“अरावली नहीं कटेगी?” — सुप्रीम कोर्ट का पर्यावरण को लेकर सख़्त रुख, कानूनी पेच और संरक्षण की वास्तविक तस्वीर
भूमिका : अरावली का प्रश्न केवल पहाड़ों का नहीं, भविष्य का है
अरावली पर्वतमाला केवल पत्थरों और पहाड़ियों का समूह नहीं है। यह भारत की सबसे प्राचीन पर्वतमालाओं में से एक है, जो राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली और गुजरात तक फैली हुई है। यह क्षेत्र जलवायु संतुलन, भू-जल रिचार्ज, जैव-विविधता, वायु-प्रदूषण नियंत्रण और मरुस्थलीकरण रोकने में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
पिछले कुछ वर्षों से “अरावली कटाई”, “खनन”, “निर्माण गतिविधियाँ” और “परिभाषा विवाद” लगातार अदालतों में चर्चा का विषय रहे हैं। हाल ही में 2024–25 में सुप्रीम कोर्ट के कुछ आदेशों और सरकार के प्रस्तावों के बाद सोशल मीडिया और समाचारों में यह वाक्य खूब चल पड़ा —
“सुप्रीम कोर्ट ने साफ़ कहा: अरावली नहीं कटेगी।”
लेकिन क्या वास्तव में सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा कोई सीधा वाक्य कहा है?
उत्तर है — नहीं।
मामला इससे कहीं अधिक कानूनी, तकनीकी और नीतिगत है।
अरावली पर्वतमाला : क्यों है यह इतना महत्वपूर्ण?
अरावली की भूमिका को समझे बिना अदालत के रुख को समझना अधूरा रहेगा।
पर्यावरणीय महत्व
- यह क्षेत्र दिल्ली–NCR के लिए “ग्रीन बैरियर” की तरह काम करता है
- रेगिस्तान के फैलाव (Desertification) को रोकता है
- भू-जल रिचार्ज का प्रमुख स्रोत
- जैव-विविधता (वन्यजीव, वनस्पति) का घर
शहरीकरण का दबाव
- गुरुग्राम, फरीदाबाद, अलवर जैसे क्षेत्रों में
- अवैध खनन, फार्म हाउस, रियल एस्टेट परियोजनाएँ
- वन भूमि को “गैर-वन” घोषित करने की कोशिशें
सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक दृष्टिकोण : पहले के आदेश
सुप्रीम कोर्ट का अरावली पर रुख नया नहीं है।
MC Mehta बनाम Union of India (1990s से)
- हरियाणा और राजस्थान में खनन पर रोक
- “अरावली को बचाना राष्ट्रीय दायित्व” कहा गया
- वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 की सख़्त व्याख्या
अवैध खनन पर कठोर टिप्पणियाँ
- “पर्यावरणीय विनाश को आर्थिक विकास के नाम पर जायज़ नहीं ठहराया जा सकता”
2025 में सुप्रीम कोर्ट का ताज़ा रुख : क्या कहा गया वास्तव में?
1. संरक्षण सर्वोपरि — कोर्ट का मूल सिद्धांत
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि:
अरावली पर्वतमाला का संरक्षण सर्वोच्च प्राथमिकता है
जब तक वैज्ञानिक मैपिंग, संपूर्ण सर्वेक्षण और सस्टेनेबल मैनेजमेंट प्लान तैयार नहीं होता —
नई खनन गतिविधियाँ नहीं होंगी
यह पर्यावरणीय एहतियात (Precautionary Principle) और सतत विकास (Sustainable Development) के सिद्धांत पर आधारित है।
2. नई खनन लीज़ पर सख़्त रोक
कोर्ट के निर्देश:
- कोई भी नई माइनिंग लीज़ बिना सुप्रीम कोर्ट की अनुमति नहीं
- राज्य सरकारें अपने स्तर पर अनुमति नहीं दे सकतीं
- केंद्र सरकार को सस्टेनेबल डेवलपमेंट प्लान तैयार करने का निर्देश
यह अप्रत्यक्ष रूप से “अरावली नहीं कटेगी” की भावना को दर्शाता है।
अरावली की परिभाषा पर विवाद : 100 मीटर मानदंड
विवाद की जड़
केंद्र सरकार द्वारा एक प्रस्ताव अदालत के समक्ष रखा गया जिसमें कहा गया:
100 मीटर से अधिक ऊँचाई वाली भू-आकृतियों को “अरावली” माना जाएगा
समस्या क्या है?
