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आपराधिक पुनरीक्षण याचिका संशोधनकर्ता की मृत्यु पर स्वतः समाप्त नहीं होती: पीड़ित और मुखबिर के अधिकारों पर सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक निर्णय

आपराधिक पुनरीक्षण याचिका संशोधनकर्ता की मृत्यु पर स्वतः समाप्त नहीं होती: पीड़ित और मुखबिर के अधिकारों पर सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक निर्णय

       भारत के आपराधिक न्याय तंत्र में पीड़ित के अधिकारों और न्याय की निरंतरता को लेकर भारत का सर्वोच्च न्यायालय ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण और दूरगामी प्रभाव वाला निर्णय दिया है। सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट रूप से माना है कि यदि कोई आपराधिक पुनरीक्षण याचिका (Criminal Revision Petition) आरोपी द्वारा नहीं, बल्कि मुखबिर (Informant) या पीड़ित (Victim) द्वारा दायर की गई है, तो उस संशोधनकर्ता की मृत्यु होने पर याचिका स्वतः समाप्त (Abate) नहीं होती

       यह निर्णय आपराधिक प्रक्रिया में लंबे समय से चली आ रही उस धारणा को तोड़ता है, जिसके अनुसार पक्षकार की मृत्यु के साथ ही कार्यवाही का अंत मान लिया जाता था। न्यायालय ने कहा कि आपराधिक कानून का उद्देश्य केवल आरोपी को दंडित करना ही नहीं, बल्कि पीड़ित को न्याय दिलाना भी है। ऐसे में पीड़ित या मुखबिर द्वारा दायर पुनरीक्षण याचिका को केवल मृत्यु के आधार पर समाप्त करना न्याय के मूल सिद्धांतों के विपरीत होगा।


मामले की पृष्ठभूमि

       इस प्रकरण में एक आपराधिक मामले से संबंधित पुनरीक्षण याचिका दायर की गई थी। यह याचिका आरोपी द्वारा नहीं, बल्कि उस व्यक्ति द्वारा दायर की गई थी जो मामले का मुखबिर था अथवा अपराध का प्रत्यक्ष पीड़ित। याचिका लंबित थी कि इसी बीच संशोधनकर्ता की मृत्यु हो गई।

     निचली अदालत में यह प्रश्न उठा कि क्या संशोधनकर्ता की मृत्यु के साथ ही आपराधिक पुनरीक्षण याचिका स्वतः समाप्त (Abate) मानी जाएगी? इस प्रश्न के उत्तर में विभिन्न न्यायालयों के दृष्टिकोण अलग-अलग रहे थे, जिसके कारण विधिक स्थिति अस्पष्ट बनी हुई थी। इसी अस्पष्टता को दूर करने के लिए मामला अंततः सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष आया।


मुख्य विधिक प्रश्न

सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष विचारणीय मुख्य प्रश्न यह था—

क्या आपराधिक पुनरीक्षण याचिका, जो आरोपी द्वारा नहीं बल्कि पीड़ित या मुखबिर द्वारा दायर की गई हो, संशोधनकर्ता की मृत्यु के पश्चात स्वतः समाप्त हो जाती है?


आपराधिक पुनरीक्षण की अवधारणा

      आपराधिक पुनरीक्षण (Criminal Revision) का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि निचली अदालतों द्वारा पारित आदेश विधि के अनुरूप हों। यह अपील से भिन्न है, क्योंकि इसमें साक्ष्यों के पुनर्मूल्यांकन के बजाय विधिक त्रुटियों, प्रक्रिया की अनियमितताओं और न्याय के उल्लंघन की जांच की जाती है।

पुनरीक्षण याचिका प्रायः निम्नलिखित परिस्थितियों में दायर की जाती है—

  • आरोपी की बरी होने के विरुद्ध
  • अपर्याप्त दंड के विरुद्ध
  • प्रक्रिया संबंधी गंभीर त्रुटियों के विरुद्ध

सर्वोच्च न्यायालय का विश्लेषण

        सर्वोच्च न्यायालय ने अपने विस्तृत निर्णय में कहा कि आपराधिक कार्यवाही का स्वरूप और उद्देश्य इस बात पर निर्भर करता है कि याचिका किसके द्वारा दायर की गई है।

1. आरोपी द्वारा दायर याचिका और मृत्यु

      यदि कोई आपराधिक अपील या पुनरीक्षण आरोपी द्वारा दायर किया गया हो और उसकी मृत्यु हो जाए, तो सामान्यतः कार्यवाही समाप्त हो जाती है। इसका कारण यह है कि दंड व्यक्तिगत होता है और मृत व्यक्ति को न तो दंडित किया जा सकता है और न ही उसे किसी राहत की आवश्यकता रहती है।

2. पीड़ित या मुखबिर द्वारा दायर याचिका

      न्यायालय ने स्पष्ट किया कि जब पुनरीक्षण याचिका पीड़ित या मुखबिर द्वारा दायर की जाती है, तब उसका उद्देश्य व्यक्तिगत लाभ नहीं, बल्कि न्याय की स्थापना और अपराध के प्रति राज्य की जिम्मेदारी को सुनिश्चित करना होता है।

