“पैसा नहीं, प्यार और सुरक्षा है बच्चे का अधिकार” छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला और कस्टडी कानून की नई दिशा
प्रस्तावना: जब अदालत ने दिल की भाषा समझी
भारतीय समाज में यह धारणा गहराई से जमी हुई है कि जो आर्थिक रूप से सक्षम है, वही बच्चे का बेहतर भविष्य सुनिश्चित कर सकता है। लेकिन छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने हाल ही में इस सोच को चुनौती देते हुए यह स्पष्ट कर दिया कि बच्चे का भविष्य केवल पैसों से नहीं, बल्कि प्यार, सुरक्षा और भावनात्मक स्थिरता से बनता है।
यह फैसला केवल एक परिवारिक विवाद का समाधान नहीं है, बल्कि यह पूरे देश के लिए एक कानूनी और सामाजिक संदेश है कि कस्टडी के मामलों में ‘दिल’ का मूल्य ‘धन’ से कहीं अधिक है।
1. मामले की पृष्ठभूमि: विवाद की जड़
यह मामला छत्तीसगढ़ के बेमेतरा जिले के कोड़वा गांव निवासी लक्ष्मीकांत से जुड़ा है। वर्ष 2013 में विवाह के बाद दंपत्ति के दो पुत्र हुए। शुरुआती वर्षों के बाद पति-पत्नी के संबंधों में तनाव उत्पन्न हुआ और अंततः दोनों अलग रहने लगे।
बच्चे माँ के साथ रहने लगे। कुछ वर्षों बाद लक्ष्मीकांत ने फैमिली कोर्ट में याचिका दायर कर अपने बड़े बेटे (लगभग 7 वर्ष) की कस्टडी मांगी।
पिता का तर्क
लक्ष्मीकांत ने अदालत में मुख्य रूप से यह दलील दी कि:
- उसकी आय पत्नी से अधिक है
- उसके पास स्थायी रोजगार और संपत्ति है
- वह बच्चे को बेहतर शिक्षा, सुविधा और जीवन दे सकता है
उसका दावा था कि आर्थिक संसाधन ही बच्चे के बेहतर भविष्य की कुंजी हैं।
फैमिली कोर्ट का निर्णय
फैमिली कोर्ट ने पिता की याचिका खारिज कर दी और बच्चे की कस्टडी माँ के पास ही रहने दी। इस निर्णय के खिलाफ लक्ष्मीकांत ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में अपील की।
2. हाईकोर्ट की सुनवाई और संवेदनशील दृष्टिकोण
इस मामले की सुनवाई जस्टिस रजनी दुबे और जस्टिस संजय कुमार जायसवाल की खंडपीठ ने की। कोर्ट ने केवल दस्तावेज़ों पर नहीं, बल्कि बच्चे के जीवन की वास्तविक परिस्थितियों पर गहन विचार किया।
कोर्ट ने पूछा:
- बच्चा किसके साथ अधिक सुरक्षित महसूस करता है?
- किसके साथ उसका भावनात्मक जुड़ाव मजबूत है?
- क्या पिता के वर्तमान पारिवारिक हालात बच्चे के लिए अनुकूल हैं?
3. सौतेली माँ और सगी माँ पर न्यायालय की टिप्पणी
कोर्ट ने एक अत्यंत संवेदनशील लेकिन यथार्थवादी टिप्पणी करते हुए कहा:
“यह मान लेना कि सौतेली माँ हमेशा वही स्नेह, ममता और सुरक्षा दे पाएगी जो सगी माँ देती है — एक कानूनी कल्पना हो सकती है, लेकिन सामाजिक वास्तविकता नहीं।”
कोर्ट ने माना कि पिता दूसरी महिला के साथ रह रहा है और ऐसे वातावरण में बच्चे को वही भावनात्मक स्थिरता मिल पाएगी, इसकी कोई गारंटी नहीं दी जा सकती।
यह टिप्पणी किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ नहीं, बल्कि बच्चों के मनोविज्ञान की वास्तविकता पर आधारित थी।
4. पैसा बनाम भावनात्मक सुरक्षा
हाईकोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा:
“बच्चे के लिए आलीशान घर, महंगे स्कूल और बड़ी गाड़ियाँ उतनी महत्वपूर्ण नहीं हैं, जितनी एक सुरक्षित गोद, स्नेहपूर्ण वातावरण और मानसिक शांति।”
कोर्ट ने यह भी कहा कि आर्थिक स्थिति केवल एक कारक हो सकती है, निर्णायक नहीं।
5. ‘बच्चे के सर्वोत्तम हित’ का सिद्धांत