- अरावली की अधिकांश पहाड़ियाँ 100 मीटर से कम ऊँचाई की हैं
- यदि यह परिभाषा लागू होती है तो:
- कई क्षेत्र संरक्षण से बाहर हो सकते हैं
- खनन और निर्माण के लिए रास्ता खुल सकता है
इस पर सुप्रीम कोर्ट का रुख
अदालत ने इस प्रस्ताव को अंतिम रूप से स्वीकार नहीं किया, बल्कि:
- इस पर आपत्तियाँ आमंत्रित कीं
- याचिकाएँ स्वीकार कीं
- विशेषज्ञों की राय मांगी
➡️इसका अर्थ:
अदालत सतर्क है और किसी भी ऐसे कदम को लेकर अंतिम निर्णय से पहले सभी पहलुओं पर विचार कर रही है।
याचिकाकर्ताओं की दलीलें
पर्यावरण कार्यकर्ताओं और नागरिक समूहों ने कहा:
- अरावली को केवल ऊँचाई से परिभाषित करना वैज्ञानिक नहीं
- पारिस्थितिकी (Ecology) ऊँचाई से नहीं, भूगर्भीय संरचना से तय होती है
- यह परिभाषा “पर्यावरण संरक्षण के उद्देश्य को कमजोर” कर सकती है
केंद्र सरकार का स्पष्टीकरण
केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा:
प्रस्ताव के बावजूद 90% से अधिक अरावली क्षेत्र संरक्षित रहेगा
पहले से ही:
- नई खनन लीज़ बंद
- कई क्षेत्रों में खनन निषेध
उद्देश्य संरक्षण को कमजोर करना नहीं, बल्कि स्पष्टता लाना है
क्या सुप्रीम कोर्ट ने कहा – “अरावली नहीं कटेगी”?
सीधा उत्तर:
नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने शब्दशः ऐसा वाक्य नहीं कहा।
लेकिन भावार्थ क्या है?
कोर्ट का पूरा दृष्टिकोण यही है कि:
- पर्यावरणीय क्षति नहीं होनी चाहिए
- अरावली का अस्तित्व बना रहना चाहिए
- बिना वैज्ञानिक आधार के कोई छूट नहीं दी जाएगी
इसलिए यह वाक्य न्यायिक भावना (Judicial Spirit) को दर्शाता है, न कि शब्दशः आदेश।
संवैधानिक और कानूनी आधार
अनुच्छेद 21
- स्वच्छ पर्यावरण = जीवन का अधिकार
अनुच्छेद 48A
- राज्य का कर्तव्य — पर्यावरण संरक्षण
अनुच्छेद 51A(g)
- नागरिकों का मौलिक कर्तव्य — प्रकृति की रक्षा
सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार कहा है कि:
“पर्यावरण संरक्षण केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि संवैधानिक दायित्व है।”
भविष्य की दिशा : आगे क्या?
- परिभाषा पर अंतिम निर्णय बाकी
- साइंटिफिक मैपिंग और विशेषज्ञ रिपोर्ट का इंतज़ार
- खनन और निर्माण पर न्यायिक निगरानी जारी
- नागरिक समाज और मीडिया की भूमिका निर्णायक
निष्कर्ष : साफ़ और सरल संदेश
सुप्रीम कोर्ट पर्यावरण संरक्षण के पक्ष में मजबूती से खड़ा है
अरावली में नई खनन गतिविधियों पर प्रभावी रोक है
परिभाषा को लेकर विवाद जारी है, अंतिम फैसला बाकी
“अरावली नहीं कटेगी” — यह कानूनी भावना है, न कि सीधा उद्धरण
🔹 न्यायपालिका संतुलन चाहती है — विकास भी, विनाश नहीं
अंतिम शब्द
अरावली का प्रश्न केवल कानून या खनन का नहीं है —
यह भविष्य की पीढ़ियों, जलवायु न्याय और संवैधानिक मूल्यों का प्रश्न है।
सुप्रीम कोर्ट का रुख स्पष्ट है:
पर्यावरण के साथ समझौता नहीं होगा।
भले ही शब्द अलग हों,
संदेश एक ही है — संरक्षण सर्वोपरि।