राजमार्गों पर ‘मधुशाला’: राजस्व बनाम जीवन की सुरक्षा के बीच सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप
प्रस्तावना
भारत में सड़कें केवल यातायात का साधन नहीं हैं, बल्कि आर्थिक गतिविधियों, सामाजिक संपर्क और आधुनिक जीवन की धड़कन भी हैं। लेकिन इन्हीं सड़कों पर हर साल हजारों परिवार अपनों को खो देते हैं। सड़क दुर्घटनाओं के पीछे कई कारण होते हैं—तेज रफ्तार, लापरवाही, खराब सड़कें, और सबसे गंभीर कारणों में से एक है शराब पीकर वाहन चलाना।
इसी पृष्ठभूमि में राजमार्गों के किनारे स्थित शराब दुकानों का मुद्दा वर्षों से विवाद का केंद्र रहा है। एक ओर राज्य सरकारों के लिए शराब से मिलने वाला राजस्व है, तो दूसरी ओर आम नागरिकों की जान की सुरक्षा। हाल ही में राजस्थान हाईकोर्ट और उसके बाद सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप ने इस बहस को एक बार फिर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बना दिया है।
यह लेख इसी संवेदनशील टकराव का कानूनी, सामाजिक और संवैधानिक विश्लेषण प्रस्तुत करता है।
राजस्थान हाईकोर्ट का ऐतिहासिक आदेश
24 नवंबर 2025 को राजस्थान हाईकोर्ट ने एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह राजमार्गों के किनारे स्थित 1,102 शराब दुकानों को हटाए। यह आदेश केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि नैतिक और संवैधानिक आधार पर दिया गया था।
हाईकोर्ट के प्रमुख तर्क
- सड़क हादसों में वृद्धि
अदालत ने राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) और सड़क परिवहन मंत्रालय के आंकड़ों का उल्लेख करते हुए कहा कि शराब पीकर वाहन चलाने से होने वाली दुर्घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। राजमार्गों पर शराब की आसान उपलब्धता इस समस्या को और गंभीर बनाती है। - अनुच्छेद 21 का संरक्षण
हाईकोर्ट ने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 21 केवल “जीवन” का अधिकार नहीं, बल्कि “सुरक्षित और गरिमापूर्ण जीवन” का अधिकार देता है। यदि राज्य ऐसी नीतियां अपनाता है जो सीधे तौर पर जीवन को खतरे में डालती हों, तो वह अपने संवैधानिक कर्तव्य से विमुख होता है। - राजस्व बनाम मानव जीवन
राज्य सरकार ने तर्क दिया कि दुकानों को हटाने से लगभग 2100 करोड़ रुपये का राजस्व नुकसान होगा। इस पर हाईकोर्ट ने बेहद सख्त टिप्पणी करते हुए कहा—“2100 करोड़ का राजस्व मानव जीवन की कीमत से अधिक महत्वपूर्ण नहीं हो सकता।”
यह टिप्पणी अपने आप में भारतीय न्यायिक इतिहास की सबसे मजबूत नैतिक घोषणाओं में गिनी जा सकती है।
सुप्रीम कोर्ट में चुनौती और अंतरिम रोक
राजस्थान सरकार और शराब लाइसेंसधारकों ने हाईकोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। मामले की सुनवाई जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने की।
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश पर अंतरिम रोक (Stay) लगा दी। यह रोक पूर्ण समर्थन नहीं, बल्कि अंतिम निर्णय तक अस्थायी व्यवस्था है। फिर भी, इसने पूरे विवाद की दिशा बदल दी।
सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के प्रमुख आधार
1. तमिलनाडु मामले की न्यायिक मिसाल
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत के समक्ष दलील दी कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही तमिलनाडु से जुड़े एक मामले में यह स्पष्ट कर चुका है कि राजमार्गों के पास शराब दुकानों पर पूर्ण प्रतिबंध को लेकर व्यावहारिक संतुलन आवश्यक है।
उस फैसले में अदालत ने कहा था कि शहरी क्षेत्रों में स्थित राजमार्गों पर वही नियम लागू नहीं किए जा सकते जो ग्रामीण या खुले राजमार्गों पर होते हैं।
2. शहरी सीमा का प्रश्न
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि कई राजमार्ग अब नगर निगम और नगरपालिकाओं की सीमा में आ चुके हैं। वहां ट्रैफिक की गति कम होती है, सड़कों पर पैदल यात्री, बाजार और आवासीय क्षेत्र होते हैं। ऐसे में उन्हें केवल “राजमार्ग” मानकर कठोर नियम लागू करना व्यवहारिक कठिनाइयों को जन्म देता है।
3. व्यापारिक अधिकारों का संरक्षण
अदालत ने यह भी स्वीकार किया कि शराब लाइसेंसधारकों ने सरकार को भारी लाइसेंस फीस दी है। अचानक दुकानों को बंद करना उनके व्यापार करने के मौलिक अधिकार (Article 19(1)(g)) पर भी असर डालता है।
4. प्रशासनिक अव्यवस्था की आशंका
