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“न्याय की नयी दिशा: POCSO अधिनियम में ‘रोमियो-जूलियट’ क्लॉज की संभावित भूमिका — किशोरों के सहमति-आधारित संबंधों को अपराध से बचाने की सुप्रीम कोर्ट की पुकार”

“न्याय की नयी दिशा: POCSO अधिनियम में ‘रोमियो-जूलियट’ क्लॉज की संभावित भूमिका — किशोरों के सहमति-आधारित संबंधों को अपराध से बचाने की सुप्रीम कोर्ट की पुकार”


परिचय

        भारत के सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) ने हाल ही में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और विवादास्पद सामाजिक-कानूनी मुद्दे पर अपना रुख स्पष्ट किया है — पीड़ित और आरोपियों के बीच वास्तविक सहमति-आधारित प्रेम संबंधों को यौन अपराधों के कानून के कठोर दायरे से बाहर रखने के लिए POCSO Act (Protection of Children from Sexual Offences Act, 2012) में “Romeo-Juliet clause” जोड़ने की सिफारिश। शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार से आग्रह किया है कि वह इस तरह के संभावित सुधार पर गंभीरता से विचार करे ताकि कानून का दुरुपयोग रोका जा सके और व्यवहारिक न्याय सुनिश्चित हो सके।

      यह लेख विस्तार से उस निर्णय की पृष्ठभूमि, इसका सामाजिक-कानूनी तात्पर्य, संभावित लाभ और आलोचनात्मक पक्ष पर चर्चा करता है, तथा भविष्य में किस प्रकार के संशोधनों की जरूरत हो सकती है।


1. POCSO अधिनियम की मूल भूमिका — बच्चों की सुरक्षा

       POCSO Act मूलतः बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों से सुरक्षा के लिए बनाया गया था। इसका उद्देश्य बच्चों को यौन शोषण, बलात्कार और अन्य गंभीर अपराधों से बचाना है और इसे एक कठोर कानून माना जाता है जिसमें सख्त दंड प्रावधान शामिल हैं। 2012 में लागू यह कानून बच्चों की रक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देता है, और इसके तहत “सहमति” की धारणा 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के मामले में अप्रासंगिक मानी जाती है। चाहे किसी बच्चे ने स्वयं किसी संबंध में सहमति दी हो या न दी हो — कानून के हिसाब से यह अपराध माना जाता है।

        इस कठोर रुख का मुख्य आधार यही रहा है कि 18 वर्ष से कम उम्र में किसी व्यक्ति की यौन ओर भावनात्मक परिपक्वता व स्वतंत्र निर्णय क्षमता वयस्क की तरह नहीं मानी जा सकती। इसलिए, वर्तमान कानून में 18 वर्ष से कम उम्र वाले व्यक्ति के साथ किसी भी यौन क्रिया को अपराध माना जाता है।


2. अदालत ने क्या देखा — दुरुपयोग और असंभावित परिणाम

        हाल के फैसले में सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि कुछ स्थिति-विशेष मामलों में POCSO अधिनियम का दुरुपयोग हो रहा है, खासकर उन मामलों में जहाँ वास्तविक रूप से दोनों पक्षों के बीच आपसी सहमति आधारित विवाहोत्तर या प्रेम संबंध होते हैं और उनमें अत्यधिक सामाजिक, पारिवारिक या व्यक्तिगत नाराजगी की वजह से कानून का इस्तेमाल किया जाता है। सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि ऐसे अपराधों में भी कठोर दंडात्मक प्रावधानों का स्वतः प्रयोग करना न्याय का उल्लंघन हो सकता है।

        कोर्ट ने यह नोट किया कि अक्सर ऐसे मामलों में न तो कोई शोषण हुआ होता है, न ही किसी प्रकार की जबरदस्ती, बल या धोखाधड़ी पाई जाती है। ऐसे हालात में कानून का दुरुपयोग करके किशोरों को गंभीर आपराधिक आरोपों के दायरे में लाना, न केवल उनके भविष्य को खतरनाक रूप से प्रभावित करता है बल्कि समुदाय में अविश्वास और सामाजिक कलंक भी उत्पन्न करता है।

      सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि “युवा संबंध” और “यौन अपराध” को एक जैसी धाराओं में नहीं बांधा जा सकता, और इसी विचार के तहत ‘Romeo-Juliet clause’ की सिफारिश की है।


3. ‘Romeo-Juliet clause’ क्या है?

