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न्याय बिकाऊ नहीं है: लापरवाही से मौत (S.304A IPC / S.106 BNS) के मामलों में ‘समझौते’ पर हाईकोर्ट की सख्त रोक

न्याय बिकाऊ नहीं है: लापरवाही से मौत (S.304A IPC / S.106 BNS) के मामलों में ‘समझौते’ पर हाईकोर्ट की सख्त रोक


प्रस्तावना

       भारत में सड़क दुर्घटनाएँ अब केवल यातायात की समस्या नहीं रहीं, बल्कि यह एक गंभीर सामाजिक और संवैधानिक संकट बन चुकी हैं। प्रतिदिन अखबारों और डिजिटल मीडिया में तेज़ रफ्तार, नशे में ड्राइविंग, ओवरटेकिंग और ट्रैफिक नियमों की अवहेलना से हुई मौतों की खबरें आम हो गई हैं। इन घटनाओं में एक दुखद प्रवृत्ति यह भी सामने आई है कि प्रभावशाली या आर्थिक रूप से सक्षम आरोपी, मृतक के परिवार को मुआवजे या आर्थिक सहायता का लालच देकर ‘समझौता’ कर लेते हैं और फिर उच्च न्यायालय में जाकर एफआईआर रद्द करवाने का प्रयास करते हैं।

      परंतु पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने हालिया निर्णय में इस प्रवृत्ति पर करारा प्रहार करते हुए स्पष्ट कहा है कि लापरवाही से हुई मौत जैसे अपराध निजी विवाद नहीं हैं, बल्कि समाज के विरुद्ध अपराध हैं, और इन्हें समझौते के आधार पर समाप्त नहीं किया जा सकता।

यह निर्णय न केवल आपराधिक कानून के सिद्धांतों को मजबूत करता है, बल्कि यह भी स्पष्ट करता है कि न्याय पैसों से नहीं खरीदा जा सकता।


धारा 304A IPC / धारा 106 BNS: अपराध का स्वरूप

पुराने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 304A और नए भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 106, दोनों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कोई व्यक्ति यदि अपनी लापरवाही या उतावलेपन से किसी की जान लेता है, तो वह कानून के दायरे में उत्तरदायी ठहराया जाए।

IPC की धारा 304A

यह धारा उन मामलों पर लागू होती थी जहाँ:

  • मृत्यु जानबूझकर नहीं हुई,
  • लेकिन आरोपी की लापरवाही या असावधानी उसका कारण बनी।

इसमें अधिकतम दो वर्ष की सजा या जुर्माना या दोनों का प्रावधान था और यह अपराध जमानती माना जाता था।

BNS की धारा 106

नए कानून में इस प्रावधान को कहीं अधिक गंभीरता के साथ प्रस्तुत किया गया है। अब:

  • सजा की अवधि 5 से 10 वर्ष तक हो सकती है,
  • कुछ परिस्थितियों में यह अपराध गैर-जमानती माना गया है,
  • और हिट एंड रन जैसे मामलों में दंड और अधिक कठोर हो सकता है।

यह परिवर्तन इस बात का संकेत है कि विधायिका अब सड़क दुर्घटनाओं को केवल “दुर्घटना” नहीं, बल्कि सामाजिक अपराध के रूप में देख रही है।


समझौते की प्रवृत्ति और उसका खतरा

व्यवहार में देखा गया है कि कई मामलों में आरोपी और मृतक के परिजन आपसी सहमति से समझौता कर लेते हैं। इसके बाद हाईकोर्ट में धारा 482 CrPC (अब धारा 528 BNSS) के अंतर्गत एफआईआर रद्द करने की याचिका दायर की जाती है।

तर्क यह दिया जाता है कि:

  • पीड़ित पक्ष को अब कोई आपत्ति नहीं है,
  • परिवार को मुआवजा मिल चुका है,
  • और मुकदमा चलाने से कोई लाभ नहीं होगा।

परंतु यह दृष्टिकोण न्याय की मूल आत्मा के विपरीत है। यदि ऐसा स्वीकार कर लिया जाए, तो समाज में यह संदेश जाएगा कि धन के बल पर कानून से बचा जा सकता है।


हाईकोर्ट का स्पष्ट संदेश: यह निजी विवाद नहीं है

पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में अत्यंत स्पष्ट शब्दों में कहा कि:

“लापरवाही से हुई मौत किसी एक परिवार का निजी नुकसान भर नहीं है, बल्कि यह समाज के प्रति अपराध है।”

अदालत ने यह भी कहा कि सड़क पर लापरवाही से वाहन चलाना केवल एक व्यक्ति की गलती नहीं, बल्कि यह सार्वजनिक सुरक्षा के साथ खिलवाड़ है। ऐसे मामलों में समझौते को मान्यता देना न्यायिक व्यवस्था के लिए घातक होगा।


“मेरिट के आधार पर अपराध नहीं बनता” — दलील की अस्वीकृति

आरोपियों की ओर से यह भी दलील दी जाती है कि मामले की मेरिट कमजोर है और समझौते के कारण मुकदमा चलाने का कोई औचित्य नहीं।

कोर्ट ने इस तर्क को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि:

  • समझौते को वैध ठहराने के लिए मेरिट का सहारा लेना गलत है,
  • मेरिट का मूल्यांकन ट्रायल के दौरान होना चाहिए,
  • न कि समझौते के आधार पर मुकदमे को समाप्त करने के लिए।