इस फैसले की आत्मा Best Interest of the Child सिद्धांत में निहित है, जो भारतीय पारिवारिक कानून का मूल आधार है।
| कानूनी तत्व | न्यायालय की व्याख्या |
|---|---|
| प्राकृतिक अभिभावक | पिता हो सकता है, पर कस्टडी स्वतः नहीं मिलती |
| कल्याणकारी सिद्धांत | बच्चे का भावनात्मक, मानसिक और नैतिक विकास सर्वोपरि |
| उम्र | 7 वर्ष की आयु में माँ का सान्निध्य अत्यंत आवश्यक |
| वातावरण | स्थिर और सुरक्षित माहौल प्राथमिक |
6. पिता के आचरण का मूल्यांकन
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि कस्टडी के मामलों में माता-पिता का आचरण भी महत्वपूर्ण होता है। यदि कोई अभिभावक बच्चे को केवल “अधिकार” समझता है, न कि “जिम्मेदारी”, तो अदालत उसके पक्ष में निर्णय नहीं दे सकती।
7. सामाजिक दृष्टिकोण से फैसले का महत्व
(क) मातृत्व की गरिमा की पुनर्स्थापना
यह फैसला उन लाखों माताओं के लिए आश्वासन है, जिन्हें आर्थिक कमजोरी के आधार पर डराया जाता है कि वे बच्चे की कस्टडी खो देंगी।
(ख) सौतेले परिवारों की वास्तविकता
कोर्ट ने बिना किसी भावनात्मक नाटकीयता के सामाजिक सच्चाई को स्वीकार किया कि नए रिश्तों में पुराने बच्चों की स्थिति अक्सर असुरक्षित हो जाती है।
(ग) बच्चे की स्थिरता
कोर्ट ने यह सिद्धांत अपनाया कि बच्चे को जीवन में बार-बार स्थान बदलने का प्रयोग नहीं बनाया जा सकता।
8. भारतीय कस्टडी कानून पर प्रभाव
यह निर्णय आने वाले समय में फैमिली कोर्ट के लिए एक मार्गदर्शक सिद्धांत बनेगा:
- केवल पिता होना पर्याप्त नहीं
- केवल धन होना पर्याप्त नहीं
- केवल कानूनी अधिकार पर्याप्त नहीं
अब कस्टडी का केंद्र बच्चे की भावनात्मक भलाई होगा।
9. पितृसत्तात्मक सोच पर प्रहार
यह फैसला उस सोच पर भी चोट है कि पिता “कमाने वाला” होने के कारण स्वाभाविक रूप से श्रेष्ठ अभिभावक होता है। अदालत ने यह स्पष्ट कर दिया कि पालन-पोषण केवल कमाने से नहीं, समझने से होता है।
10. बच्चे की आवाज़ की अनसुनी नहीं
यद्यपि बच्चा स्वयं अदालत में बयान देने की स्थिति में नहीं था, फिर भी कोर्ट ने उसकी परिस्थिति को उसकी ओर से बोलने दिया। यह बाल अधिकारों की न्यायिक संवेदनशीलता का उत्कृष्ट उदाहरण है।
11. अंतरराष्ट्रीय मानकों से सामंजस्य
यह फैसला संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार संधि (UNCRC) के उस सिद्धांत से मेल खाता है, जिसमें कहा गया है:
“हर निर्णय में बच्चे का सर्वोत्तम हित सर्वोपरि होना चाहिए।”
12. भविष्य के मामलों के लिए संदेश
अब कोई भी अभिभावक केवल धन और सुविधा का हवाला देकर कस्टडी का दावा नहीं कर सकेगा। उसे यह भी साबित करना होगा कि वह:
- भावनात्मक रूप से सक्षम है
- मानसिक रूप से स्थिर है
- नैतिक रूप से जिम्मेदार है
13. कानून का मानवीय चेहरा
यह फैसला यह दर्शाता है कि भारतीय न्यायपालिका केवल कानूनी तकनीक नहीं, बल्कि मानवीय संवेदना से भी संचालित होती है।
निष्कर्ष: जब न्याय ने माँ की गोद को चुना
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का यह निर्णय केवल एक केस का फैसला नहीं है, बल्कि एक विचारधारा की स्थापना है — कि बच्चा कोई संपत्ति नहीं, कोई ट्रॉफी नहीं, कोई अधिकार-पत्र नहीं, बल्कि एक संवेदनशील जीवन है।
पिता का धन, माँ के आँचल की गर्माहट के सामने हार गया।
और अदालत ने यह सिद्ध कर दिया कि:
“जहाँ दिल सुरक्षित हो, वहीं बच्चा सुरक्षित होता है।”