“लग्ज़री लिटिगेशन” कहकर सुप्रीम कोर्ट ने याचिका खारिज की: पैकेज्ड ड्रिंकिंग वाटर मानकों पर वैश्विक बहस बनाम भारत की जमीनी हकीकत
भारत में न्यायिक विवेक, जनहित याचिकाओं की सीमा और सामाजिक प्राथमिकताओं को लेकर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए Supreme Court of India ने बुधवार को पैकेज्ड ड्रिंकिंग वाटर (बोतलबंद पानी) से जुड़े अंतरराष्ट्रीय मानकों के पालन में कथित विफलता को लेकर दायर याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया। अदालत ने इस याचिका को “लक्ज़री लिटिगेशन” करार देते हुए कहा कि जब देश के बड़े हिस्से आज भी बुनियादी पीने के पानी से वंचित हैं, तब इस तरह के मुद्दों को प्राथमिकता देना न्यायालय की भूमिका के अनुरूप नहीं है।
यह टिप्पणी केवल एक याचिका को खारिज करने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत की सामाजिक-आर्थिक वास्तविकताओं, न्यायालयों की सीमाओं और जनहित की परिभाषा पर एक व्यापक संदेश देती है।
याचिका का विषय: पैकेज्ड ड्रिंकिंग वाटर और अंतरराष्ट्रीय मानक
याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष यह मुद्दा उठाया था कि—
- भारत में बिकने वाले पैकेज्ड ड्रिंकिंग वाटर
- कथित तौर पर अंतरराष्ट्रीय मानकों (International Standards)
- विशेषकर गुणवत्ता, सुरक्षा और लेबलिंग से जुड़े नियमों
का पूरी तरह पालन नहीं कर रहे हैं।
याचिका में तर्क दिया गया कि—
- स्वच्छ और सुरक्षित पेयजल स्वास्थ्य के अधिकार का हिस्सा है
- और बोतलबंद पानी के मामले में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार्य मानकों को अपनाया जाना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट रुख
इस याचिका पर विचार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने बेहद स्पष्ट शब्दों में कहा कि—
“यह एक ‘लक्ज़री लिटिगेशन’ है। देश की बड़ी आबादी आज भी साफ पीने के पानी से वंचित है। ऐसे में पैकेज्ड ड्रिंकिंग वाटर के अंतरराष्ट्रीय मानकों को लेकर न्यायालय से हस्तक्षेप की अपेक्षा करना वास्तविक प्राथमिकताओं से दूर है।”
अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि—
- पैकेज्ड ड्रिंकिंग वाटर एक सीमित वर्ग द्वारा उपभोग किया जाता है
- जबकि करोड़ों लोग आज भी
- नल से जल
- हैंडपंप
- या असुरक्षित जल स्रोतों
पर निर्भर हैं।
“लग्ज़री लिटिगेशन” का अर्थ और निहितार्थ
1. जनहित याचिका की सीमाएं
सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी यह स्पष्ट करती है कि—
- हर सामाजिक या उपभोक्ता मुद्दा
- अपने आप में जनहित (Public Interest) नहीं बन जाता।
यदि—
- याचिका का लाभ
- समाज के एक छोटे, अपेक्षाकृत संपन्न वर्ग तक सीमित हो
तो अदालत उसे जनहित के दायरे में लाने से परहेज कर सकती है।
2. न्यायिक संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग
अदालत ने अप्रत्यक्ष रूप से यह संदेश भी दिया कि—
- न्यायालयों के पास सीमित समय और संसाधन हैं
- और उन्हें ऐसे मामलों पर केंद्रित होना चाहिए
- जो समाज के सबसे कमजोर वर्गों से जुड़े हों।
भारत की जमीनी हकीकत: पीने के पानी की चुनौती
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी भारत की उस वास्तविकता को उजागर करती है, जहां—
- ग्रामीण इलाकों में आज भी
