीं बनाया जा सकता।
  • शिकायतकर्ताओं द्वारा की जा रही गलत तरीके से फंसाने की प्रवृत्ति को न्यायालय स्वीकार नहीं करेगा।
  • न्यायिक प्रक्रिया का उद्देश्य न्याय सुनिश्चित करना है, न कि उत्पीड़न का साधन बनना।

        यह फैसला न केवल निर्दोष व्यक्तियों के अधिकारों की रक्षा करता है, बल्कि न्यायालयों को भी यह याद दिलाता है कि तलब करने की शक्ति का प्रयोग अत्यंत सावधानी और संतुलन के साथ किया जाना चाहिए।