IndianLawNotes.com

अंतरिम पीड़ित मुआवज़े के दुरुपयोग पर दिल्ली हाईकोर्ट की सख़्त चेतावनी — यौन अपराध मामलों में समझौते/आरोप वापसी के बाद मुआवज़े की वसूली हेतु विस्तृत दिशा-निर्देश

अंतरिम पीड़ित मुआवज़े के दुरुपयोग पर दिल्ली हाईकोर्ट की सख़्त चेतावनी — यौन अपराध मामलों में समझौते/आरोप वापसी के बाद मुआवज़े की वसूली हेतु विस्तृत दिशा-निर्देश

मामले का नाम:
राज्य (GNCT of Delhi) बनाम तोशीब उर्फ़ परितोष एवं अन्य
न्यायालय: उच्च न्यायालय, दिल्ली, नई दिल्ली


 प्रस्तावना

       यौन अपराधों से जुड़े मामलों में पीड़ितों को त्वरित राहत देने के उद्देश्य से Victim Compensation Scheme (पीड़ित प्रतिकर योजना) के अंतर्गत अंतरिम मुआवज़ा प्रदान किया जाता है। यह योजना संवेदनशील और मानवीय दृष्टिकोण पर आधारित है, ताकि पीड़ित को मुकदमे के लंबे इंतज़ार के दौरान आर्थिक और मानसिक सहारा मिल सके।

      परंतु हाल के वर्षों में न्यायालयों के समक्ष एक चिंताजनक प्रवृत्ति सामने आई है—जहाँ प्राथमिकी (FIR) दर्ज होने के बाद पीड़िता को अंतरिम मुआवज़ा मिल जाता है, लेकिन बाद में आरोप वापस ले लिए जाते हैं, समझौता हो जाता है, या कार्यवाही ही रद्द (quash) कर दी जाती है। ऐसी स्थिति में पहले से वितरित मुआवज़े की वसूली के लिए कोई प्रभावी तंत्र सक्रिय नहीं होता, जिससे न्याय व्यवस्था की साख पर प्रश्नचिह्न लगता है।

      इसी पृष्ठभूमि में दिल्ली उच्च न्यायालय ने State of GNCT of Delhi v. Toshib @ Paritosh & Ors. मामले में न केवल अभियुक्तों को डिस्चार्ज (मुक्त) करते हुए कार्यवाही समाप्त की, बल्कि अंतरिम पीड़ित मुआवज़े के संभावित दुरुपयोग पर गहरी चिंता व्यक्त की और विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किए।


मामले की पृष्ठभूमि

       इस मामले में यौन अपराध से संबंधित आरोपों के आधार पर प्राथमिकी दर्ज हुई थी। पीड़िता को Victim Compensation Scheme के अंतर्गत अंतरिम मुआवज़ा प्रदान किया गया। बाद में परिस्थितियाँ बदलीं—या तो पीड़िता ने अपने आरोपों से पीछे हटते हुए समझौता कर लिया, या न्यायिक प्रक्रिया के दौरान ऐसा तथ्य सामने आया कि आपराधिक कार्यवाही को जारी रखना न्यायोचित नहीं था।

     अंततः अभियुक्तों को राहत मिली और कार्यवाही समाप्त कर दी गई। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में एक महत्वपूर्ण प्रश्न अनुत्तरित रह गया—जो मुआवज़ा पहले ही वितरित हो चुका था, उसका क्या?


 न्यायालय की मुख्य चिंता

दिल्ली उच्च न्यायालय ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि—

“यह न्यायालय बार-बार ऐसे मामलों का साक्षी बन रहा है जहाँ यौन अपराध के आरोपों के आधार पर पीड़िता को अंतरिम मुआवज़ा दिया जाता है, लेकिन बाद में आरोपों से मुकर जाने या समझौते के कारण मामला समाप्त हो जाता है। इसके बावजूद पहले से दिए गए मुआवज़े की वसूली के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया जाता।”

न्यायालय ने इसे केवल वित्तीय हानि का प्रश्न नहीं माना, बल्कि इसे—

  • न्यायिक प्रक्रिया के दुरुपयोग,
  • सार्वजनिक धन के अनुचित उपयोग, और
  • वास्तविक पीड़ितों के अधिकारों के क्षरण

से जोड़कर देखा।


पीड़ित प्रतिकर योजना (Victim Compensation Scheme) का उद्देश्य

न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि—

  • यह योजना कल्याणकारी (welfare-oriented) है।
  • इसका उद्देश्य सच्चे और वास्तविक पीड़ितों को सहायता देना है।
  • इसका दुरुपयोग करके यदि कोई व्यक्ति लाभ उठाता है, तो यह पूरी योजना की विश्वसनीयता को कमजोर करता है

