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भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 6: ‘सद्भावपूर्वक’ (Good Faith) की अवधारणा का गहन एवं व्यावहारिक विश्लेषण

भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 6: ‘सद्भावपूर्वक’ (Good Faith) की अवधारणा का गहन एवं व्यावहारिक विश्लेषण

प्रस्तावना

किसी भी दंड विधान की आत्मा उसके शब्दों में नहीं, बल्कि उसकी व्याख्या और अनुप्रयोग में निहित होती है। अपराध को परिभाषित करते समय केवल बाह्य कृत्य (Actus Reus) ही नहीं, बल्कि उस कृत्य के पीछे निहित मानसिक अवस्था (Mens Rea) को भी समान महत्व दिया जाता है। इसी सिद्धांत को ध्यान में रखते हुए भारतीय न्याय संहिता (Bharatiya Nyaya Sanhita – BNS) में ‘सद्भावपूर्वक’ (Good Faith) की अवधारणा को धारा 6 के अंतर्गत स्थान दिया गया है।

यह धारा केवल एक परिभाषात्मक उपबंध नहीं है, बल्कि यह उन सभी सामान्य अपवादों की आधारशिला है जिनके माध्यम से कानून यह सुनिश्चित करता है कि निर्दोष व्यक्ति, जिसने बिना दुर्भावना और बिना लापरवाही के कार्य किया है, उसे दंडित न किया जाए। व्यवहार में यह धारा पुलिस अधिकारियों, लोक सेवकों, चिकित्सकों, न्यायिक अधिकारियों, पत्रकारों और सामान्य नागरिकों – सभी के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।


धारा 6 की वैधानिक परिभाषा

भारतीय न्याय संहिता की धारा 6 के अनुसार—

“कोई बात ‘सद्भावपूर्वक’ की गई या मानी गई नहीं कही जाएगी, जो उचित सतर्कता और ध्यान (Due Care and Attention) के बिना की गई या मानी गई हो।”

यह परिभाषा अपने आप में अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह नकारात्मक शैली (Negative Definition) में दी गई है। अर्थात् कानून यह नहीं बताता कि सद्भाव क्या है, बल्कि यह स्पष्ट करता है कि किन परिस्थितियों में किसी कार्य को सद्भावपूर्वक नहीं माना जाएगा।

इसका सीधा तात्पर्य यह है कि केवल अच्छे इरादे होना पर्याप्त नहीं है; बल्कि उस इरादे के साथ उचित सतर्कता और जिम्मेदारी का होना भी अनिवार्य है।


धारा 6 के आवश्यक तत्व (Essential Ingredients)

किसी भी कार्य को धारा 6 के अंतर्गत सद्भावपूर्वक सिद्ध करने के लिए निम्नलिखित दो तत्वों का होना आवश्यक है—

1. उचित सतर्कता (Due Care)

उचित सतर्कता का अर्थ है वह सावधानी जो एक सामान्य समझ-बूझ वाला व्यक्ति (Reasonable or Prudent Man) समान परिस्थितियों में बरतता। यह एक वस्तुनिष्ठ (Objective) मानक है, जो व्यक्ति की सामाजिक स्थिति, पेशे और परिस्थितियों के अनुसार बदल सकता है।

उदाहरण के लिए—

  • एक प्रशिक्षित डॉक्टर से अपेक्षित सतर्कता का स्तर सामान्य व्यक्ति से कहीं अधिक होगा।
  • एक पुलिस अधिकारी से कानून की प्रक्रिया का ज्ञान और पालन अपेक्षित होगा।
  • एक बिल्डर या व्यापारी से उपभोक्ता सुरक्षा मानकों का पालन अपेक्षित होगा।

यदि कोई व्यक्ति उस स्तर की सावधानी नहीं बरतता जो उससे अपेक्षित थी, तो उसका कार्य सद्भावपूर्वक नहीं माना जाएगा।


2. उचित ध्यान (Due Attention)

उचित ध्यान का अर्थ है मानसिक एकाग्रता, विवेकपूर्ण निर्णय और जल्दबाजी या लापरवाही का अभाव। इसका संबंध व्यक्ति की मनःस्थिति से है—क्या उसने सोच-समझकर कार्य किया, या आवेग में आकर?

यदि कोई व्यक्ति बिना आवश्यक तथ्यों की जांच किए, बिना परिणामों पर विचार किए कोई कार्य करता है, तो वह ‘उचित ध्यान’ की कसौटी पर खरा नहीं उतरता।


सामान्य अर्थ में सद्भाव और कानूनी सद्भाव में अंतर

सामान्य बोलचाल में ‘सद्भाव’ का अर्थ अच्छे इरादे या नेक नीयत से लगाया जाता है। लेकिन कानूनी दृष्टि से यह अवधारणा कहीं अधिक कठोर है।

  • नैतिक सद्भाव:
    “मेरे इरादे सही थे।”
  • कानूनी सद्भाव (धारा 6 के अंतर्गत):
    “मेरे इरादे सही थे और मैंने सभी आवश्यक सावधानियाँ भी बरतीं।”

