पिता का दायित्व, माँ की दोहरी भूमिका और बच्चों का अधिकार: कार्यरत महिला के बावजूद भरण–पोषण पर दिल्ली हाईकोर्ट की संवेदनशील और यथार्थवादी दृष्टि
प्रस्तावना
भारतीय समाज में आज महिलाएँ शिक्षा, नौकरी और पेशेवर जीवन में लगातार आगे बढ़ रही हैं। लेकिन इस प्रगति के साथ एक कठोर सामाजिक सच्चाई भी जुड़ी है—कि महिला के कामकाजी होने मात्र से मातृत्व की जिम्मेदारियाँ समाप्त नहीं होतीं, बल्कि कई बार वे और अधिक जटिल हो जाती हैं।
इसी सामाजिक यथार्थ को पहचानते हुए दिल्ली हाईकोर्ट की न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट शब्दों में कहा कि—
“ऐसे मामलों में पिता का नाबालिग बच्चों के प्रति दायित्व केवल इस कारण से कम नहीं हो जाता कि माँ को अकेले दोहरी जिम्मेदारी उठाने के लिए मजबूर किया गया है।”
यह टिप्पणी केवल एक कानूनी निष्कर्ष नहीं, बल्कि भारतीय परिवार व्यवस्था, लैंगिक समानता और बाल अधिकारों की गहरी समझ को प्रतिबिंबित करती है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला उस स्थिति से जुड़ा था जहाँ:
- पति–पत्नी के बीच वैवाहिक विवाद उत्पन्न हो गया,
- पत्नी अलग रह रही थी और
- बच्चे माँ के साथ रह रहे थे।
पति की ओर से यह तर्क दिया गया कि:
- पत्नी स्वयं रोज़गार में है,
- उसकी आय है,
- इसलिए पति पर बच्चों के भरण–पोषण का भार कम किया जाना चाहिए या समाप्त किया जाना चाहिए।
निचली अदालत द्वारा दिए गए भरण–पोषण आदेश को चुनौती देते हुए मामला दिल्ली हाईकोर्ट के समक्ष आया।
दिल्ली हाईकोर्ट का मूल प्रश्न
हाईकोर्ट के समक्ष मुख्य प्रश्न यह था कि:
क्या माँ के कार्यरत या कमाने वाली होने मात्र से
पिता का अपने नाबालिग बच्चों के प्रति कानूनी और नैतिक दायित्व कम हो सकता है?
न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा ने इस प्रश्न का उत्तर स्पष्ट, सशक्त और संवेदनशील शब्दों में “नहीं” में दिया।
पिता का दायित्व: कानून और नैतिकता दोनों का प्रश्न
हाईकोर्ट ने दो टूक कहा कि:
- बच्चों का भरण–पोषण साझा दायित्व है,
- लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि पिता अपने उत्तरदायित्व से पीछे हट सकता है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि:
पिता का दायित्व बच्चों के जन्म के साथ स्वतः उत्पन्न होता है,
और यह दायित्व
- वैवाहिक विवाद,
- अलगाव,
- या माँ की आय
से समाप्त नहीं होता।
यह दायित्व:
- कानूनी भी है,
- और नैतिक भी।
कार्यरत महिला की सामाजिक वास्तविकता
न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा ने भारतीय समाज की एक अत्यंत महत्वपूर्ण सच्चाई को रेखांकित किया।
उन्होंने कहा कि अदालत इस तथ्य से भली-भांति अवगत है कि—
“महिला के रोजगार में होने का तथ्य उसे बच्चों के पालन–पोषण से जुड़ी वित्तीय, भावनात्मक, सामाजिक और अन्य जिम्मेदारियों से मुक्त नहीं करता।”
यह टिप्पणी भारतीय सामाजिक संरचना पर एक गहरी टिप्पणी है, जहाँ:
- अधिकांश मामलों में
- कार्यरत महिला को
- नौकरी,
- घर,
- बच्चों की पढ़ाई,
- स्वास्थ्य,
- भावनात्मक देखभाल
—सभी कुछ अकेले संभालना पड़ता है।
दोहरी जिम्मेदारी का बोझ
कोर्ट ने स्वीकार किया कि जब पति और पत्नी अलग रहते हैं:
- तो माँ अक्सर दोहरी भूमिका निभाने को मजबूर होती है—
- कमाने वाले की भी
- और देखभाल करने वाले की भी।
ऐसी स्थिति में:
- यदि पिता यह कहे कि “माँ कमा रही है, इसलिए मेरा दायित्व कम हो गया”,
- तो यह न केवल कानून की भावना के विरुद्ध है,
- बल्कि सामाजिक न्याय के भी विरुद्ध है।
बच्चों के अधिकार सर्वोपरि
दिल्ली हाईकोर्ट ने यह भी दोहराया कि:
- भरण–पोषण का मूल उद्देश्य
पति या पत्नी को दंडित करना नहीं,
बल्कि बच्चों के हितों की रक्षा करना है।
नाबालिग बच्चे:
- न तो माता–पिता के विवाद के लिए जिम्मेदार हैं,
- और न ही उन्हें इस विवाद का खामियाज़ा भुगतना चाहिए।
कोर्ट ने कहा कि:
बच्चों का जीवन स्तर वही होना चाहिए, जो उन्हें माता–पिता के साथ रहने पर प्राप्त होता।
आर्थिक योगदान बनाम भावनात्मक श्रम
इस निर्णय का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि अदालत ने केवल आर्थिक आय को ही योगदान का एकमात्र मापदंड नहीं माना।
माँ द्वारा दिया जाने वाला:
- समय,
- देखभाल,
- भावनात्मक समर्थन,
- सामाजिक परवरिश
—इन सभी को अदालत ने अदृश्य लेकिन अमूल्य श्रम माना।
न्यायालय ने अप्रत्यक्ष रूप से यह संदेश दिया कि:
- केवल पैसा कमाना ही जिम्मेदारी नहीं,
- बल्कि बच्चों के जीवन का समग्र विकास भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
लैंगिक समानता की दिशा में एक कदम
यह फैसला उस सोच को चुनौती देता है जिसमें:
- कार्यरत महिला से अपेक्षा की जाती है कि
- वह घर भी संभाले,
- बच्चे भी पाले,
- और आर्थिक बोझ भी अकेले उठाए।
दिल्ली हाईकोर्ट का यह निर्णय: लैंगिक समानता के संवैधानिक सिद्धांतों के अनुरूप है,
और यह स्वीकार करता है कि
महिला की नौकरी उसे “सुपरह्यूमन” नहीं बना देती।
भरण–पोषण कानून की प्रगतिशील व्याख्या
न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा का यह निर्णय:
- भरण–पोषण कानूनों की
- प्रगतिशील और मानव-केंद्रित व्याख्या प्रस्तुत करता है।
यह फैसला यह स्पष्ट करता है कि:
- कानून को समाज की वास्तविकताओं के साथ चलना होगा,
- न कि केवल औपचारिक तर्कों पर आधारित होना चाहिए।
समाज के लिए संदेश
इस निर्णय का सामाजिक संदेश अत्यंत स्पष्ट है:
पिता अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकते
माँ की नौकरी को बहाना नहीं बनाया जा सकता
बच्चों का भविष्य माता–पिता दोनों की जिम्मेदारी है
और अदालतें इस सच्चाई को अनदेखा नहीं करेंगी
निष्कर्ष
दिल्ली हाईकोर्ट का यह निर्णय केवल भरण–पोषण का आदेश नहीं, बल्कि भारतीय परिवार व्यवस्था पर एक संवेदनशील न्यायिक टिप्पणी है।
यह फैसला बताता है कि:
- महिलाओं की आर्थिक स्वतंत्रता का अर्थ
अतिरिक्त बोझ नहीं,
बल्कि साझा जिम्मेदारी होना चाहिए।
न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा की यह टिप्पणी आने वाले समय में:
- पारिवारिक विवादों,
- भरण–पोषण मामलों,
- और बाल अधिकारों से जुड़े मुकदमों में
एक महत्वपूर्ण मार्गदर्शक सिद्धांत बनेगी।
अंततः, यह निर्णय भारतीय न्यायपालिका की उस भूमिका को पुष्ट करता है जहाँ कानून केवल नियमों का संग्रह नहीं, बल्कि मानव गरिमा, समानता और न्याय का जीवंत माध्यम है।