“मृत्युदंड के बाद बरी हुए तीन निर्दोषों ने मांगा मुआवजा: सर्वोच्च न्यायालय ने अटॉर्नी जनरल और सॉलिसिटर जनरल से मांगी सहायता — ‘न्यायिक त्रुटि और मानवाधिकारों’ पर ऐतिहासिक बहस”
परिचय
भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में एक ऐसे संवेदनशील और ऐतिहासिक महत्व के मामले पर सुनवाई शुरू की है, जिसमें तीन निर्दोष व्यक्तियों ने मृत्युदंड की सजा से बरी होने के बाद अपनी गलत कैद (wrongful incarceration) के लिए मुआवजे की मांग की है।
यह मामला भारतीय न्याय व्यवस्था में एक अत्यंत गूढ़ प्रश्न उठाता है—
“क्या किसी व्यक्ति को राज्य से मुआवजा मिलना चाहिए, जब उसे गलत तरीके से मृत्युदंड की सजा दी गई हो और बाद में निर्दोष पाया गया हो?”
इस गंभीर संवैधानिक प्रश्न पर विचार करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने भारत के अटॉर्नी जनरल (AG) और सॉलिसिटर जनरल (SG) से इस मुद्दे पर विस्तृत सहायता मांगी है, ताकि इस मामले का निपटारा केवल व्यक्तिगत न्याय तक सीमित न रहे, बल्कि “न्यायिक जवाबदेही” और “मानवाधिकार सुरक्षा” के व्यापक सिद्धांतों को भी स्पष्ट कर सके।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला तीन ऐसे व्यक्तियों से संबंधित है जिन्हें एक हत्या के मामले में दोषी ठहराया गया था और उन्हें फांसी की सजा (death penalty) सुनाई गई थी।
इन तीनों ने वर्षों जेल में बिताए, जिनमें से कई वर्ष उन्होंने मृत्युदंड की कोठरी (death row) में बिताए।
हालांकि, लंबी न्यायिक प्रक्रिया के बाद, सुप्रीम कोर्ट ने सबूतों की पुनः जांच के आधार पर उन्हें बरी कर दिया, यह कहते हुए कि अभियोजन पक्ष (prosecution) अपराध को “संदेह से परे” (beyond reasonable doubt) साबित नहीं कर सका।
बरी होने के बाद, इन तीनों ने सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष यह दलील रखी कि—
“हमने अपने जीवन के सबसे कीमती वर्ष जेल में बिताए, जबकि हम निर्दोष थे।
राज्य की विफलता ने हमारी स्वतंत्रता, सम्मान और परिवार सब कुछ छीन लिया।
अब संविधान के तहत हमें मुआवजे का अधिकार मिलना चाहिए।”
सर्वोच्च न्यायालय की सुनवाई
सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय की पीठ ने इस मुद्दे को “गंभीर मानवाधिकार प्रश्न” बताते हुए कहा कि—
“यदि राज्य की लापरवाही या न्यायिक त्रुटि के कारण किसी निर्दोष व्यक्ति को वर्षों तक जेल में रहना पड़े,
तो यह संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार) का उल्लंघन है।
ऐसे व्यक्ति को न्यायिक मुआवजे का अधिकार दिया जाना चाहिए।”
न्यायालय ने इस विषय की संवेदनशीलता को देखते हुए भारत के अटॉर्नी जनरल और सॉलिसिटर जनरल को निर्देश दिया कि वे इस पर विस्तृत कानूनी सहायता प्रदान करें, ताकि “wrongful prosecution and incarceration” के लिए भारत में एक सुसंगत नीति विकसित की जा सके।
संविधानिक दृष्टिकोण: अनुच्छेद 21 और 32
भारत के संविधान का अनुच्छेद 21 कहता है कि—
“किसी व्यक्ति को उसके जीवन या व्यक्तिगत स्वतंत्रता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अतिरिक्त वंचित नहीं किया जाएगा।”
सुप्रीम कोर्ट ने वर्षों से इस अनुच्छेद को मानव गरिमा (human dignity) से जोड़कर पढ़ा है।
जब कोई निर्दोष व्यक्ति झूठे आरोप में वर्षों तक जेल में बंद रहता है, तो यह न केवल उसकी स्वतंत्रता का हनन है, बल्कि उसकी गरिमा, परिवार और सामाजिक जीवन का भी विनाश है।
ऐसे में अनुच्छेद 32 के तहत व्यक्ति को प्रत्यक्ष संवैधानिक उपाय प्राप्त है, जिसके तहत वह सुप्रीम कोर्ट से मुआवजे की मांग कर सकता है।
‘Wrongful Prosecution’ और ‘Compensation’ का भारतीय परिदृश्य