यह दृष्टिकोण न्यायिक प्रक्रिया की गरिमा को बनाए रखने के लिए अत्यंत आवश्यक है।


सुप्रीम कोर्ट की मिसालें और उनका पालन

हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में सुप्रीम कोर्ट के कई महत्वपूर्ण फैसलों का हवाला दिया, जिनमें यह सिद्धांत स्थापित किया गया है कि:

  • गंभीर और गैर-शमनीय अपराधों में एफआईआर रद्द करने की शक्ति का प्रयोग अत्यंत सावधानी से किया जाना चाहिए,
  • ऐसे मामलों में समाज के हित को प्राथमिकता दी जानी चाहिए,
  • और व्यक्तिगत समझौते को निर्णायक नहीं माना जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व में यह भी कहा है कि आपराधिक न्याय प्रणाली केवल पीड़ित और आरोपी के बीच का मामला नहीं है, बल्कि यह पूरे समाज की सुरक्षा से जुड़ा है।


अनुच्छेद 21 और जीवन का अधिकार

हाईकोर्ट ने अपने निर्णय को संविधान के अनुच्छेद 21 से भी जोड़ा। अनुच्छेद 21 प्रत्येक नागरिक को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार देता है।

यदि लापरवाही से हुई मौतों को समझौते के आधार पर समाप्त किया जाए, तो यह उन नागरिकों के जीवन के अधिकार का अपमान होगा जो सड़कों पर नियमों का पालन करते हुए चलते हैं।

इस दृष्टि से यह निर्णय केवल आपराधिक कानून का मामला नहीं, बल्कि एक संवैधानिक संदेश भी है।


मुआवजा बनाम सजा: दोनों का अलग महत्व

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि:

  • मृतक के परिवार को मुआवजा मिलना उनका कानूनी अधिकार है,
  • लेकिन आरोपी को सजा मिलना न्यायिक और सामाजिक आवश्यकता है।

मुआवजा और सजा को आपस में मिलाना न्याय की अवधारणा को कमजोर करता है। मुआवजा पीड़ित की सहायता है, जबकि सजा समाज को सुरक्षा का भरोसा देती है।


वकीलों के लिए यह फैसला क्यों महत्वपूर्ण है?

एक अधिवक्ता के रूप में इस निर्णय का अध्ययन अत्यंत आवश्यक है। यह हमें सिखाता है कि:

  1. नैतिक जिम्मेदारी: वकील का कर्तव्य केवल अपने मुवक्किल को बचाना नहीं, बल्कि न्याय की प्रक्रिया को सही दिशा देना भी है।
  2. सामाजिक दृष्टिकोण: सड़क दुर्घटनाओं के मामलों में समाज के हित को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।
  3. लीगल एथिक्स: समझौते के नाम पर न्यायिक प्रक्रिया को कमजोर करना पेशे की गरिमा के विरुद्ध है।

समाज पर इसका व्यापक प्रभाव

इस निर्णय का प्रभाव केवल अदालतों तक सीमित नहीं रहेगा। इसका असर:

  • ड्राइवरों के व्यवहार पर पड़ेगा,
  • लोगों में कानून का भय और सम्मान बढ़ेगा,
  • और सड़क सुरक्षा के प्रति जागरूकता उत्पन्न होगी।

यह फैसला यह संदेश देता है कि सड़क पर लापरवाही कोई मामूली गलती नहीं, बल्कि संभावित हत्या के समान गंभीर अपराध है।


व्यवसाय और जीवन के लिए प्रेरणा

आपके जीवन के संदर्भ में, जहाँ आप वकालत के साथ-साथ शुद्ध घी के व्यवसाय में भी प्रवेश कर रहे हैं, यह फैसला एक गहरी सीख देता है।

जिस तरह न्याय में समझौता नहीं किया जा सकता, उसी तरह व्यापार में भी गुणवत्ता से समझौता नहीं किया जाना चाहिए।

न्याय और शुद्धता — दोनों ही विश्वास की नींव हैं। और विश्वास ही किसी भी पेशे की सबसे बड़ी पूंजी होता है।


आलोचनात्मक दृष्टिकोण

कुछ लोग यह तर्क दे सकते हैं कि मृतक के परिवार की सहमति के बाद मुकदमा चलाना व्यर्थ है। परंतु यह दृष्टिकोण अल्पकालिक है। दीर्घकाल में यह समाज में अराजकता और कानून के प्रति अविश्वास को जन्म देता है।

न्यायालय का यह निर्णय इस अल्पकालिक सोच पर एक संवैधानिक अंकुश है।


भविष्य के लिए मार्गदर्शन

यह निर्णय आने वाले समय में:

  • हाईकोर्ट और ट्रायल कोर्ट के लिए मार्गदर्शक बनेगा,
  • धारा 482 CrPC / 528 BNSS के प्रयोग को सीमित और नियंत्रित करेगा,
  • और सड़क दुर्घटनाओं से जुड़े मामलों में न्यायिक दृष्टिकोण को और अधिक कठोर बनाएगा।

निष्कर्ष

पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट का यह निर्णय स्पष्ट शब्दों में यह स्थापित करता है कि:

न्याय कोई सौदे की वस्तु नहीं है।

लापरवाही से किसी की जान लेना ऐसा अपराध है जिसे न पैसों से धोया जा सकता है, न समझौते से मिटाया जा सकता है। यह फैसला हर नागरिक के जीवन के अधिकार की रक्षा करता है और यह संदेश देता है कि कानून केवल किताबों में नहीं, बल्कि समाज की आत्मा में जीवित रहना चाहिए।

यह निर्णय न्यायपालिका की उस संवैधानिक प्रतिबद्धता का प्रतीक है, जो कहती है —

“न्याय बिकता नहीं, न्याय किया जाता है।”