महाराष्ट्र में बाघों की लगातार मौतें: एक दुखद चिन्ता, न्यायिक चेतावनी और संरक्षित प्रजाति की सुरक्षा का तंत्र
प्रस्तावना: बाघ — भारत की जंगली शान और संरक्षण की चुनौती
भारत विश्व में बाघों की सबसे बड़ी विरासत वाला देश है। हमारे जंगल, वन्यजीव अभयारण्यों और संरक्षित क्षेत्रों में यह विशाल बाघ (Tiger) केवल एक खूबसूरत प्रजाति नहीं है, बल्कि जैव विविधता और पारिस्थितिकी (Ecosystem) के संतुलन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है। बाघ की मौजूदगी यह दर्शाती है कि हमारा जंगल स्वस्थ है, जहाँ तंत्रिका तंत्र (Food Chain) से लेकर वनों की मिट्टी तक सब कुछ संतुलन में है।
लेकिन जब संरक्षित वन्यजीव खुद ही खतरे में आ जाएं, तो यह केवल एक वन्यजीव संरक्षण का सवाल नहीं रह जाता — यह पूरे पारिस्थितिकी, प्रशासनिक जवाबदेही, नीति-निर्माण, मानव-वन्यजीव संघर्ष, न्यायपालिका की भूमिका और सामाजिक चेतना का गहरा विषय बन जाता है।
हाल ही में महाराष्ट्र में बाघों की लगातार मौतों के मामले सामने आए हैं — इतनी कम अवधि में बाघों की मौतें और उनका लगातार होना — यह एक चिंताजनक संकेत है कि कहीं न कहीं संरक्षित वन्यजीवों की सुरक्षा व्यवस्था ढह रही है।
1. महाराष्ट्र में बाघों की मौतों का विस्तृत परिदृश्य
जनवरी 2026 के कुछ ही दिनों में चार बाघों की मौत की पुष्टि राष्ट्रीय और स्थानीय मीडिया के जरिए सामने आई। इससे पहले, 2025 में महज 22 दिनों के भीतर 11 बाघों की मौतें दर्ज की गई थीं। इससे पहले पिछले कुछ वर्षों में भी राज्य में बाघों की मौत का आंकड़ा चिंताजनक रूप से बढ़ता जा रहा है।
अगर हम विस्तृत आंकड़ों की तरफ देखें, तो पता चलता है कि केवल पिछले चार-पाँच वर्षों में महाराष्ट्र में सैकड़ों बाघों की मौतें हुई हैं — कोई दुर्घटना में, कोई विद्युत करंट, कुछ प्राकृतिक कारणों से और कुछ मानव-वन्यजीव संघर्ष या अवैध गतिविधियों के कारण।
ऐसे आंकड़े केवल संख्याएँ नहीं हैं; यह इस बात का संकेत हैं कि वन्यजीव संरक्षण की नीतियाँ, उनके क्रियान्वयन और जमीन स्तर पर सुरक्षा व्यवस्था क्या सही रूप से काम कर पा रही है या नहीं — यह सवाल अब अनदेखा नहीं किया जा सकता।
2. क्यों बढ़ रही हैं मौतें? कारणों का विस्तृत विश्लेषण
बाघों की मृत्यु के मामले अलग-अलग रूपों में सामने आते हैं, लेकिन कुछ प्रमुख कारण बार-बार उभरकर आते हैं।
2.1 अवैध विद्युत तार और करंट के कारण मौतें
इसके कारण वन क्षेत्रों के आस-पास अक्सर कृषि भूमि या बस्तियों में अवैध ढंग से लगाये गए बिजली के तार रह जाते हैं। जब बाघ इन विद्युत तारों से संपर्क में आता है, तो करंट लगने के कारण उसकी मौत हो जाती है। यह न केवल बाघ का जीवन लेता है, बल्कि जंगल में अन्य वन्यजीवों को भी गंभीर जोखिम में डाल देता है।
कई रिपोर्टों में यह पूछा गया है — क्या वन विभाग और विद्युत विभाग के बीच समन्वय नहीं है? क्या अवैध विद्युत संयोजन को प्रभावी ढंग से हटाया नहीं जा सकता? आखिर क्यों राज्य स्तर पर इस जोखिम को अनदेखा किया जा रहा है?