       “Romeo-Juliet clause” एक कानूनी अवधारणा है जिसका इस्तेमाल कई देशों के कानूनों में किया जाता है। इसका उद्देश्य यही है कि अगर दो व्यक्ति किसी हद तक समान आयु के हों और आपसी सहमति से रिश्ते में हों, तो उनके बीच के संबंध को कंटेक्चुअली एक आपराधिक कृत्य नहीं माना जाए — क्योंकि वहाँ शोषण या जबरदस्ती नहीं होती। दूसरे शब्दों में, इस प्रावधान का लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि कानून का कठोर दंडात्मक ढांचा उन रिश्तों पर लागू न हो जो वास्तविक रूप से दो किशोरों द्वारा अपने भावनात्मक निर्णय के आधार पर हैं।

          यह आम-भाषा में कहना है कि अगर दोनों पक्षों की उम्र के बीच अधिकतमतः थोड़ी से कम अंतर हो — उदाहरण के लिए एक 17 वर्ष और दूसरा 18 वर्ष का हो — तथा दोनों ने आपसी सहमति से रिश्ते को स्वीकार किया हो, तो इस तरह के मामलों में कठोर आपराधिक दंडनीय कानून लागू नहीं किया जाना चाहिए।

        यह नियम बच्चों की सुरक्षा को कमजोर नहीं करता; बल्कि यह वास्तविकता को समझकर न्याय का विवेकपूर्ण उपयोग सुनिश्चित करता है। अगर किसी रिश्ते में अधिक उम्र का व्यक्ति है या शोषण, धमकी या धोखे की स्थितियाँ हैं, तो कानून वैसे ही सख्ती से लागू होगा।


4. सुप्रीम कोर्ट का मूल निर्णय

          यह सिफारिश एक विशेष मामले — The State of Uttar Pradesh vs Anurudh & Anr. — के अंतर्गत दी गई है। शीर्ष न्यायालय ने अपने फैसले में दो आवश्यक बातें कही:

(i) POCSO का दुरुपयोग रोकने की आवश्यकता:

        अदालत ने माना कि कुछ मामलों में यह कानून न्याय के उद्देश्य से परे चला जाता है और व्यक्तिगत टकराव या पारिवारिक मनमुटाव के कारण दुरुपयोग का शिकार बन रहा है। इसलिए, न्यायालय ने कहा कि इस तरह के दुरुपयोग को रोकने के लिए ठोस प्रावधानों की जरूरत है।

(ii) Romeo-Juliet clause की सिफारिश:

        अदालत ने कहा कि केंद्र सरकार को POCSO Act में ऐसे प्रावधान पर विचार करना चाहिए ताकि सहमति आधारित किशोर संबंधों को अधिनियम के दायरे से बाहर रखा जा सके। यह प्रावधान उनके उद्देश्यों के अनुरूप न्याय का संतुलन प्रदान कर सकता है।

        कोर्ट ने यह भी कहा कि ऐसे मामलों में न केवल कानून को अधिक न्यायपूर्ण बनाया जाये, बल्कि इसके दुरुपयोग को रोकने के लिए एक मेकॅनिज्म भी विकसित किया जाना चाहिए — जिससे वे लोग जो कानून का उपयोग व्यक्तिगत दुश्मनी, बदले की भावना या सामाजिक दबाव के कारण करते हैं, उन्हें भी दंडित किया जा सके।


5. संभावित सामाजिक-कानूनी प्रभाव

       इस तरह की सिफारिश का सामाजिक और कानूनी प्रभाव गहरा और बहुआयामी हो सकता है। इसके कुछ संभावित लाभ इस प्रकार हैं:

 प्रामाणिक किशोर प्रेम संबंधों को न्यायपूर्ण संरक्षण:

        यह कदम उन रिश्तों को अपराध की श्रेणी से बाहर रख सकता है जो वाकई में दो युवाओं के बीच आपसी सहमति और समान उम्र के आधार पर होते हैं। इससे उन युवाओं को न्यायिक प्रक्रियाओं में फँसने की संभावना कम होगी, जिनके संबंध में किसी प्रकार की अपमानजनक या जबरन कानूनी कार्रवाई नहीं होनी चाहिए।

 न्यायिक संसाधनों का बेहतर उपयोग:

       उन मामलों पर ध्यान देने से जहाँ सच में शोषण या गंभीर अपराध हुआ हो, अदालतें अधिक फोकस कर सकती हैं; जबकि मामूली सहमति-आधारित विवादों में न्यायिक बोझ कम होगा। सत्ता यह संतुलन लाने के ज़रिये बहुत वास्तविक न्याय सुनिश्चित कर सकती है।

 पारिवारिक दुरुपयोग पर नियंत्रण:

       कुछ परिवार अपने व्यक्तिगत हितों के लिए कानून का दुरुपयोग करके युवा-युवतियों के प्रेमियों के खिलाफ केस दर्ज करवाते हैं। Romeo-Juliet clause इस तरह के दुरुपयोग को टाल सकता है और न्याय के मूल उद्देश्य को सुरक्षित रखने में मदद कर सकता है।


6. आलोचनात्मक चिंताएँ और विरोधी दृष्टिकोण

हालाँकि इस प्रस्तावित बदलाव का सकारात्मक प्रभाव हो सकता है, लेकिन इसके विरोध में कुछ गंभीर चिंताएँ भी व्यक्त की गई हैं:

 शोषण और सहमति की धारणा:

      कुछ समर्थक तर्क करते हैं कि मात्र सहमति का दावा सभी परिस्थितियों में प्रभावी सुरक्षा नहीं दे सकता। किशोरों के बीच सहमति के वास्तविक अर्थ को समझना मुश्किल है क्योंकि सामाजिक दबाव, भावनात्मक निर्भरता और पारिवारिक दबाव अक्सर सहमति को प्रभावित कर सकते हैं। यह सुनिश्चित करना कि सहमति वास्तव में स्वतंत्र और परिपक्व है, एक चुनौतीपूर्ण सवाल हो सकता है।

 बाल संरक्षण में कमजोर पड़ाव:

     एक हिस्से की चिंताओं के अनुसार, Romeo-Juliet clause लागू होने पर शोषणकारी व्यक्तियों के लिए न्यायिक सुरक्षा की गुंजाइश बढ़ सकती है, खासकर यदि उम्र के अंतर की सीमा व्यापक रूप से परिभाषित हो जाए। इस प्रकार के संशोधन के गलत Nutzung से बच्चों की सुरक्षा कमजोर पड़ सकती है।

 सामाजिक और सांस्कृतिक विविधता:

     भारत की सामाजिक-सांस्कृतिक परिस्थितियाँ अत्यंत विविध हैं। कुछ समुदायों में पारंपरिक मान्यताएँ किशोर संबंधों को अस्वीकार करती हैं। ऐसे में Romeo-Juliet clause लागू करने से सामाजिक विरोध और नैतिक प्रश्न भी उत्पन्न हो सकते हैं। यह बदलाव कानून की व्यापक स्वीकार्यता और निष्पादन में चुनौतियाँ ला सकता है।


7. अन्य देशों में Romeo-Juliet जैसे प्रावधानों का उदाहरण

       विश्व के कई देशों में इसी तरह के प्रावधान मौजूद हैं जो न्याय-सुविधानुसार किशोरों के सहानुभूतिपूर्ण संबंधों को अपराध के दायरे से बाहर रखते हैं। उदाहरण के लिए कई पश्चिमी न्यायक्षेत्रों में “Close-in-age exception” लागू है, जहाँ सहमति-आधारित संबंधों में आयु का केवल छोटा अंतर होने पर युवाओं को न्यायिक दंड से बचाया जाता है। यह नियम अक्सर बाल संरक्षण और न्याय का संतुलन साधने के लिए लागू किया जाता है।

      भारत में अगर Romeo-Juliet clause लागू होता है तो वह पश्चिमी देशों के समान न्यायिक विवेक को अपनाने का संकेत होगा, जबकि बच्चों की सुरक्षा तथा कानूनी कठोरता के बीच एक संतुलन भी बनाए रखेगा।


8. निष्कर्ष — एक न्यायिक और सामाजिक क्रॉसरोड

     सुप्रीम कोर्ट द्वारा POCSO Act में Romeo-Juliet clause को शामिल करने की सिफारिश एक संतुलनकारी न्यायिक दृष्टिकोण को बढ़ावा देती है। यह कदम न सिर्फ कानूनी कठोरता और सशक्त बाल सुरक्षा के बीच न्यायपूर्ण संतुलन स्थापित करने का प्रयास है, बल्कि एक व्यावहारिक और संवेदनशील दृष्टिकोण भी प्रस्तुत करता है, जो किशोरों की भावनात्मक और सामाजिक वास्तविकताओं को समझने का प्रयास करता है।

   हालांकि इसके साथ कई चुनौतियाँ और आलोचनात्मक दृष्टिकोण भी जुड़े हैं, लेकिन इस प्रस्तावित संशोधन से शुरुआत हो सकती है — एक न्यायिक और विधायी प्रक्रिया की, जो बच्चों की सुरक्षा के साथ-साथ सही और नैतिक न्याय की अवधारणा को भी समर्पित हो। न्याय, नियमों का कठोर पालन मात्र नहीं है, बल्कि सहानुभूति, विवेक और समय-समय पर आवश्यक संशोधनों