IndianLawNotes.com

“विवाह का पवित्र बंधन और दहेज का व्यापार: सुप्रीम कोर्ट की कठोर टिप्पणी एवं सामाजिक चेतना का पुनर्जागरण”

“विवाह का पवित्र बंधन और दहेज का व्यापार: सुप्रीम कोर्ट की कठोर टिप्पणी एवं सामाजिक चेतना का पुनर्जागरण”


        विवाह भारतीय सभ्यता में एक पवित्र और नैतिक संस्था के रूप में स्थापित है। यह केवल दो व्यक्तियों का गठबंधन नहीं, बल्कि दो परिवारों के मध्य विश्वास, सम्मान, प्रेम, सामंजस्य और नैतिक मूल्यों पर आधारित जीवनयात्रा का शुभारंभ है। भारतीय संस्कृति ने विवाह को संस्कार की श्रेणी में रखा है—जहाँ मानवीय गुणों, त्याग, साझेदारी और सम्मान को सर्वोच्च स्थान दिया जाता है। किंतु आधुनिक समय में यह पावन संस्था अपने मूल स्वरूप से विचलित होकर एक अत्यंत चिंताजनक दिशा में बढ़ रही है। दहेज जैसे सामाजिक अभिशाप ने विवाह को पवित्रता से खींचकर एक वाणिज्यिक लेन-देन, एक सौदेबाज़ी, और सामाजिक प्रतिष्ठा की नीलामी का मंच बना दिया है।

       सुप्रीम कोर्ट ने एक हालिया निर्णय में अत्यंत गहरी संवेदनशीलता और कठोरता के साथ यह टिप्पणी की कि—

“विवाह, जो अपने वास्तविक स्वरूप में विश्वास और सम्मान का पवित्र बंधन है, आज दुर्भाग्यवश व्यावसायिक समझौते में बदल गया है। दहेज की बुराई, चाहे उसे उपहार का नाम दें या पारिवारिक परंपरा का, वस्तुतः लोभ, वैभव और सामाजिक दिखावे को संतुष्ट करने का साधन बन चुकी है।”

        यह टिप्पणी केवल न्यायिक दृष्टिकोण नहीं, बल्कि भारतीय समाज के लिए एक दर्पण है जिसमें हम अपनी वर्तमान वास्तविकता को स्पष्ट रूप से देख सकते हैं।


I. विवाह का वास्तविक अर्थ और उसका क्षरण

         भारतीय परंपरा में विवाह जीवन के चार पुरुषार्थों—धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—को संतुलित एवं पवित्र मार्ग पर ले जाने का माध्यम माना गया है। यह दो आत्माओं का मिलन है, जहाँ—

  • विश्वास (Trust)
  • सम्मान (Respect)
  • समर्पण (Commitment)
  • और सौहार्द (Harmony)

इन मूल तत्वों पर वैवाहिक जीवन की नींव रखी जाती है।

लेकिन आज यह संस्था कुछ क्षेत्रों में अपने नैतिक स्वरूप से दूर होती जा रही है। विवाह अब—

  • सामाजिक प्रतिष्ठा,
  • वैभव प्रदर्शन,
  • आर्थिक लेन-देन
  • और दहेज की “प्रचलित परंपरा”

के जाल में उलझ गया है।

         सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि समाज ने विवाह को एक commercial contract की तरह व्यवहार करना शुरू कर दिया है, जहाँ लड़की के माता-पिता के आर्थिक सामर्थ्य के आधार पर दूल्हे और उसके परिवार का “मूल्यांकन” किया जाता है।


II. दहेज: आधुनिक समाज का पुराना अभिशाप

1. दहेज—एक सामाजिक बुराई का सतत विस्तार

दहेज कोई नई समस्या नहीं है, लेकिन इसका आधुनिक स्वरूप कहीं अधिक क्रूर, संगठित और हिंसात्मक हो चुका है। परिवार इसे अक्सर—

  • उपहार,
  • सामाजिक प्रतिष्ठा,
  • परंपरा,
  • स्वैच्छिक भेंट

जैसे शब्दों में छिपाकर प्रस्तुत करते हैं। किंतु वास्तविकता यह है कि दहेज आज—

  • लालच,
  • सामाजिक प्रतिस्पर्धा,
  • और आर्थिक दबाव

का साधन बन चुका है।

2. दहेज मांग का “सांस्कृतिक वैधीकरण”

       सबसे घातक पहलू यह है कि दहेज को समाज ने tacit approval दे दिया है।
जितना अधिक दहेज, उतनी अधिक समाज में प्रतिष्ठा—यह मानसिकता गर्व नहीं, बल्कि सामूहिक नैतिक पतन का प्रमाण है।


III. सुप्रीम कोर्ट की दृष्टि: दहेज—अपराध, अपमान और संवैधानिक उल्लंघन

सुप्रीम कोर्ट ने दहेज प्रथा को केवल सामाजिक बुराई नहीं, बल्कि संवैधानिक मूल्य एवं मानव गरिमा पर आक्रमण बताया है। न्यायालय के अनुसार—

1. Article 21 – जीवन और गरिमा का अधिकार

दहेज उत्पीड़न और दहेज मृत्यु सीधे-सीधे Article 21 का उल्लंघन करते हैं।
कोर्ट ने कहा:

“एक महिला को वैवाहिक घर में गरिमापूर्ण, सुरक्षित और सम्मानजनक जीवन का अधिकार है। दहेज की मांग इस अधिकार को नष्ट कर देती है।”

2. Article 14 – समानता का अधिकार

दहेज प्रथा लैंगिक असमानता को बढ़ावा देती है और महिलाओं को द्वितीय श्रेणी का नागरिक बना देती है।