- स्वच्छ पेयजल की पहुंच सीमित है
- शहरी झुग्गी-झोपड़ियों में
- पानी की गुणवत्ता और उपलब्धता गंभीर समस्या है।
सरकारी योजनाओं के बावजूद—
- पाइपलाइन जल आपूर्ति
- जल शुद्धिकरण
- और नियमित आपूर्ति
आज भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।
पैकेज्ड पानी बनाम बुनियादी अधिकार
अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि—
- स्वच्छ पानी तक सार्वभौमिक पहुंच
- एक बुनियादी मानव अधिकार है,
लेकिन—
- पैकेज्ड ड्रिंकिंग वाटर
- उस अधिकार का विकल्प नहीं, बल्कि
- एक व्यावसायिक उत्पाद है।
इसलिए—
- इसके मानकों से जुड़े विवाद
- नीति निर्धारण और नियामक संस्थाओं के दायरे में आते हैं,
- न कि सीधे संवैधानिक अदालत के।
नियामक संस्थाओं की भूमिका
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि—
- पैकेज्ड ड्रिंकिंग वाटर के मानकों का निर्धारण
- और अनुपालन सुनिश्चित करना
मुख्य रूप से—
- कार्यपालिका
- और संबंधित नियामक निकायों
की जिम्मेदारी है।
यदि—
- मानकों में सुधार की आवश्यकता है,
- तो उसका समाधान
- नीति निर्माण
- और प्रशासनिक सुधार
के माध्यम से किया जाना चाहिए।
जनहित याचिकाओं के बढ़ते दायरे पर सवाल
यह निर्णय उस व्यापक बहस को भी जन्म देता है कि—
- क्या हर सार्वजनिक चिंता
- सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे तक लाई जानी चाहिए?
अदालत पहले भी कई अवसरों पर कह चुकी है कि—
- जनहित याचिका
- सामाजिक न्याय का माध्यम है,
- न कि नीतिगत असहमति या
- उपभोक्ता सुविधाओं पर बहस का मंच।
सामाजिक न्याय बनाम उपभोक्ता सुविधा
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने—
- सामाजिक न्याय (Social Justice)
- और उपभोक्ता सुविधा (Consumer Convenience)
के बीच स्पष्ट रेखा खींची।
अदालत का संदेश था कि—
“जहां करोड़ों लोग बुनियादी जरूरतों से जूझ रहे हों, वहां अदालतों को पहले उन मुद्दों पर ध्यान देना चाहिए।”
भविष्य के लिए संदेश
1. याचिकाकर्ताओं के लिए
- जनहित याचिका दायर करने से पहले
- यह आत्ममंथन आवश्यक है कि
- क्या मुद्दा वास्तव में व्यापक जनहित से जुड़ा है।
2. नीति निर्माताओं के लिए
- पैकेज्ड ड्रिंकिंग वाटर जैसे विषयों पर
- स्पष्ट, सुसंगत और प्रभावी नीति
- प्रशासनिक स्तर पर विकसित की जानी चाहिए।
3. समाज के लिए
- यह निर्णय यह सोचने पर मजबूर करता है कि
- हमारी प्राथमिकताएं क्या हैं—
- सुविधा या बुनियादी अधिकार?
निष्कर्ष
पैकेज्ड ड्रिंकिंग वाटर के अंतरराष्ट्रीय मानकों को लेकर दायर याचिका को “लग्ज़री लिटिगेशन” कहकर खारिज करने का सुप्रीम कोर्ट का निर्णय भारतीय न्यायिक सोच का एक महत्वपूर्ण प्रतिबिंब है।
यह फैसला—
- जनहित याचिकाओं की दिशा तय करता है,
- न्यायालयों की सामाजिक प्राथमिकताओं को रेखांकित करता है,
- और यह स्पष्ट करता है कि
- न्यायिक हस्तक्षेप
- वहीं आवश्यक है,
- जहां समाज का बड़ा और वंचित वर्ग प्रभावित हो।
अंततः, यह निर्णय हमें याद दिलाता है कि—
“संविधान का उद्देश्य केवल सुविधाओं का विस्तार नहीं, बल्कि गरिमा, समानता और बुनियादी अधिकारों की सार्वभौमिक सुनिश्चितता है।”
इस दृष्टि से, सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी आने वाले समय में जनहित याचिकाओं की प्रकृति और सीमा तय करने में एक महत्वपूर्ण मार्गदर्शक सिद्ध होगी।