ऐसी याचिका का उद्देश्य—

  • गलत बरी को चुनौती देना
  • न्यायिक त्रुटियों को सुधारना
  • पीड़ित के अधिकारों की रक्षा करना

होता है। इसलिए संशोधनकर्ता की मृत्यु से उस उद्देश्य का अंत नहीं हो जाता।


कानून की व्याख्या और CrPC का संदर्भ

     न्यायालय ने दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 के प्रावधानों की व्याख्या करते हुए कहा कि संहिता में कहीं भी यह स्पष्ट रूप से नहीं कहा गया है कि पीड़ित या मुखबिर द्वारा दायर पुनरीक्षण याचिका उसकी मृत्यु के साथ स्वतः समाप्त हो जाएगी।

       न्यायालय ने यह भी कहा कि जहाँ विधि मौन है, वहाँ न्यायालय का कर्तव्य है कि वह कानून की व्याख्या न्याय, समानता और विवेक के अनुरूप करे।


पीड़ित-केंद्रित आपराधिक न्याय प्रणाली

       यह निर्णय भारत में विकसित हो रही पीड़ित-केंद्रित आपराधिक न्याय प्रणाली (Victim-Centric Criminal Justice System) को मजबूती प्रदान करता है। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि आधुनिक आपराधिक कानून केवल “राज्य बनाम आरोपी” की अवधारणा तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें पीड़ित की भूमिका भी केंद्रीय है।

न्यायालय ने यह भी रेखांकित किया कि—

  • पीड़ित को निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार है
  • पीड़ित के अधिकार केवल जीवित रहने तक सीमित नहीं हैं
  • अपराध समाज के विरुद्ध होता है, केवल व्यक्ति के विरुद्ध नहीं

संवैधानिक दृष्टिकोण

        न्यायालय ने इस निर्णय को भारत का संविधान के अनुच्छेद 21 से भी जोड़ा, जो जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार की गारंटी देता है। न्यायालय ने कहा कि न्याय तक पहुंच (Access to Justice) अनुच्छेद 21 का अभिन्न अंग है और पीड़ित की मृत्यु के बाद भी न्याय की प्रक्रिया को जारी रखना संविधान की भावना के अनुरूप है।


पूर्ववर्ती न्यायिक दृष्टांत

       सर्वोच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में यह भी स्पष्ट किया कि पूर्व में दिए गए कुछ निर्णयों में अपील और पुनरीक्षण के बीच अंतर को स्पष्ट नहीं किया गया था, जिसके कारण भ्रम उत्पन्न हुआ। वर्तमान निर्णय ने इस भ्रम को दूर करते हुए एक स्पष्ट सिद्धांत स्थापित किया है—

आरोपी द्वारा दायर आपराधिक कार्यवाही और पीड़ित/मुखबिर द्वारा दायर कार्यवाही को एक समान नहीं माना जा सकता।


व्यावहारिक प्रभाव और दूरगामी परिणाम

इस निर्णय के कई महत्वपूर्ण व्यावहारिक प्रभाव होंगे:

  1. पीड़ित के उत्तराधिकारियों को अधिकार
    पीड़ित या मुखबिर की मृत्यु के बाद उसके विधिक उत्तराधिकारी कार्यवाही को आगे बढ़ा सकते हैं।
  2. न्यायिक प्रक्रिया की निरंतरता
    गंभीर अपराधों में तकनीकी आधार पर मामलों के समाप्त होने पर रोक लगेगी।
  3. निचली अदालतों को स्पष्ट दिशा-निर्देश
    अब निचली अदालतें केवल मृत्यु के आधार पर पुनरीक्षण याचिकाओं को खारिज नहीं कर सकेंगी।
  4. आपराधिक न्याय में विश्वास की पुनर्स्थापना
    इससे आम जनता का न्याय प्रणाली पर भरोसा बढ़ेगा।

आलोचनात्मक दृष्टि

        हालाँकि यह निर्णय न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप है, फिर भी कुछ आलोचक यह तर्क दे सकते हैं कि इससे आपराधिक मुकदमों की अवधि बढ़ सकती है। किंतु सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि न्याय में देरी का समाधान कार्यवाही को समाप्त करना नहीं, बल्कि उसे कुशलतापूर्वक संचालित करना है।


निष्कर्ष

       सर्वोच्च न्यायालय का यह निर्णय आपराधिक न्याय प्रणाली में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया है कि आपराधिक पुनरीक्षण याचिका संशोधनकर्ता की मृत्यु पर स्वतः समाप्त नहीं होती, विशेषकर तब जब याचिका आरोपी द्वारा नहीं बल्कि पीड़ित या मुखबिर द्वारा दायर की गई हो।

     यह फैसला न केवल पीड़ित के अधिकारों को संवैधानिक संरक्षण प्रदान करता है, बल्कि यह भी सुनिश्चित करता है कि न्याय तकनीकी बाधाओं की भेंट न चढ़े। एक लोकतांत्रिक और विधि-शासित राज्य में न्याय की प्रक्रिया व्यक्तियों के जीवन तक सीमित नहीं हो सकती—न्याय एक सतत प्रक्रिया है, जो समाज के व्यापक हित में आगे बढ़ती रहती है।