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सुप्रीम कोर्ट का सख़्त संदेश: ‘क्वैशिंग याचिका’ में गिरफ्तारी से पूर्व संरक्षण और जाँच की समय-सीमा तय करना न्यायिक मर्यादा के विरुद्ध

सुप्रीम कोर्ट का सख़्त संदेश: ‘क्वैशिंग याचिका’ में गिरफ्तारी से पूर्व संरक्षण और जाँच की समय-सीमा तय करना न्यायिक मर्यादा के विरुद्ध


इलाहाबाद उच्च न्यायालय के ‘नो-अरेस्ट’ आदेश को सुप्रीम कोर्ट ने किया निरस्त — Neeharika Infrastructure के सिद्धांतों की पुनः पुष्टि


भूमिका

       भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली में जाँच की स्वतंत्रता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच संतुलन एक अत्यंत संवेदनशील विषय रहा है। इसी संतुलन को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण निर्णय दिया, जिसमें इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा पारित उस आदेश को निरस्त कर दिया गया, जिसमें एफआईआर को चुनौती देने वाली याचिका (Quashing Petition) के दौरान अभियुक्त को गिरफ्तारी से पूर्व संरक्षण (No-Arrest Protection) दिया गया था तथा जाँच एजेंसी को एक निश्चित समय-सीमा के भीतर जाँच पूरी करने का निर्देश भी दिया गया था।

        सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि इस प्रकार के निर्देश Neeharika Infrastructure Pvt. Ltd. बनाम राज्य (2021) में निर्धारित संवैधानिक और न्यायिक सिद्धांतों के विपरीत हैं।


मामले की पृष्ठभूमि

      मामले में अभियुक्तों के विरुद्ध एक आपराधिक एफआईआर दर्ज की गई थी। इसके बाद अभियुक्तों ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाते हुए एफआईआर को रद्द (Quash) करने की मांग की।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने:

  1. एफआईआर को तत्काल रद्द नहीं किया,
  2. लेकिन अभियुक्तों को गिरफ्तारी से अंतरिम संरक्षण दे दिया,
  3. और जाँच एजेंसी को निश्चित समय-सीमा के भीतर जाँच पूरी करने का निर्देश भी दे दिया।

राज्य सरकार ने इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।


सुप्रीम कोर्ट के समक्ष प्रमुख प्रश्न

सुप्रीम कोर्ट के समक्ष मुख्य रूप से निम्न प्रश्न उभरे:

  • क्या उच्च न्यायालय, क्वैशिंग याचिका लंबित रहते हुए, गिरफ्तारी पर रोक लगा सकता है?
  • क्या न्यायालय जाँच एजेंसी को जाँच की समय-सीमा निर्धारित कर सकता है?
  • क्या ऐसे आदेश Neeharika Infrastructure के निर्णय के अनुरूप हैं?

Neeharika Infrastructure निर्णय का महत्व

सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2021 में Neeharika Infrastructure Pvt. Ltd. बनाम राज्य के ऐतिहासिक निर्णय में स्पष्ट दिशा-निर्देश दिए थे कि:

  • एफआईआर की जाँच पुलिस का वैधानिक अधिकार और कर्तव्य है।
  • उच्च न्यायालय को सामान्यतः जाँच में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।
  • केवल एफआईआर दर्ज होने के आधार पर गिरफ्तारी पर रोक नहीं लगाई जा सकती।
  • गिरफ्तारी से संरक्षण देना, बिना धारा 438 CrPC (अग्रिम जमानत) की प्रक्रिया अपनाए, कानून का परोक्ष उल्लंघन है।

सुप्रीम कोर्ट की कठोर टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के आदेश को रद्द करते हुए कहा:

“उच्च न्यायालय द्वारा दिया गया ‘नो-अरेस्ट’ संरक्षण वस्तुतः अग्रिम जमानत के समान है, जबकि अभियुक्त ने धारा 438 CrPC के तहत कोई आवेदन नहीं किया।”