2.2 सड़क दुर्घटनाओं से मौत
महाराष्ट्र में कई जंगल क्षेत्रों के बीच तेज़ रफ्तार राजमार्ग गुजरते हैं। जहां राजमार्ग पार करते हुए बाघों का प्रवास होता है, वहां बाघें अचानक सड़क पर निकल आते हैं और तेज़गति से गुजरते वाहन उनके लिए जानलेवा साबित होते हैं।
यह समस्या केवल ट्रैफिक का नहीं है, बल्कि यह बताती है कि पर्यावरण-अनुकूल ढंग से राजमार्ग योजना नहीं बनाई जा रही। सड़क निर्माण और वन्यजीव मार्ग (Wildlife Corridor) के बीच संतुलन बनाने में विफलता का परिणाम बाघों की मौत के रूप में सामने आया है।
2.3 शिकार और मानव-वन्यजीव संघर्ष
कुछ मामलों में, बाघों की मृत्यु मानव-वन्यजीव संघर्ष से भी हुई है — लोगों के खेती-बाड़ी, घर और पशु-पालन के इलाकों के निकट बाघ का आना उसे लोगों के डर और प्रतिक्रिया का शिकार बना देता है। जब स्थानीय लोगों को लगता है कि बाघ उनके पशु, घर या खुद की सुरक्षा के लिए खतरा है, तो कभी-कभी वे अवैध रूप से कार्रवाई कर बैठते हैं।
2.4 अन्य कारण: बीमारी, उम्र या प्राकृतिक कारण
कुछ बाघों की मौतें प्राकृतिक हैं — जैसे बीमारी, पुरानी उम्र, जीवन चक्र का समाप्त होना आदि। यह वन्यजीव संसार का एक अंग है, लेकिन इन मौतों की संख्या अपेक्षित सीमा से कहीं अधिक है।
3. ज्ञानगंगा अभयारण्य का मामला: सुरक्षा की गंभीर दोष
बुलढाणा जिले के ज्ञानगंगा अभयारण्य से जुड़ी रिपोर्ट बेहद चिंताजनक है। चार साल पहले यहाँ का एक बाघ T1C1 रहस्यमयी रूप से लापता हो गया। वन विभाग ने उत्तराधिकारी के रूप में PKT7CP1 नामक पेंच टाइगर प्रोजेक्ट से 36 माह के बाघ को 3 जनवरी को यहाँ लाया।
सुरक्षा के तौर पर उस बाघ को सीमित क्षेत्र में रखा गया, ताकि वह नई जगह के माहौल में ढल सके। लेकिन उसने शुरुआती जाल को तोड़कर अभयारण्य से बाहर निकल दिया।
यह केवल एक झलक नहीं है — यह सुरक्षा-व्यवस्था की नाकामी, प्रबंधन की कमी, वन्यजीव प्रबंधन की कमजोर रणनीति और उन प्रक्रियाओं की विफलता का प्रतीक है जिनके तहत संरक्षित प्रजाति को सुरक्षित रखना होता है।
तो प्रश्न उठता है — क्या यह पर्याप्त रूप से समन्वित एवं विशेषज्ञों की सलाह से किया गया कदम था? या यह एक आकस्मिक और अपर्याप्त योजना थी जो पहले ही असफल हो चुकी थी?
4. सड़क पर बाघ का ‘रॉयल वॉक’: रोमांचक दृश्य और भयावह सच
भंडारा जिले के अड्याल वनपरिक्षेत्र में एक बाघ ने सुबह करीब 6 बजे सड़क पर घूमते हुए वाहन चालक का रास्ता रोक दिया। वाहन चालक को करीब 15-20 मिनट तक बाघ का इंतजार करना पड़ा, जिसे सड़क पर बिना किसी डर के टहलते हुए देखा गया।
यह दृश्य जितना रोमांचक लगता है, उतना ही यह भयावह भी है — क्योंकि यह स्पष्ट करता है कि मानव और वन्यजीव के बीच की सीमाएं धीरे-धीरे धुंधली होती जा रही हैं। जंगलों के कटते विस्तार, मानव बस्तियों की फैलती सीमाएं, और वन्यजीवों के प्राकृतिक मार्गों में व्यवधान — इन कारणों से बाघ अब उन मार्गों पर निकल रहे हैं, जहां इंसानी गतिविधियां अधिक हैं।
5. न्यायपालिका का संज्ञान — PIL का महत्व
जब वन्यजीवों की मौतें लगातार बढ़ने लगीं, तब मुंबई उच्च न्यायालय की नागपुर खंडपीठ ने इस विषय को गंभीरता से लिया। न्यायालय ने स्वयं संज्ञान लेकर PIL दायर करने के निर्देश दिए हैं।
यह कदम सिर्फ एक कानूनी प्रक्रिया नहीं है — न्यायपालिका का यह रुख स्पष्ट संकेत देता है कि बाघों की लगातार मौतें केवल वन्यजीव विभाग या स्थानीय प्रशासन का मामला नहीं हैं, बल्कि राज्य की जवाबदेही, नीति-निर्माण, उसकी कार्यप्रणाली और संरक्षित प्रजातियों के प्रति उसकी संवेदनशीलता से जुड़ा है।
न्यायालय ने संबंधित विभागों से पूछा है:
- इतनी कम समय अवधि में बाघों की मौत क्यों हो रही है?
