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पुलिस कस्टडी बनाम न्यायिक कस्टडी भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली में हिरासत की कानूनी अवधारणा का विस्तृत विश्लेषण

पुलिस कस्टडी बनाम न्यायिक कस्टडी भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली में हिरासत की कानूनी अवधारणा का विस्तृत विश्लेषण


भूमिका (Introduction)

      भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली में किसी भी व्यक्ति की स्वतंत्रता को सबसे मूल्यवान मौलिक अधिकारों में गिना गया है। संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत “कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार” ही किसी व्यक्ति को उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता से वंचित किया जा सकता है। जब किसी व्यक्ति को किसी अपराध में गिरफ्तार किया जाता है, तो यह प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है कि उसे पुलिस कस्टडी (Police Custody) में रखा जाए या न्यायिक कस्टडी (Judicial Custody) में।

       यह निर्णय केवल औपचारिक नहीं बल्कि आरोपी के मौलिक अधिकारों, जांच की निष्पक्षता, और न्याय की अवधारणा से गहराई से जुड़ा हुआ है। इस लेख में हम पुलिस कस्टडी और न्यायिक कस्टडी की संकल्पना, उद्देश्य, कानूनी प्रावधान, समय-सीमा, अधिकारों, तथा दोनों के बीच मूलभूत अंतर का विस्तार से अध्ययन करेंगे।


कस्टडी का सामान्य अर्थ (Meaning of Custody)

      “कस्टडी” का सामान्य अर्थ है — किसी व्यक्ति को कानून के तहत नियंत्रण में रखना। जब पुलिस किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करती है, तो उसे खुला नहीं छोड़ा जा सकता; बल्कि उसे किसी न किसी प्रकार की वैधानिक हिरासत में रखा जाता है। यही हिरासत दो रूपों में होती है:

  1. पुलिस कस्टडी
  2. न्यायिक कस्टडी

पुलिस कस्टडी (Police Custody)

पुलिस कस्टडी क्या है?

       पुलिस कस्टडी वह अवस्था है जिसमें गिरफ्तार व्यक्ति पुलिस के प्रत्यक्ष नियंत्रण में रहता है। इस दौरान आरोपी को पुलिस थाने के लॉक-अप में रखा जाता है और पुलिस उससे पूछताछ कर सकती है।

सरल शब्दों में, पुलिस कस्टडी का उद्देश्य जांच (Investigation) को आगे बढ़ाना होता है।


पुलिस कस्टडी का उद्देश्य

पुलिस कस्टडी मुख्यतः निम्नलिखित उद्देश्यों के लिए दी जाती है:

  • आरोपी से पूछताछ (Interrogation) करने के लिए
  • अपराध से संबंधित सबूत जुटाने के लिए
  • हथियार, चोरी का माल, नकदी या अन्य वस्तुओं की बरामदगी के लिए
  • सह-अभियुक्तों (Co-accused) या अपराध की साजिश का पता लगाने के लिए

कानूनी आधार

पुलिस कस्टडी का प्रावधान दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) की धारा 167 में दिया गया है। इसके अनुसार:

  • गिरफ्तारी के बाद आरोपी को 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना अनिवार्य है।
  • मजिस्ट्रेट यह तय करता है कि आरोपी को पुलिस कस्टडी में भेजा जाए या न्यायिक कस्टडी में।

समय-सीमा (Time Limit)

  • पुलिस कस्टडी की अधिकतम अवधि 15 दिन होती है।
  • यह 15 दिन लगातार या टुकड़ों में भी दी जा सकती है, लेकिन पहले 15 दिनों के भीतर ही
  • 15 दिन के बाद आरोपी को पुलिस कस्टडी में नहीं रखा जा सकता, केवल न्यायिक कस्टडी संभव है।

आरोपी के अधिकार (Rights of Accused in Police Custody)

पुलिस कस्टडी में होने के बावजूद आरोपी के कुछ मूल अधिकार सुरक्षित रहते हैं:

  • मारपीट, यातना या जबरदस्ती पूर्णतः अवैध है
  • आरोपी को वकील से मिलने का अधिकार है (पूछताछ के दौरान नहीं, लेकिन उचित समय पर)
  • चिकित्सीय परीक्षण का अधिकार
  • मजिस्ट्रेट के समक्ष शिकायत करने का अधिकार

👉 सुप्रीम कोर्ट ने DK Basu बनाम पश्चिम बंगाल राज्य के मामले में स्पष्ट किया कि हिरासत में यातना मानवाधिकारों का गंभीर उल्लंघन है।


उदाहरण

यदि किसी व्यक्ति पर चोरी का आरोप है और पुलिस को संदेह है कि चोरी का सामान उसके पास या किसी अन्य स्थान पर छुपाया गया है, तो उस सामान की बरामदगी के लिए मजिस्ट्रेट पुलिस कस्टडी की अनुमति दे सकता है।


न्यायिक कस्टडी (Judicial Custody)

न्यायिक कस्टडी क्या है?