न्यायालय ने यह भी कहा कि:

  • जाँच की समय-सीमा तय करना कार्यपालिका के क्षेत्र में अनुचित हस्तक्षेप है।
  • न्यायालय को जाँच की गुणवत्ता या गति पर सामान्यतः निर्देश नहीं देने चाहिए, जब तक कि असाधारण परिस्थितियाँ न हों।

न्यायालय और जाँच एजेंसी के अधिकारों की सीमा

सुप्रीम कोर्ट ने दो टूक कहा कि:

  • पुलिस को यह अधिकार है कि वह तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर यह तय करे कि गिरफ्तारी आवश्यक है या नहीं।
  • न्यायालय का कार्य यह नहीं है कि वह पहले से ही जाँच की दिशा और गति निर्धारित करे।

इस प्रकार के आदेश संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत प्रदत्त शक्तियों के दुरुपयोग के समान हैं।


व्यक्तिगत स्वतंत्रता बनाम समाजिक हित

हालाँकि सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्वीकार किया कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता अत्यंत मूल्यवान है, लेकिन साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि:

  • व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं कि आपराधिक जाँच को पंगु बना दिया जाए।
  • कानून में गिरफ्तारी से बचाव के लिए अग्रिम जमानत जैसी वैधानिक व्यवस्था मौजूद है।

क्वैशिंग याचिका की सीमाएँ

न्यायालय ने दोहराया कि:

  • एफआईआर को रद्द करने की शक्ति असाधारण है।
  • यह शक्ति तभी प्रयोग की जानी चाहिए जब प्रथम दृष्टया कोई अपराध बनता ही न हो।
  • जाँच के प्रारंभिक चरण में तथ्यात्मक विवादों का निर्णय नहीं किया जा सकता।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय के आदेश की आलोचना

सुप्रीम कोर्ट ने माना कि उच्च न्यायालय ने:

  • Neeharika Infrastructure के स्पष्ट दिशा-निर्देशों की अवहेलना की,
  • गिरफ्तारी पर रोक लगाकर अप्रत्यक्ष रूप से अग्रिम जमानत प्रदान की,
  • और जाँच एजेंसी के अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप किया।

इसलिए, ऐसा आदेश न्यायिक अनुशासन के विपरीत है।


सुप्रीम कोर्ट का अंतिम आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने:

  1. इलाहाबाद उच्च न्यायालय का ‘नो-अरेस्ट’ आदेश पूरी तरह निरस्त कर दिया।
  2. जाँच की समय-सीमा संबंधी निर्देश भी रद्द कर दिए।
  3. स्पष्ट किया कि जाँच एजेंसी कानून के अनुसार स्वतंत्र रूप से कार्य करेगी।

हालाँकि न्यायालय ने यह भी कहा कि अभियुक्तों को कानून के तहत उपलब्ध सभी उपाय अपनाने की स्वतंत्रता है।


फैसले का व्यापक प्रभाव

यह निर्णय:

  • उच्च न्यायालयों के लिए एक सख़्त चेतावनी है,
  • पुलिस जाँच की स्वतंत्रता की पुनः पुष्टि करता है,
  • और Neeharika Infrastructure के सिद्धांतों को और अधिक सुदृढ़ करता है।

निष्कर्ष

सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय भारतीय आपराधिक प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। यह स्पष्ट करता है कि:

  • क्वैशिंग याचिका को गिरफ्तारी से बचने का साधन नहीं बनाया जा सकता।
  • न्यायालयों को अपनी संवैधानिक शक्तियों का प्रयोग संयम और अनुशासन के साथ करना चाहिए।
  • जाँच एजेंसियों को उनके वैधानिक कर्तव्यों के निर्वहन से रोका नहीं जा सकता।

यह फैसला न केवल न्यायिक संतुलन को मज़बूत करता है, बल्कि यह भी सुनिश्चित करता है कि कानून का शासन (Rule of Law) किसी भी प्रकार के न्यायिक अतिरेक से प्रभावित न हो।