1,102 दुकानों को एक साथ हटाने से न केवल राजस्व प्रभावित होता, बल्कि नई जगहों पर पुनर्वास, लाइसेंस संशोधन और कर्मचारियों के भविष्य जैसे कई प्रशासनिक प्रश्न भी खड़े होते।
हाईकोर्ट बनाम सुप्रीम कोर्ट: दृष्टिकोण का अंतर
| बिंदु | राजस्थान हाईकोर्ट | सुप्रीम कोर्ट (अंतरिम) |
|---|---|---|
| प्राथमिकता | सार्वजनिक सुरक्षा | न्यायिक मिसाल व संतुलन |
| दृष्टिकोण | नैतिक और संवैधानिक | तकनीकी और कानूनी |
| राजस्व | जीवन से कमतर | आर्थिक स्थिरता भी जरूरी |
| दायरा | 500 मीटर तक पूर्ण पाबंदी | शहरी सीमा में ढील संभव |
यह तालिका स्पष्ट करती है कि दोनों अदालतों के दृष्टिकोण में मूल अंतर “दृष्टि” का है—एक जीवन की नैतिक प्राथमिकता देखता है, दूसरा कानूनी संतुलन।
भारत में सड़क दुर्घटनाओं की भयावह सच्चाई
भारत में दुनिया के केवल लगभग 1% वाहन हैं, लेकिन सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली मौतों का लगभग 11% हिस्सा भारत में होता है। यह आंकड़ा अपने आप में हमारी यातायात नीति और सामाजिक जिम्मेदारी पर सवाल खड़ा करता है।
शराब पीकर वाहन चलाना इन दुर्घटनाओं का एक प्रमुख कारण है। विशेषज्ञों का मानना है कि राजमार्गों के किनारे शराब दुकानों की मौजूदगी इस प्रवृत्ति को अप्रत्यक्ष रूप से बढ़ावा देती है।
शहरीकरण और नई चुनौती
आज भारत तेजी से शहरीकरण की ओर बढ़ रहा है। जो राजमार्ग कभी शहरों से बाहर थे, वे अब शहरों के बीचोंबीच आ चुके हैं।
ऐसे में सवाल उठता है—
क्या शहरी सीमा में आने से सड़क की संवेदनशीलता कम हो जाती है?
क्या वहां दुर्घटनाओं का खतरा समाप्त हो जाता है?
उत्तर स्पष्ट है—नहीं।
शहरी राजमार्गों पर ट्रैफिक अधिक होता है, पैदल यात्री ज्यादा होते हैं, और छोटी सी लापरवाही भी बड़ी दुर्घटना का कारण बन सकती है।
सामाजिक प्रभाव
राजमार्गों के किनारे शराब दुकानों की मौजूदगी केवल दुर्घटनाओं तक सीमित नहीं है। इसके कई सामाजिक प्रभाव भी हैं—
- पारिवारिक हिंसा में वृद्धि
- सार्वजनिक स्थानों पर अशांति
- युवाओं में गलत आदतों को बढ़ावा
- महिलाओं की सुरक्षा पर असर
इन सभी पहलुओं को केवल “राजस्व” के तराजू में तौलना सामाजिक दृष्टि से भी अनुचित माना जाता है।
संवैधानिक दृष्टिकोण
संविधान का अनुच्छेद 47 राज्य को निर्देश देता है कि वह नशीले पदार्थों के सेवन को नियंत्रित करने का प्रयास करे। यह एक Directive Principle of State Policy है, लेकिन इसका नैतिक और नीतिगत महत्व बहुत बड़ा है।
जब अदालतें शराब नीति पर हस्तक्षेप करती हैं, तो वे केवल कानून नहीं, बल्कि संविधान की आत्मा की रक्षा भी करती हैं।
क्या अदालतें नीतिगत मामलों में हस्तक्षेप करें?
यह प्रश्न भी महत्वपूर्ण है। कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि शराब नीति पूरी तरह सरकार का विषय है और अदालतों को इसमें सीमित हस्तक्षेप करना चाहिए। वहीं दूसरे पक्ष का कहना है कि जब नीति सीधे तौर पर जीवन के अधिकार को प्रभावित करे, तो न्यायपालिका का हस्तक्षेप आवश्यक हो जाता है।
राजस्थान मामला इसी द्वंद्व का जीवंत उदाहरण है।
भविष्य की राह
सुप्रीम कोर्ट का आदेश फिलहाल अंतरिम है। अंतिम फैसला आने में समय लगेगा। लेकिन यह स्पष्ट है कि भविष्य में सरकारों को ऐसी नीतियां बनानी होंगी जिनमें—
- सड़क सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता हो
- शराब दुकानों का स्थान वैज्ञानिक और सामाजिक अध्ययन के आधार पर तय हो
- राजस्व के साथ-साथ जनजीवन का संतुलन रखा जाए
- वैकल्पिक राजस्व स्रोतों पर भी गंभीरता से विचार किया जाए
निष्कर्ष
राजमार्गों पर ‘मधुशाला’ केवल एक प्रशासनिक या कानूनी मुद्दा नहीं, बल्कि यह हमारे समाज की प्राथमिकताओं का आईना है।
क्या हम राजस्व के लिए जीवन को जोखिम में डाल सकते हैं?
क्या आर्थिक लाभ मानव सुरक्षा से बड़ा हो सकता है?
राजस्थान हाईकोर्ट ने इन सवालों का उत्तर नैतिक दृढ़ता के साथ दिया। सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें कानूनी संतुलन के तराजू पर रखा। अब अंतिम निर्णय इस बात को तय करेगा कि भारतीय न्याय व्यवस्था भविष्य में किस दिशा में आगे बढ़ेगी।
सच्चाई यही है कि दीर्घकालिक समाधान केवल अदालतों से नहीं, बल्कि सरकार, समाज और नागरिकों की सामूहिक जिम्मेदारी से ही संभव है। जब तक सड़क पर उतरने वाला हर व्यक्ति सुरक्षित नहीं होगा, तब तक किसी भी राजस्व को “विकास” नहीं कहा जा सकता।