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“यौन शिक्षा पर सुप्रीम कोर्ट का दूरदर्शी दृष्टिकोण: यह केवल कक्षा 9वीं के बाद नहीं, बल्कि कम उम्र से ही दी जानी चाहिए”

“यौन शिक्षा पर सुप्रीम कोर्ट का दूरदर्शी दृष्टिकोण: यह केवल कक्षा 9वीं के बाद नहीं, बल्कि कम उम्र से ही दी जानी चाहिए”


प्रस्तावना

       भारतीय समाज में यौन शिक्षा (Sex Education) लंबे समय से एक संवेदनशील, विवादास्पद और अक्सर गलत समझा जाने वाला विषय रहा है। परंपरा, सामाजिक झिझक और भ्रांतियों के कारण इसे आज भी कई लोग केवल “वयस्क विषय” मानते हैं। परिणामस्वरूप, बच्चों और किशोरों को सही, वैज्ञानिक और नैतिक जानकारी समय पर नहीं मिल पाती।
इसी गंभीर सामाजिक वास्तविकता को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट और दूरगामी दृष्टिकोण अपनाते हुए कहा है कि यौन शिक्षा केवल कक्षा 9वीं के बाद सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि इसे कम उम्र से, आयु-उपयुक्त और चरणबद्ध तरीके से दिया जाना चाहिए।

यह विचार केवल शिक्षा नीति का विषय नहीं, बल्कि बच्चों की सुरक्षा, गरिमा, स्वास्थ्य और मौलिक अधिकारों से गहराई से जुड़ा हुआ है।


यौन शिक्षा को लेकर समाज में व्याप्त भ्रांतियाँ

भारत में यौन शिक्षा को लेकर कई गलत धारणाएँ प्रचलित हैं, जैसे—

  • इससे बच्चे “बिगड़” जाते हैं
  • यह उन्हें गलत रास्ते पर ले जाती है
  • यह भारतीय संस्कृति के विरुद्ध है

सुप्रीम कोर्ट ने समय-समय पर इन भ्रांतियों को खारिज करते हुए कहा है कि—

“अज्ञान बच्चों की रक्षा नहीं करता, बल्कि उन्हें अधिक असुरक्षित बनाता है।”

अदालत का मानना है कि सही उम्र में सही जानकारी देना बच्चों को शोषण, हिंसा और भ्रम से बचाने का सबसे प्रभावी तरीका है।


सुप्रीम कोर्ट का दृष्टिकोण: शिक्षा बनाम चुप्पी

सुप्रीम कोर्ट ने अपने विभिन्न अवलोकनों में यह रेखांकित किया है कि—

  • यौन अपराधों की बढ़ती घटनाएँ
  • बच्चों के खिलाफ यौन शोषण
  • किशोरों में गलत जानकारी के कारण जोखिमपूर्ण व्यवहार

इस बात का संकेत हैं कि चुप्पी और सामाजिक झिझक ने समस्या को और गंभीर बना दिया है।

अदालत ने यह स्पष्ट किया कि—

“यौन शिक्षा का उद्देश्य अश्लीलता फैलाना नहीं, बल्कि बच्चों को उनके शरीर, सीमाओं, सहमति और सुरक्षा के बारे में जागरूक करना है।”


कम उम्र से यौन शिक्षा क्यों आवश्यक है?

1. बाल यौन शोषण से सुरक्षा

सुप्रीम कोर्ट ने POCSO अधिनियम से जुड़े मामलों में बार-बार यह कहा है कि—

  • अधिकांश बच्चे यह भी नहीं जानते कि उनके साथ जो हो रहा है, वह गलत या अपराध है।
  • यदि बच्चों को कम उम्र से यह सिखाया जाए कि
    • “अच्छा स्पर्श” और “बुरा स्पर्श” क्या होता है,
    • उनकी शारीरिक सीमाएँ क्या हैं,
      तो वे शोषण के खिलाफ आवाज़ उठा सकते हैं।

2. शरीर और विकास को लेकर भ्रम दूर करना

बचपन और किशोरावस्था में—

  • शारीरिक बदलाव
  • भावनात्मक उतार-चढ़ाव
  • जिज्ञासाएँ

स्वाभाविक हैं।
यदि इन विषयों पर वैज्ञानिक और संवेदनशील जानकारी नहीं दी जाती, तो बच्चे—

  • इंटरनेट,
  • अशुद्ध स्रोतों,
  • या गलत संगत

से जानकारी लेते हैं, जो उन्हें गुमराह कर सकती है।


3. सहमति (Consent) की समझ

सुप्रीम कोर्ट ने सहमति को मानव गरिमा का अभिन्न अंग बताया है।
कम उम्र से बच्चों को यह सिखाना कि—

  • उनकी “ना” का महत्व है
  • और दूसरों की “ना” का सम्मान करना भी उतना ही जरूरी है

आगे चलकर लैंगिक अपराधों को रोकने में मदद कर सकता है।


कक्षा 9वीं के बाद क्यों देर हो जाती है?

सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर चिंता व्यक्त की है कि—

  • कई बच्चे कक्षा 9वीं से पहले ही
    शारीरिक और मानसिक बदलावों से गुजर चुके होते हैं।
  • कई मामलों में शोषण
    बहुत कम उम्र में ही शुरू हो जाता है।

अतः यदि यौन शिक्षा केवल 14–15 वर्ष की उम्र के बाद दी जाए,
तो वह रोकथाम (Prevention) की बजाय केवल प्रतिक्रिया (Reaction) बनकर रह जाती है।


आयु-उपयुक्त और चरणबद्ध शिक्षा पर जोर

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया है कि—

  • यौन शिक्षा का अर्थ यह नहीं कि
    सभी विषय एक साथ और एक ही स्तर पर पढ़ाए जाएँ।

बल्कि—

  • छोटे बच्चों को
    शरीर के अंगों के नाम,
    निजता,
    अच्छा-बुरा स्पर्श

सिखाया जाए।

  • बड़े बच्चों को
    किशोरावस्था,
    भावनाएँ,
    सहमति,
    और जिम्मेदारी

के बारे में बताया जाए।


संविधान और यौन शिक्षा

सुप्रीम कोर्ट ने यौन शिक्षा को संविधान के कई प्रावधानों से जोड़ा है—

अनुच्छेद 21 – जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता

स्वस्थ जीवन, मानसिक स्वास्थ्य और गरिमा
अनुच्छेद 21 का अभिन्न हिस्सा हैं।
सही यौन शिक्षा इन सभी को सुदृढ़ करती है।

अनुच्छेद 15 और 39(f)

  • लैंगिक समानता
  • बच्चों का स्वस्थ विकास

राज्य की जिम्मेदारी है।


अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण और भारत

अदालत ने यह भी माना है कि—

  • विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO)
  • और UNICEF

जैसी संस्थाएँ
कम उम्र से Comprehensive Sexuality Education की सिफारिश करती हैं।

भारत, जो बच्चों की सबसे बड़ी आबादी वाला देश है,
वह इस दिशा में पीछे नहीं रह सकता।


माता-पिता और शिक्षकों की भूमिका

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि—

  • केवल स्कूलों पर ही जिम्मेदारी नहीं डाली जा सकती।
  • माता-पिता और शिक्षकों को भी
    खुला, संवेदनशील और सहयोगी रवैया अपनाना होगा।

डर और दंड की बजाय
संवाद और विश्वास का वातावरण आवश्यक है।


विरोध और अदालत की प्रतिक्रिया

यौन शिक्षा के विरोध में यह तर्क दिया जाता है कि—

  • यह “संस्कृति के खिलाफ” है।

सुप्रीम कोर्ट ने इस पर कहा है कि—

“संस्कृति बच्चों की रक्षा से बड़ी नहीं हो सकती।”

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि
ज्ञान कभी भी अनैतिक नहीं होता,
अनैतिकता अज्ञान से जन्म लेती है।


निष्कर्ष

यौन शिक्षा पर सुप्रीम कोर्ट का यह दृष्टिकोण
केवल शिक्षा सुधार नहीं, बल्कि
सामाजिक चेतना और बाल अधिकारों की रक्षा की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

अदालत ने स्पष्ट संदेश दिया है कि—

  • यौन शिक्षा को लेकर चुप्पी तोड़नी होगी,
  • इसे केवल कक्षा 9वीं के बाद सीमित नहीं रखा जा सकता,
  • और कम उम्र से, वैज्ञानिक, संवेदनशील व आयु-उपयुक्त शिक्षा देना
    बच्चों के सुरक्षित भविष्य के लिए अनिवार्य है।

यदि भारत को
यौन अपराधों से मुक्त,
स्वस्थ और संवेदनशील समाज बनाना है,
तो सुप्रीम कोर्ट की इस सोच को नीति और व्यवहार दोनों में लागू करना ही होगा।

यह केवल कानून का प्रश्न नहीं,
बल्कि पीढ़ियों के भविष्य का सवाल है।