भारत में अब तक ‘wrongful prosecution’ के मामलों में मुआवजा देने का कोई स्पष्ट कानूनी ढांचा (statutory framework) नहीं है।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने कई बार न्यायिक रूप से ऐसे मुआवजे दिए हैं, विशेषकर तब जब राज्य या पुलिस की लापरवाही से किसी निर्दोष व्यक्ति की स्वतंत्रता छीनी गई हो।
प्रमुख मामले:
- Rudal Shah v. State of Bihar (1983) 4 SCC 141
इस ऐतिहासिक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि किसी व्यक्ति को बरी होने के बाद भी जेल में रखा जाता है, तो यह अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है।
कोर्ट ने मुआवजे का आदेश दिया और कहा कि “compensation is a legitimate remedy for violation of fundamental rights.” - Bhim Singh v. State of J&K (1985) 4 SCC 677
कोर्ट ने एक विधायक को अवैध रूप से हिरासत में रखने पर राज्य से मुआवजा देने का आदेश दिया। - Nilabati Behera v. State of Orissa (1993) 2 SCC 746
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मौलिक अधिकारों के उल्लंघन की स्थिति में मुआवजा एक आवश्यक उपाय है, और यह राज्य की जवाबदेही का हिस्सा है।
अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण
1. International Covenant on Civil and Political Rights (ICCPR)
भारत इस अंतरराष्ट्रीय संधि का हस्ताक्षरकर्ता है।
Article 14(6) के तहत कहा गया है कि—
“जब किसी व्यक्ति को अपराध से बरी कर दिया जाता है, और यह साबित हो जाए कि उसकी सजा न्यायिक त्रुटि का परिणाम थी,
तो उसे उचित मुआवजा पाने का अधिकार होगा।”
हालांकि भारत ने इस अनुच्छेद को अपने घरेलू कानून में अब तक स्पष्ट रूप से लागू नहीं किया है।
2. United States और United Kingdom के उदाहरण
- अमेरिका में “Wrongful Conviction Compensation Act” के तहत प्रत्येक राज्य में निर्दोष कैदियों को मुआवजा दिया जाता है।
- ब्रिटेन में भी Criminal Justice Act, 1988 की धारा 133 के तहत ऐसी व्यवस्था है।
सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया है कि भारत को भी इसी तरह का कानूनी ढांचा विकसित करने की आवश्यकता है, ताकि “state accountability” सुनिश्चित हो सके।
मृत्युदंड और मानसिक पीड़ा का प्रश्न
इस मामले का सबसे संवेदनशील पहलू यह है कि तीनों व्यक्तियों को मृत्युदंड की सजा दी गई थी।
उन्होंने न केवल वर्षों जेल में बिताए, बल्कि “death row” में रहते हुए हर दिन यह भय झेला कि किसी भी सुबह उन्हें फांसी पर चढ़ा दिया जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट ने इस संदर्भ में कहा कि—
“मृत्युदंड की कोठरी में बिताया गया एक-एक दिन व्यक्ति की आत्मा को तोड़ देता है।
यदि बाद में वही व्यक्ति निर्दोष पाया जाए, तो यह केवल न्यायिक त्रुटि नहीं, बल्कि मानवीय त्रासदी है।”
कोर्ट ने इस मानसिक और शारीरिक पीड़ा को “constitutional tort” बताया — अर्थात राज्य द्वारा हुई ऐसी हानि जिसके लिए मुआवजा देना संवैधानिक दायित्व है।
राज्य की जवाबदेही (State Liability)
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि जब किसी व्यक्ति को गलत सजा दी जाती है, तो यह केवल अभियोजन पक्ष की गलती नहीं होती, बल्कि राज्य की संस्थागत विफलता (institutional failure) होती है।
इसलिए राज्य को इसकी “vicarious liability” स्वीकार करनी होगी।
“राज्य की यह जिम्मेदारी है कि वह नागरिकों की स्वतंत्रता की रक्षा करे।
जब वही राज्य उन्हें अन्यायपूर्ण रूप से दंडित करता है, तो मुआवजा देना उसका नैतिक और कानूनी कर्तव्य बन जाता है।”
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश
कोर्ट ने फिलहाल तीनों याचिकाओं पर अंतिम निर्णय स्थगित रखते हुए केंद्र सरकार से निम्नलिखित बिंदुओं पर सुझाव मांगे हैं—
- क्या भारत में wrongful conviction के मामलों के लिए कोई राष्ट्रीय नीति (national framework) बनाई जानी चाहिए?