- मृत होने वाले बाघों के कारणों का विस्तृत विश्लेषण क्या है?
- वर्तमान सुरक्षा रणनीति क्या है और भविष्य में क्या ठोस कदम उठाए जा रहे हैं?
यह पूछताछ केवल कागजी प्रक्रिया नहीं है — यह एक जवाबदेही तंत्र की मांग है, जहाँ सरकार और विभाग अपने कार्यों के प्रति स्पष्ट रूप से जनता और न्यायपालिका के सामने उत्तर दें।
6. प्रशासन की भूमिका और दायित्व
वन विभाग को अपने दायित्वों पर गंभीरता से विचार करना होगा:
6.1 वन्यजीव मार्गों की पहचान और संरक्षण
बाघों के पारगमन वाले मार्गों (Wildlife Corridors) को चिन्हित किया जाना चाहिए और उन्हें मानव-निर्मित अवरोधों से मुक्त रखा जाना चाहिए।
6.2 राजमार्गों पर सुरक्षा प्रबंध
जहाँ सड़कें वन्यजीव मार्गों को काटती हैं, वहाँ उच्च-स्तरीय संकेत, गति नियंत्रण, वन्यजीव क्रॉसिंग और रात में प्रकाश संकेत जैसी सुविधाएं लगनी चाहिए।
6.3 अवैध विद्युत तारों का प्रभावी नियंत्रण
अवैध विद्युत संयोजनों को हटाना, वन क्षेत्र के आसपास बिजली के तारों को नियंत्रित करना और विभागीय निगरानी को तेज करना अनिवार्य है।
6.4 स्थानीय समुदाय के साथ तालमेल और भागीदारी
स्थानीय लोगों को वन्यजीव संरक्षण का भागीदार बनाना चाहिए — उन्हें जागरूक किया जाना चाहिए, शिक्षा दी जानी चाहिए और उन्हें संरक्षण योजनाओं का हिस्सा बनाया जाना चाहिए। इससे वन्यजीव-मानव संघर्ष में कमी आ सकती है।
7. सामाजिक जागरूकता की आवश्यकता
बाघों की सुरक्षा केवल सरकार या वन विभाग की भूमिका नहीं है। समाज के हर वर्ग — स्कूल, कॉलेज, वन प्रेमी समूह, ग्राम पंचायत, ट्रैफिक विभाग, युवा संगठन — सभी को बाघ संरक्षण के प्रति जागरूक होना चाहिए।
बाघ की सुरक्षा केवल जंगल की रक्षा नहीं है; यह हमारी पर्यावरणीय बुद्धिमत्ता, सतत विकास और सामाजिक संवेदनशीलता का उदाहरण है।
8. निष्कर्ष: भविष्य के लिए एक समग्र दृष्टिकोण
महाराष्ट्र में बाघों की लगातार मौतों का सिलसिला यह संकेत देता है कि वन्यजीव सुरक्षा अभी भी असुरक्षित है। न्यायपालिका ने इस विषय को गंभीरता से लिया है, प्रशासन को जवाब देने का निर्देश दिया है, और यह स्पष्ट कर दिया है कि बाघ की सुरक्षा सिर्फ वन विभाग का कार्य नहीं है, बल्कि राज्य और समाज का साझा दायित्व है।
समय की मांग है कि केवल आंकड़ों या रिपोर्टों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि:
- नीति-निर्माण में सुधार होना चाहिए
- जमीन स्तर पर सुरक्षा के ठोस कदम उठाए जाने चाहिए
- स्थानीय समुदायों को संरक्षण के भागीदार बनाया जाना चाहिए
- संरक्षित क्षेत्रों के प्रबंधन में विशेषज्ञ दृष्टिकोण लागू होना चाहिए
बाघ सिर्फ एक जानवर नहीं है — वह हमारी पारिस्थितिकी का प्रतीक, हमारी प्राकृतिक धरोहर और आने वाली पीढ़ियों के लिए हमारी जिम्मेदारी है।
यदि हम आज उसे बचाने में असफल रहे, तो भविष्य में उसकी अनुपस्थिति के गंभीर प्रभाव हमारे जंगलों, हमारी संस्कृति और हमारे पर्यावरण पर निरंतर दिखाई देंगे।