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यूपीआई ठगी की रकम का साइड इफेक्ट: निर्दोष खाताधारकों के बैंक खाते ब्लॉक, 36 हजार लोग बने सिस्टम की सख्ती के शिकार

यूपीआई ठगी की रकम का साइड इफेक्ट: निर्दोष खाताधारकों के बैंक खाते ब्लॉक, 36 हजार लोग बने सिस्टम की सख्ती के शिकार

        डिजिटल इंडिया के दौर में यूपीआई (UPI) ने लेन–देन को जितना आसान बनाया है, उतना ही जटिल एक नया संकट भी खड़ा कर दिया है। यह संकट उन आम नागरिकों का है, जो न तो ठग हैं, न ठगी में शामिल, फिर भी उनके बैंक खाते महीनों से बंद पड़े हैं। मुंबई के अंधेरी वेस्ट स्ट्रीट मार्केट में घरेलू सामान की दुकान चलाने वाले सुधीर की पीड़ा इसी बड़े राष्ट्रीय संकट की एक मिसाल मात्र है।


सुधीर की कहानी: 826 रुपये और डेढ़ महीने की सजा

मुंबई के अंधेरी वेस्ट इलाके में रहने वाले सुधीर रोज़ की तरह अपनी छोटी सी दुकान पर सामान बेच रहे थे। एक अंजान ग्राहक आया, कुछ घरेलू सामान खरीदा और 826 रुपये यूपीआई से भुगतान कर चला गया। न कोई शक, न कोई संदेह—क्योंकि आजकल यही सामान्य व्यापार है।

लेकिन कुछ ही दिनों बाद सुधीर के जीवन में भूचाल आ गया।
उनका बैंक खाता अचानक बंद कर दिया गया। बैंक गए तो बताया गया—

“आपके खाते में ठगी की रकम आई है, इसलिए खाता ब्लॉक किया गया है।”

सुधीर के लिए यह किसी सदमे से कम नहीं था।

  • न उन्हें ठगी की जानकारी
  • न किसी अपराध में भूमिका
  • फिर भी खाता सील

डेढ़ महीने बीत चुके हैं, लेकिन खाता अब तक चालू नहीं हुआ। इस कारण—

  • दुकानदारी प्रभावित
  • सप्लायर को भुगतान नहीं
  • रोज़मर्रा का जीवन ठप

पुलिस जांच: निर्दोष, फिर भी सजा

सुधीर ने पुलिस से संपर्क किया। जांच में यह साफ हो गया कि—

  • सुधीर का ठगी से दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं
  • वे केवल एक दुकानदार हैं
  • यूपीआई भुगतान लेना उनका रोज़ का काम है

पुलिस ने सुधीर के बैंक को खाता रिओपन करने का पत्र भी लिखा।
इसके बावजूद बैंक ने खाता अब तक चालू नहीं किया।

यह यहीं खत्म नहीं होता—
सुधीर अकेले नहीं हैं।


36 हजार खातों का ब्लॉक होना: एक ठगी, हजारों पीड़ित

यह पूरा मामला फरीदाबाद के एनआईटी क्षेत्र से जुड़ा है, जहां 24 अक्टूबर 2025 को एक व्यक्ति के साथ 4.43 करोड़ रुपये की साइबर ठगी हुई। पीड़ित ने राष्ट्रीय साइबर हेल्पलाइन 1930 पर शिकायत दर्ज कराई।

इसके बाद जो हुआ, उसने पूरे देश के हजारों लोगों की जिंदगी उलट दी।

  • गृह मंत्रालय की साइबर प्रणाली के तहत
  • ठगी की रकम जिन-जिन खातों में ट्रांसफर हुई
  • उन सभी खातों को तुरंत ब्लॉक कर दिया गया

परिणाम:
👉 36,000 से अधिक बैंक खाते फ्रीज


गिरफ्तारियां और असली आरोपी

इस मामले में पुलिस ने—

  • 9 लोगों को गिरफ्तार किया है
  • ये सभी खाताधारक थे
  • और इन्हें ठगी की पूरी जानकारी थी

इनके कुछ और साथी फरार हैं, जिनकी तलाश जारी है।
लेकिन सच्चाई यह है कि—

36 हजार में से अधिकांश खाताधारक पूरी तरह निर्दोष हैं।

उन्हें यह तक नहीं पता कि उनके खाते में आए पैसे ठगी के हैं।


असली पीड़ित को भी नहीं मिला पैसा

विडंबना यह है कि—

  • जिनसे 4.43 करोड़ की ठगी हुई
  • उन्हें आज तक एक रुपया भी वापस नहीं मिला

और दूसरी तरफ—

  • निर्दोष दुकानदार
  • पेट्रोल पंप मालिक
  • रेहड़ी–पटरी वाले
  • छोटे कारोबारी

सबके खाते बंद, जीवन अस्त–व्यस्त।


किन राज्यों से आ रहे हैं पीड़ित?