यदि कोई व्यक्ति किसी की मदद करने के उद्देश्य से ऐसा कार्य करता है जो कानूनन या व्यावहारिक रूप से असुरक्षित है, तो उसके अच्छे इरादे उसे संरक्षण प्रदान नहीं करेंगे।


धारा 6 का संहिता में महत्व और अनुप्रयोग

धारा 6 का प्रभाव संहिता के अनेक प्रावधानों पर पड़ता है, विशेष रूप से सामान्य अपवादों (General Exceptions) के अध्याय में।

1. लोक सेवकों को संरक्षण

लोक सेवक यदि अपने आधिकारिक कर्तव्यों का निर्वहन करते हुए सद्भावपूर्वक कोई कार्य करते हैं, जिससे किसी व्यक्ति को क्षति पहुँचती है, तो उन्हें आपराधिक उत्तरदायित्व से संरक्षण मिल सकता है।

किन्तु यह संरक्षण तभी मिलेगा जब यह सिद्ध हो कि—

  • कार्य विधिक अधिकार के भीतर था
  • उचित सतर्कता और ध्यान बरता गया था

मनमानी, अत्यधिक बल प्रयोग या प्रक्रिया की अवहेलना को सद्भाव नहीं माना जाएगा।


2. निजी रक्षा के अधिकार में सद्भाव

निजी रक्षा के मामलों में न्यायालय यह जांच करता है कि क्या अभियुक्त ने आत्मरक्षा में ही बल का प्रयोग किया या बदले की भावना से। यदि बल का प्रयोग आवश्यक सीमा से अधिक है, तो सद्भाव का दावा कमजोर हो जाता है।


3. न्यायिक और अर्ध-न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा

न्यायाधीशों द्वारा दिए गए निर्णय, भले ही बाद में गलत सिद्ध हों, सामान्यतः सद्भावपूर्वक माने जाते हैं क्योंकि यह माना जाता है कि उन्होंने कानून और विवेक के आधार पर कार्य किया। यही कारण है कि न्यायिक निर्णयों के लिए व्यक्तिगत आपराधिक दायित्व नहीं ठहराया जाता।


ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

धारा 6 वस्तुतः भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 52 का ही आधुनिक रूप है। IPC के तहत भी ‘Good Faith’ की वही परिभाषा थी, जिसमें ‘उचित सतर्कता और ध्यान’ पर जोर दिया गया था।

भारतीय न्याय संहिता में इसे बनाए रखने का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि दंड कानून का चरित्र दमनकारी न होकर न्यायसंगत बना रहे।


धारा 6 और लापरवाही (Negligence) का संबंध

धारा 6 और लापरवाही एक-दूसरे के विपरीत ध्रुव हैं।
जहाँ लापरवाही सिद्ध होती है, वहाँ सद्भाव स्वतः समाप्त हो जाता है।

उदाहरणार्थ—

  • यदि किसी पर लापरवाही से मृत्यु कारित करने का आरोप है, तो वह यह तर्क नहीं दे सकता कि उसने सद्भावपूर्वक कार्य किया, क्योंकि सद्भाव की मूल शर्त ही लापरवाही का अभाव है।

व्यावहारिक उदाहरण

1. चिकित्सकीय क्षेत्र

यदि एक डॉक्टर सभी मानक चिकित्सा प्रक्रियाओं का पालन करते हुए उपचार करता है और फिर भी रोगी की मृत्यु हो जाती है, तो डॉक्टर का कार्य सद्भावपूर्वक माना जाएगा।

2. पत्रकारिता

यदि कोई पत्रकार तथ्यात्मक जांच के बाद सार्वजनिक हित में रिपोर्ट प्रकाशित करता है और उसमें अनजाने में त्रुटि रह जाती है, तो उसे सद्भाव का संरक्षण मिल सकता है।

3. पुलिस कार्रवाई

यदि पुलिस अधिकारी उचित जांच के बाद किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करता है, जो बाद में निर्दोष निकलता है, तो भी अधिकारी का कार्य सद्भावपूर्वक माना जा सकता है।


आलोचनात्मक दृष्टिकोण

धारा 6 की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि ‘उचित सतर्कता’ का कोई निश्चित पैमाना नहीं है। यह न्यायालय के विवेक पर निर्भर करता है, जिससे कभी-कभी निर्णयों में भिन्नता देखी जाती है।

इसके अतिरिक्त, सद्भाव का दावा करने वाले अभियुक्त पर ही यह भार होता है कि वह अपनी सतर्कता सिद्ध करे, जो व्यवहार में आसान नहीं होता।


निष्कर्ष

भारतीय न्याय संहिता की धारा 6 न्याय और जिम्मेदारी के बीच संतुलन स्थापित करती है। यह स्पष्ट संदेश देती है कि केवल अच्छे इरादे पर्याप्त नहीं हैं—कानून अपेक्षा करता है कि व्यक्ति अपने कार्यों में सावधान, सतर्क और जिम्मेदार हो।

यह धारा निर्दोषों के लिए ढाल और लापरवाहों के लिए चेतावनी है। BNS के नए युग में, धारा 6 न्यायपालिका को वह नैतिक और विधिक आधार प्रदान करती है जिसके माध्यम से वह वास्तविक दोषियों और त्रुटिवश कार्य करने वालों के बीच अंतर कर सके।