3. धारा 498-A IPC और 304-B IPC

सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार कहा है कि—

  • 498-A (क्रूरता)
  • 304-B (दहेज मृत्यु)

महिलाओं की सुरक्षा के लिए अनिवार्य प्रावधान हैं और इन्हें कमजोर करने के प्रयास समाज और न्याय दोनों के लिए घातक होंगे।

4. दहेज मृत्यु—हत्या जितना गंभीर अपराध

न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा है कि दहेज से प्रेरित मृत्यु “हत्या के समान गंभीर” है, क्योंकि—

  • यह योजनाबद्ध प्रताड़ना का परिणाम है,
  • यह घरेलू चारदीवारी के भीतर होता है,
  • और आरोपी अक्सर सबूत मिटा देते हैं।

IV. विवाह का व्यवसायीकरण: सुप्रीम कोर्ट की चिंता

सुप्रीम कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में कहा कि भारतीय समाज में विवाह अब—

  • नौकरी, पैकेज,
  • सामाजिक प्रतिष्ठा,
  • और दहेज की क्षमता

के आधार पर तय होने लगा है, जिससे विवाह का पवित्र स्वरूप नष्ट हो रहा है।

न्यायालय ने अत्यंत मार्मिक शब्दों में कहा:

“विवाह नीलामी का मंच नहीं है, जहाँ दूल्हे की कीमत बोली लगाकर तय की जाए।”

1. विवाह का “market value system”

यह आधुनिक प्रवृत्ति अत्यंत चिंताजनक है, जिसमें—

  • इंजीनियरों,
  • डॉक्टरों,
  • सरकारी कर्मचारियों,
  • एवं उच्च आय वर्ग

के लड़कों का विवाह “सौदेबाज़ी” की तरह देखा जाता है।

यह सामाजिक विकृति है जिसे Supreme Court ने “moral degeneration” बताया।


V. दहेज का मनोवैज्ञानिक और सामाजिक प्रभाव

1. महिलाओं पर मानसिक-शारीरिक अत्याचार

दहेज मांग का पहला परिणाम होता है—

  • मानसिक दबाव
  • असुरक्षा
  • आत्मसम्मान में गिरावट

और जब मांगें पूरी न हों, तब—

  • हिंसा,
  • शारीरिक उत्पीड़न,
  • भावनात्मक प्रताड़ना
  • और अंततः मृत्यु।

2. परिवारों का आर्थिक शोषण

लड़की के माता-पिता अक्सर समाज के डर से—

  • कर्ज लेते हैं
  • संपत्ति बेचते हैं
  • वर्षों की कमाई खर्च करते हैं

फिर भी उनकी बेटी की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं होती।

3. समाज का नैतिक पतन

दहेज प्रथा समाज की उस संरचना को नष्ट करती है जिसमें—

  • प्रेम,
  • सहयोग,
  • नैतिकता,
  • और मानवीय सम्मान

का स्थान होना चाहिए।


VI. कानून बनाम सामाजिक सोच: समाधान कहाँ?

1. कानून कठोर हैं—पर समाज कमजोर है

भारत में कानून—

  • Dowry Prohibition Act 1961
  • IPC 498-A
  • IPC 304-B
  • Evidence Act 113-B

सब मौजूद हैं।
समस्या कानून की कमी नहीं, बल्कि सामाजिक मानसिकता की है।

2. विवाह पंजीकरण अनिवार्य किया जाए

एक संगठित विवाह रजिस्ट्री—

  • दहेज की निगरानी
  • विवादों के समाधान
  • न्यायिक सहायता

में सहायता कर सकती है।

3. महिलाओं की शिक्षा और आर्थिक स्वतंत्रता

जब महिलाएँ आर्थिक रूप से सशक्त होंगी,
तो दहेज का दबाव कम होगा।

4. सामाजिक अभियान और जागरूकता

स्कूलों, कॉलेजों, पंचायतों में दहेज विरोधी अभियान अनिवार्य किए जाने चाहिए।


VII. न्यायालय की भूमिका: एक संवेदनशील और कठोर मार्गदर्शक

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि—

  • दहेज उत्पीड़न के मामलों में जांच निष्पक्ष हो,
  • अभियोजन मजबूत हो,
  • और न्यायिक प्रक्रिया त्वरित हो।

कोर्ट का संदेश स्पष्ट है:

“दहेज के नाम पर महिलाओं का दमन किसी भी सभ्य समाज में अस्वीकार्य है।”


VIII. निष्कर्ष: विवाह को पवित्र बनाना समाज का दायित्व है

       सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी भारतीय समाज के लिए चिंतन का विषय है। विवाह कोई सौदा नहीं है—यह मनुष्य की आत्मा को जोड़ने वाली सबसे पवित्र कड़ी है।

दहेज—

  • इस पवित्र बंधन को दूषित करता है,
  • महिलाओं की गरिमा को नष्ट करता है,
  • समाज को अपराध और हिंसा की ओर धकेलता है।

विवाह की पवित्रता तभी बहाल हो सकती है जब—

  • कानून कठोर हों,
  • समाज जागरूक हो,
  • और परिवार नैतिक रूप से दृढ़ हों।

सुप्रीम कोर्ट का यह संदेश केवल कानूनी निर्णय नहीं,
बल्कि सामाजिक पुनर्जागरण का आह्वान है:

“विवाह को बाज़ार का सौदा मत बनने दें—
इसे प्रेम, सम्मान, और गरिमा का पवित्र संस्कार बनाए रखें।”