न्यायिक कस्टडी वह अवस्था है जिसमें आरोपी को पुलिस से हटाकर जेल प्रशासन के नियंत्रण में दे दिया जाता है। इस दौरान आरोपी जिला जेल या केंद्रीय जेल में रहता है।

यह कस्टडी तब दी जाती है जब पुलिस की प्रारंभिक पूछताछ पूरी हो चुकी हो या पुलिस कस्टडी की आवश्यकता न रह गई हो।


न्यायिक कस्टडी का उद्देश्य

न्यायिक कस्टडी का मुख्य उद्देश्य होता है:

  • आरोपी को सुरक्षित रूप से जेल में रखना
  • जांच या मुकदमे के दौरान आरोपी का फरार न होना
  • सबूतों से छेड़छाड़ रोकना
  • समाज और आरोपी दोनों की सुरक्षा सुनिश्चित करना

कानूनी आधार

न्यायिक कस्टडी भी धारा 167 CrPC के अंतर्गत दी जाती है। मजिस्ट्रेट यह संतुष्ट होने पर कि पुलिस कस्टडी की अब आवश्यकता नहीं है, आरोपी को न्यायिक हिरासत में भेज देता है।


समय-सीमा (Time Limit)

न्यायिक कस्टडी की अवधि अपराध की प्रकृति पर निर्भर करती है:

  • सामान्य अपराधों में — 60 दिन
  • गंभीर अपराधों (जहाँ सज़ा 10 वर्ष या उससे अधिक / आजीवन कारावास / मृत्यु दंड हो) में — 90 दिन

यदि इस अवधि में पुलिस चार्जशीट दाखिल नहीं करती, तो आरोपी को डिफ़ॉल्ट ज़मानत (Default Bail) का अधिकार प्राप्त हो जाता है।


न्यायिक कस्टडी में आरोपी के अधिकार

  • बिना अदालत की अनुमति पुलिस पूछताछ नहीं कर सकती
  • वकील से मिलने का अधिकार
  • चिकित्सा सुविधाएँ
  • जेल नियमों के अनुसार मुलाकात और पत्राचार का अधिकार

उदाहरण

जब किसी आरोपी से पुलिस पूछताछ पूरी हो जाती है और अब आगे जांच के लिए उसकी पुलिस हिरासत आवश्यक नहीं रह जाती, तब उसे न्यायिक कस्टडी में भेज दिया जाता है।


पुलिस कस्टडी और न्यायिक कस्टडी के बीच मुख्य अंतर

आधार पुलिस कस्टडी न्यायिक कस्टडी
नियंत्रण पुलिस के पास जेल प्रशासन के पास
उद्देश्य जांच और पूछताछ सुरक्षित हिरासत
स्थान पुलिस लॉक-अप जेल
पूछताछ पुलिस कर सकती है केवल अदालत की अनुमति से
अधिकतम अवधि 15 दिन 60 / 90 दिन
अधिकारों का जोखिम अधिक अपेक्षाकृत कम

मजिस्ट्रेट की भूमिका

⚖️ पुलिस कस्टडी और न्यायिक कस्टडी — दोनों ही केवल मजिस्ट्रेट के आदेश से दी जा सकती हैं।
मजिस्ट्रेट का कर्तव्य है कि वह:

  • आरोपी के अधिकारों की रक्षा करे
  • पुलिस की मांग की वैधता की जांच करे
  • अनावश्यक हिरासत से बचे

संवैधानिक और मानवाधिकार दृष्टिकोण

भारतीय संविधान और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों के अनुसार:

  • हिरासत केवल आवश्यकता के आधार पर होनी चाहिए
  • हिरासत दंड नहीं, बल्कि जांच की प्रक्रिया का हिस्सा है
  • “जेल अपवाद है, ज़मानत नियम” — यह सिद्धांत न्यायिक कस्टडी के दुरुपयोग को रोकने के लिए महत्वपूर्ण है

निष्कर्ष (Conclusion)

     पुलिस कस्टडी और न्यायिक कस्टडी भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली के दो महत्वपूर्ण स्तंभ हैं। जहां पुलिस कस्टडी जांच को गति देने का माध्यम है, वहीं न्यायिक कस्टडी आरोपी की सुरक्षा और न्यायिक नियंत्रण सुनिश्चित करती है।

     इन दोनों के बीच संतुलन बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है, ताकि न तो अपराधी कानून की पकड़ से बाहर जाए और न ही किसी निर्दोष व्यक्ति के अधिकारों का हनन हो

अतः यह कहना उचित होगा कि —
पुलिस कस्टडी = जांच के लिए
न्यायिक कस्टडी = न्यायिक संरक्षण के लिए

और दोनों ही स्थितियों में कानून का शासन (Rule of Law) सर्वोपरि रहना चाहिए।