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न्यायिक एकरूपता बनाम विरोधाभासी निर्णय: न्यायमूर्ति उज्जल भुयान की चेतावनी और ‘कानून के शासन’ की चुनौती

न्यायिक एकरूपता बनाम विरोधाभासी निर्णय: न्यायमूर्ति उज्जल भुयान की चेतावनी और ‘कानून के शासन’ की चुनौती

प्रस्तावना: सुप्रीम कोर्ट—एक संस्था, कई आवाज़ें

       भारतीय संविधान के तहत अनुच्छेद 141 स्पष्ट करता है कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा घोषित कानून पूरे देश की अदालतों पर बाध्यकारी है। सिद्धांत रूप में यह व्यवस्था देश में कानूनी एकरूपता (Judicial Uniformity) सुनिश्चित करने के लिए बनाई गई है। परंतु व्यवहारिक रूप में सुप्रीम कोर्ट एकल स्वर में नहीं, बल्कि अनेक पीठों (Benches) के माध्यम से काम करता है—दो, तीन, कभी पाँच या अधिक न्यायाधीशों की अलग-अलग संरचनाओं में।

यहीं से वह व्यावहारिक समस्या जन्म लेती है जिसकी ओर न्यायमूर्ति उज्जल भुयान ने संकेत किया—यदि प्रत्येक पीठ अपने दृष्टिकोण से “सही” और “गलत” का निर्धारण करने लगे, और पूर्व निर्णयों की निरंतरता पर पर्याप्त ध्यान न दे, तो न्यायिक प्रणाली में विरोधाभास (Inconsistency) उत्पन्न हो सकता है। यह केवल सैद्धांतिक समस्या नहीं, बल्कि सीधे-सीधे Rule of Law की स्थिरता से जुड़ा प्रश्न है।


विरोधाभासी निर्णय: समस्या वास्तव में है क्या?

सुप्रीम कोर्ट में प्रतिदिन अनेक प्रकार के संवैधानिक, दंडात्मक, दीवानी और प्रशासनिक मामलों की सुनवाई होती है। सभी मामलों को संविधान पीठ (Constitution Bench) नहीं सुनती; अधिकांश मामलों का निर्णय छोटी पीठें करती हैं। ऐसे में कभी-कभी यह स्थिति बनती है कि:

  • एक पीठ किसी कानूनी सिद्धांत की व्यापक व्याख्या करती है
  • दूसरी पीठ समान विषय में सीमित या विपरीत दृष्टिकोण अपनाती है

इससे एक विचित्र स्थिति पैदा होती है—दोनों निर्णय “सुप्रीम कोर्ट” के हैं, दोनों बाध्यकारी हैं, परंतु दोनों में दृष्टिकोण अलग है।


कानूनी अनिश्चितता (Legal Uncertainty): सबसे बड़ा दुष्परिणाम

न्यायमूर्ति भुयान की चिंता का केंद्र यही है कि विरोधाभासी निर्णय “कानून की निश्चितता” को कमजोर करते हैं।

1. नागरिकों के लिए असमंजस

कानून का उद्देश्य केवल दंड या अधिकार निर्धारित करना नहीं, बल्कि नागरिकों को यह स्पष्ट संकेत देना भी है कि:

“कानून क्या अपेक्षा करता है?”

यदि समान परिस्थिति में अलग-अलग निर्णय आने लगें, तो नागरिक यह नहीं समझ पाते कि किस व्यवहार को वैध या अवैध माना जाएगा।

2. अधीनस्थ न्यायालयों की दुविधा

हाई कोर्ट और ट्रायल कोर्ट के जजों के सामने गंभीर समस्या आती है। यदि दो सुप्रीम कोर्ट निर्णय परस्पर विरोधी हों, तो वे किसका पालन करें? प्रायः वे नवीनतम या बड़ी पीठ के निर्णय को प्राथमिकता देते हैं, पर यह हमेशा सरल नहीं होता।

3. मुकदमों की संख्या में वृद्धि

जब कानून स्पष्ट नहीं होता, तो मुकदमे बढ़ते हैं। प्रत्येक पक्ष यह आशा करता है कि शायद उसकी सुनवाई उस दृष्टिकोण वाली पीठ के समक्ष हो जो उसके पक्ष में है।


‘स्टेयर डिसीसिस’ (Stare Decisis): न्यायिक निरंतरता का स्तंभ

न्यायमूर्ति भुयान ने जिस सिद्धांत पर बल दिया, वह है Stare Decisis—अर्थात् “पूर्व निर्णयों का अनुसरण”।

इस सिद्धांत का सार है:

  • समान मामलों में समान निर्णय
  • न्यायिक निरंतरता
  • संस्थागत स्थिरता

यदि हर नई पीठ पुराने सिद्धांतों की पुनर्समीक्षा करने लगे, तो न्यायिक प्रणाली “व्यक्तिगत न्याय” की ओर बढ़ेगी, न कि “संस्थागत न्याय” की ओर।


व्यक्तिगत दृष्टिकोण बनाम संस्थागत दायित्व

एक न्यायाधीश विद्वान, संवेदनशील और स्वतंत्र होता है। परंतु जब वह सुप्रीम कोर्ट की पीठ पर बैठता है, तो वह केवल “व्यक्ति” नहीं, बल्कि एक संस्था का प्रतिनिधि होता है।

न्यायमूर्ति भुयान का संकेत यही है कि:

न्यायिक स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं कि प्रत्येक पीठ न्यायशास्त्र को अपनी दिशा में मोड़ दे।

संस्थागत निरंतरता (Institutional Continuity) ही सर्वोच्च न्यायालय की विश्वसनीयता का आधार है।


बड़ी पीठ (Constitution Bench) की भूमिका

जब विरोधाभासी निर्णय सामने आते हैं, तो प्रथा यह है कि मामला बड़ी पीठ को भेजा जाए। पाँच या उससे अधिक न्यायाधीशों की पीठ अंतिम रूप से सिद्धांत स्पष्ट करती है।

लेकिन समस्या यह है कि:

  • हर मामला संविधान पीठ तक नहीं पहुँचता
  • कई बार छोटे स्तर पर ही भ्रम बना रहता है

इसलिए न्यायमूर्ति भुयान का संकेत “रोकथाम” की ओर है—विरोधाभास पैदा होने से पहले ही सावधानी।


Rule of Law पर प्रभाव

कानून का शासन (Rule of Law) तीन प्रमुख तत्वों पर टिका है:

  1. निश्चितता (Certainty)
  2. समानता (Equality before Law)
  3. पूर्वानुमेयता (Predictability)

यदि सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों में निरंतर विरोधाभास हो, तो ये तीनों स्तंभ कमजोर पड़ते हैं।


क्या न्यायिक विकास रुक जाएगा?

यह भी एक महत्वपूर्ण प्रश्न है। यदि हर पीठ केवल पुराने निर्णयों का अनुसरण करे, तो क्या कानून विकसित नहीं होगा?

उत्तर है—विकास आवश्यक है, परंतु:

  • स्पष्ट कारणों के साथ
  • बड़ी पीठ के माध्यम से
  • संस्थागत सहमति के आधार पर

अन्यथा “विकास” की आड़ में “असंगति” बढ़ सकती है।


न्यायिक अनुशासन (Judicial Discipline): एक अनकहा नियम

सुप्रीम कोर्ट के भीतर एक अनलिखित परंपरा है—Judicial Discipline। इसका अर्थ है:

  • समान पीठें एक-दूसरे के निर्णयों का सम्मान करें
  • असहमति हो तो मामला बड़ी पीठ को भेजें

यही वह अनुशासन है जिसकी ओर न्यायमूर्ति भुयान ने अप्रत्यक्ष रूप से संकेत किया।


वकीलों के लिए व्यावहारिक महत्व

एक अधिवक्ता के लिए यह मुद्दा अत्यंत महत्वपूर्ण है:

  • तर्क प्रस्तुत करते समय यह देखना आवश्यक है कि कोई निर्णय बाद में संशोधित तो नहीं हुआ
  • विरोधाभासी नजीरों की स्थिति में सही व्याख्या प्रस्तुत करना वकालत की कला है
  • नवीनतम और बड़ी पीठ के निर्णयों की प्राथमिकता समझना अनिवार्य है

निष्कर्ष: न्याय की आत्मा—स्थिरता और विश्वास

सुप्रीम कोर्ट केवल विवाद निपटाने वाली संस्था नहीं, बल्कि संवैधानिक मूल्यों की संरक्षक है। जनता का विश्वास इस बात पर निर्भर करता है कि:

न्याय प्रणाली स्थिर, पूर्वानुमेय और तर्कसंगत है।

न्यायमूर्ति उज्जल भुयान की चेतावनी इसी विश्वास की रक्षा के लिए है। उन्होंने यह स्पष्ट संदेश दिया कि सुप्रीम कोर्ट की शक्ति केवल उसके अधिकार क्षेत्र में नहीं, बल्कि उसकी संस्थागत एकरूपता में निहित है।

जब निर्णयों में निरंतरता होती है, तो कानून मजबूत होता है। जब कानून मजबूत होता है, तो लोकतंत्र सुरक्षित रहता है। यही इस पूरे विमर्श का मूल है।