- क्या कानून आयोग (Law Commission) को इस विषय पर सिफारिश देने के लिए निर्देशित किया जा सकता है?
- क्या संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत ऐसे मामलों में स्वतः मुआवजे का अधिकार विकसित किया जा सकता है?
- मृत्युदंड से बरी हुए लोगों के लिए अतिरिक्त मानसिक क्षति (psychological trauma) के आधार पर अलग मुआवजा मापदंड तय किया जाए?
अदालत ने केंद्र सरकार से कहा है कि AG और SG अगले सुनवाई में विस्तृत सुझाव दें।
संभावित प्रभाव
यदि सुप्रीम कोर्ट इस मामले में “wrongful incarceration compensation” का सिद्धांत स्पष्ट रूप से मान्यता देता है, तो यह भारत में न्यायिक सुधार (judicial reform) का एक नया अध्याय खोलेगा।
इसके परिणामस्वरूप—
- निर्दोष कैदियों को न्याय और राहत मिलेगी,
- पुलिस और अभियोजन एजेंसियों पर जिम्मेदारी बढ़ेगी,
- और न्यायिक त्रुटियों पर रोक लगेगी।
इसके अलावा यह फैसला संविधान के मानव गरिमा (Article 21) और संपत्ति एवं स्वतंत्रता (Article 300A) दोनों के संरक्षण को सशक्त करेगा।
मानवाधिकार संगठनों की प्रतिक्रिया
कई मानवाधिकार संगठनों ने इस पहल का स्वागत किया है।
उनका कहना है कि भारत में हजारों ऐसे कैदी हैं जो या तो झूठे मामलों में फंसे हैं या लंबे समय तक मुकदमे के बिना जेल में हैं।
ऐसे में सुप्रीम कोर्ट का यह रुख उन सभी के लिए आशा की किरण है।
निष्कर्ष
यह मामला केवल तीन व्यक्तियों का नहीं है; यह भारत की न्याय व्यवस्था के विश्वसनीयता (credibility) का प्रश्न है।
सर्वोच्च न्यायालय का यह कदम यह दर्शाता है कि भारतीय न्यायपालिका केवल अपराधी को सज़ा देने तक सीमित नहीं है, बल्कि वह निर्दोषों के अधिकारों की रक्षा को भी उतनी ही गंभीरता से लेती है।
यदि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट मुआवजे के सिद्धांत को संवैधानिक अधिकार के रूप में स्थापित करता है, तो यह भारतीय न्याय प्रणाली में “Restorative Justice” की दिशा में एक ऐतिहासिक मील का पत्थर होगा।
कानून का वास्तविक उद्देश्य केवल दंड देना नहीं, बल्कि अन्याय को सुधारना भी है।
और यही संदेश इस मामले से पूरे देश को मिलता है —
“न्याय केवल अदालत का फैसला नहीं, बल्कि समाज की आत्मा का संतुलन है।”