एनआईटी साइबर थाने में रोज़ फोन और लोग पहुंच रहे हैं—

  • उत्तर प्रदेश
  • बिहार
  • राजस्थान
  • मध्य प्रदेश
  • महाराष्ट्र (मुंबई)
  • पश्चिम बंगाल
  • गुजरात
  • दिल्ली
  • हिमाचल प्रदेश
  • उत्तराखंड
  • कर्नाटक
  • और अन्य कई राज्य

लोग रोते हुए बताते हैं—

“साहब, मेरे खाते में सिर्फ 200 रुपये आए थे, फिर भी खाता बंद कर दिया गया।”


पुलिस की मजबूरी और सिस्टम की खामी

एनआईटी थाना प्रभारी जितेंद्र कुमार के अनुसार—

  • साइबर ठगी की शिकायत 1930 पर आते ही
  • गृह मंत्रालय की प्रणाली
  • पैसे की ट्रेल फॉलो करती है
  • और जिन खातों में रकम जाती है, उन्हें ब्लॉक कर देती है

यह प्रक्रिया ऑटोमैटिक है।
यहां समस्या यह है कि—

खाता ब्लॉक करने से पहले कोई प्रारंभिक जांच नहीं होती
❌ यह नहीं देखा जाता कि खाताधारक दुकानदार है या अपराधी


आम दुकानदार कैसे पहचाने ठगी की रकम?

यह सबसे बड़ा सवाल है—

एक दुकानदार कैसे जाने कि यूपीआई से आई रकम ठगी की है या वेतन, पेंशन या सामान्य भुगतान?

  • यूपीआई ट्रांजैक्शन में कोई टैग नहीं
  • कोई चेतावनी नहीं
  • कोई “संदिग्ध” अलर्ट नहीं

फिर सजा क्यों आम आदमी को?


हाई कोर्ट तक जाने को मजबूर लोग

कई पीड़ितों ने बताया कि—

  • बैंक
  • पुलिस
  • साइबर सेल

सब जगह चक्कर काटने के बाद
उन्हें हाई कोर्ट की शरण लेनी पड़ी।

तब कहीं जाकर—

  • खाता डीफ्रीज हुआ
  • लेकिन महीनों बाद

गिरफ्तार आरोपी

इस मामले में पुलिस ने जिन लोगों को गिरफ्तार किया है, उनमें शामिल हैं—

  • लखनऊ–सीतापुर: हिमांशु, आरिश, गौरव, मोनिक, रवि
  • उत्तराखंड: खिलाफत, मोहम्मद कादिर
  • गुजरात (सूरत): सुशील

सभी आरोपी फिलहाल जेल में हैं।


गृह मंत्रालय को पत्र, समाधान की मांग

पुलिस ने इस गंभीर समस्या को लेकर
गृह मंत्रालय
को पत्र लिखा है।

मांग की गई है कि—

  • निर्दोष खाताधारकों के लिए
  • एक फास्ट ट्रैक जांच और अनब्लॉक सिस्टम बने
  • खाता ब्लॉक करने से पहले
    प्रारंभिक सत्यापन हो

कानूनी और नीतिगत सवाल

यह मामला कई बड़े सवाल खड़े करता है—

  1. क्या बिना जांच खाता ब्लॉक करना उचित है?
  2. क्या डिजिटल भुगतान की सुरक्षा की कीमत आम नागरिक चुकाएगा?
  3. क्या निर्दोष व्यक्ति को आर्थिक रूप से पंगु बनाना न्यायसंगत है?

समाधान क्या हो सकता है?

विशेषज्ञों के अनुसार—

  • Tiered Blocking System हो
  • पहले सीमित रोक
  • फिर जांच
  • और केवल दोषी खातों पर पूर्ण ब्लॉक

साथ ही—

  • दुकानदारों के लिए सेफ हार्बर प्रोटेक्शन
  • और बैंकों को तय समयसीमा में खाता खोलने का निर्देश

निष्कर्ष: ठगी रोकें, लेकिन निर्दोष न कुचलें

साइबर ठगी एक गंभीर अपराध है और उस पर सख्ती ज़रूरी है।
लेकिन—

ठग को पकड़ने के चक्कर में
ईमानदार दुकानदार को सजा देना
न्याय नहीं, व्यवस्था की विफलता है।

सुधीर जैसे हजारों लोग आज भी इंतजार कर रहे हैं—

  • अपने ही पैसे तक पहुंच पाने का
  • अपने खाते के दोबारा खुलने का

अब वक्त है कि सिस्टम
सख्त होने के साथ–साथ संवेदनशील भी बने