अतः न्यायालय का दृष्टिकोण पीड़ित-विरोधी नहीं, बल्कि न्याय-संतुलनकारी है।


 अंतरिम मुआवज़े के दुरुपयोग का पैटर्न

न्यायालय ने कुछ सामान्य पैटर्न की ओर भी संकेत किया, जैसे—

  1. FIR दर्ज होते ही अंतरिम मुआवज़े के लिए आवेदन
  2. मुआवज़ा प्राप्त होने के बाद
  3. आरोपों से पलटना / समझौता करना
  4. धारा 482 CrPC के तहत FIR या कार्यवाही को रद्द कराना
  5. मुआवज़े की वापसी या जवाबदेही का पूर्ण अभाव

न्यायालय के अनुसार, यदि इस प्रवृत्ति पर अंकुश नहीं लगाया गया, तो यह झूठे या प्रेरित मुकदमों को बढ़ावा दे सकती है।


 दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा जारी महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश

दिल्ली उच्च न्यायालय ने इस समस्या से निपटने के लिए व्यवस्थित और अनिवार्य दिशा-निर्देश जारी किए, जिनका उद्देश्य पारदर्शिता, जवाबदेही और न्याय सुनिश्चित करना है।

 1. अनिवार्य खुलासा (Mandatory Disclosure)

अब हर उस याचिका में, जिसमें—

  • यौन अपराध से संबंधित FIR
  • या आपराधिक कार्यवाही
  • समझौते या सुलह के आधार पर
  • रद्द (quash) करने की मांग की जाए,

यह अनिवार्य होगा कि याचिकाकर्ता स्पष्ट रूप से बताए कि—

  • क्या पीड़िता ने Victim Compensation Scheme के अंतर्गत
    • कोई अंतरिम या अंतिम मुआवज़ा प्राप्त किया है?
  • यदि हाँ, तो—
    • मुआवज़े की राशि
    • भुगतान की तारीख
    • योजना/अधिकार क्षेत्र का विवरण

 2. न्यायालय की सक्रिय भूमिका

न्यायालय केवल समझौते के आधार पर कार्यवाही रद्द करने तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि—

  • यह भी परखेगा कि
    • मुआवज़ा किस आधार पर दिया गया था
    • क्या आरोपों की वापसी उस आधार को कमजोर करती है?

 3. वसूली की प्रक्रिया पर विचार

यदि न्यायालय को यह प्रतीत होता है कि—

  • मुआवज़ा ऐसे आरोपों के आधार पर दिया गया था
  • जो बाद में असत्य या वापस ले लिए गए

तो न्यायालय—

  • संबंधित प्राधिकरणों को
  • मुआवज़े की वसूली या
  • उचित कार्रवाई करने के निर्देश दे सकता है।

 4. जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (DLSA) की भूमिका

न्यायालय ने संकेत दिया कि—

  • DLSA को मुआवज़ा प्रदान करते समय
  • केवल FIR के अस्तित्व तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि
  • परिस्थितियों की सतर्क समीक्षा करनी चाहिए।

 5. भविष्य के मामलों में निवारक प्रभाव

इन दिशा-निर्देशों का उद्देश्य—

  • सच्चे पीड़ितों को हतोत्साहित करना नहीं
  • बल्कि झूठे या प्रेरित दावों को रोकना है।

 अभियुक्तों को राहत, लेकिन सिद्धांतों पर सख़्ती

हालाँकि इस विशेष मामले में—

  • न्यायालय ने अभियुक्तों को डिस्चार्ज करते हुए
  • कार्यवाही समाप्त कर दी,

लेकिन साथ ही यह स्पष्ट किया कि—

“ऐसे मामलों में राहत देना न्यायालय का कर्तव्य हो सकता है, परंतु व्यवस्था के दुरुपयोग पर आँख मूँद लेना नहीं।”


 व्यापक कानूनी प्रभाव

इस निर्णय के दूरगामी प्रभाव होंगे—

  • धारा 482 CrPC के अंतर्गत दायर याचिकाओं में
    • अब अधूरी जानकारी स्वीकार नहीं होगी।
  • पीड़ित प्रतिकर योजनाओं में
    • अधिक जवाबदेही और पारदर्शिता आएगी।
  • न्यायालयों को
    • वास्तविक और बनावटी मामलों में अंतर करने में सहायता मिलेगी।

 निष्कर्ष

दिल्ली उच्च न्यायालय का यह निर्णय न्यायिक संतुलन का उत्कृष्ट उदाहरण है। एक ओर यह—

  • वास्तविक पीड़ितों के अधिकारों की रक्षा करता है,
    तो दूसरी ओर—
  • न्याय प्रणाली और सार्वजनिक धन के दुरुपयोग को रोकने के लिए
    सख़्त संदेश देता है।

यह फैसला स्पष्ट करता है कि—

“न्याय केवल करुणा से नहीं, बल्कि विवेक और उत्तरदायित्व से चलता है।”

भविष्य में यौन अपराध मामलों में अंतरिम मुआवज़े से संबंधित यह निर्णय एक मील का पत्थर सिद्ध होगा और न्यायिक प्रक्रिया की पवित्रता बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।