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धारा 27 NDPS अधिनियम और निजी अस्पतालों की मूत्र जाँच: बिना पुष्टि (Confirmatory Analysis) के अभियोजन असंवैधानिक — कर्नाटक हाईकोर्ट

धारा 27 NDPS अधिनियम और निजी अस्पतालों की मूत्र जाँच: बिना पुष्टि (Confirmatory Analysis) के अभियोजन असंवैधानिक — कर्नाटक हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला

       मादक पदार्थों के दुरुपयोग और उससे जुड़े अपराधों से निपटने के लिए बनाया गया नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रॉपिक सब्सटेंसेज़ अधिनियम, 1985 (NDPS Act) भारत के सबसे कठोर कानूनों में से एक है। इस अधिनियम के तहत आरोपित व्यक्ति को न केवल कठोर दंड का सामना करना पड़ता है, बल्कि जमानत, साक्ष्य और प्रक्रिया के स्तर पर भी सख्त मानक लागू होते हैं। ऐसे में जाँच प्रक्रिया की वैधानिकता और वैज्ञानिक विश्वसनीयता अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है।

       इसी संदर्भ में कर्नाटक हाईकोर्ट ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण और दूरगामी प्रभाव वाला निर्णय देते हुए कहा है कि धारा 27 NDPS अधिनियम के अंतर्गत किसी व्यक्ति के विरुद्ध केवल निजी अस्पताल द्वारा की गई मूत्र (Urine) जाँच, वह भी बिना किसी पुष्टि परीक्षण (Confirmatory Analysis) के, अभियोजन को बनाए रखने के लिए पर्याप्त नहीं है। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसी रिपोर्ट पर आधारित अभियोजन कानून की कसौटी पर खरा नहीं उतरता और यह आरोपी के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।

       यह निर्णय न केवल NDPS मामलों में जाँच की गुणवत्ता पर सवाल उठाता है, बल्कि यह भी रेखांकित करता है कि कठोर कानूनों के तहत भी प्रक्रिया की पवित्रता (Procedural Sanctity) से समझौता नहीं किया जा सकता


1. धारा 27 NDPS अधिनियम: उद्देश्य और दायरा

       धारा 27 NDPS अधिनियम उन मामलों से संबंधित है, जहाँ किसी व्यक्ति द्वारा मादक पदार्थ या मनःप्रभावी पदार्थ का उपभोग (Consumption) किया गया हो। यह प्रावधान उन स्थितियों को कवर करता है, जहाँ पदार्थ की बरामदगी भले न हो, लेकिन उपभोग का आरोप लगाया गया हो।

धारा 27 के अंतर्गत:

  • उपभोग को अपराध माना गया है
  • दंड का स्वरूप प्रयुक्त पदार्थ की प्रकृति पर निर्भर करता है
  • अभियोजन को यह साबित करना होता है कि आरोपी ने वास्तव में मादक पदार्थ का सेवन किया

       यहाँ यह ध्यान देने योग्य है कि उपभोग सिद्ध करने के लिए वैज्ञानिक और ठोस साक्ष्य की आवश्यकता होती है, क्योंकि केवल संदेह या प्रारंभिक संकेत के आधार पर किसी व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।


2. मामले की पृष्ठभूमि: निजी अस्पताल की रिपोर्ट पर अभियोजन

         विवादित मामले में अभियोजन पक्ष ने आरोपी के विरुद्ध यह दावा किया कि उसने मादक पदार्थ का सेवन किया है। इस दावे के समर्थन में पुलिस ने एक निजी अस्पताल द्वारा की गई मूत्र जाँच रिपोर्ट प्रस्तुत की, जिसमें कथित तौर पर मादक पदार्थ की उपस्थिति दर्शाई गई थी।

हालाँकि:

  • यह जाँच सरकारी या अधिसूचित (Notified) प्रयोगशाला द्वारा नहीं की गई थी
  • जाँच केवल प्रारंभिक स्क्रीनिंग टेस्ट तक सीमित थी
  • किसी प्रकार का पुष्टि परीक्षण (Confirmatory Test) जैसे GC-MS (Gas Chromatography–Mass Spectrometry) नहीं कराया गया

इन्हीं आधारों पर आरोपी ने हाईकोर्ट में यह तर्क रखा कि उसके विरुद्ध चलाया जा रहा अभियोजन कानूनन अस्थिर और मनमाना है।


3. कर्नाटक हाईकोर्ट की प्रमुख टिप्पणियाँ

कर्नाटक हाईकोर्ट ने अभियोजन की नींव पर ही सवाल उठाते हुए कहा कि:

  • प्रारंभिक मूत्र जाँच (Screening Test) केवल संकेतात्मक होती है, निर्णायक नहीं
  • बिना पुष्टि परीक्षण के यह तय नहीं किया जा सकता कि रिपोर्ट झूठी-सकारात्मक (False Positive) नहीं है
  • निजी अस्पताल की रिपोर्ट, बिना वैधानिक प्रक्रिया और मानकों के, अपराध सिद्ध करने का आधार नहीं बन सकती

अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि ऐसी रिपोर्ट पर आधारित अभियोजन न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग है और इसे जारी रखने का कोई औचित्य नहीं है।


4. पुष्टि परीक्षण (Confirmatory Analysis) का महत्व

अदालत ने वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाते हुए यह रेखांकित किया कि NDPS मामलों में:

  • प्रारंभिक टेस्ट केवल संदेह उत्पन्न करता है
  • पुष्टि परीक्षण ही अंतिम और निर्णायक प्रमाण होता है
  • GC-MS या समकक्ष तकनीक से ही यह सुनिश्चित किया जा सकता है कि वास्तव में प्रतिबंधित पदार्थ का सेवन हुआ है

बिना पुष्टि परीक्षण के:

  • निर्दोष व्यक्ति को फँसाए जाने का खतरा रहता है
  • NDPS जैसे कठोर कानून का दुरुपयोग संभव हो जाता है

5. निजी बनाम सरकारी प्रयोगशाला: कानूनी अंतर

हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि NDPS अधिनियम और उसके तहत बने नियमों में:

  • अधिसूचित सरकारी प्रयोगशालाओं को ही साक्ष्य के लिए मान्यता दी गई है
  • निजी अस्पताल या प्रयोगशाला की रिपोर्ट, जब तक वह वैधानिक मानकों को पूरा न करे, स्वतः विश्वसनीय नहीं मानी जा सकती

इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि:

  • जाँच निष्पक्ष हो
  • रिपोर्ट से छेड़छाड़ की संभावना न हो
  • अभियोजन और बचाव दोनों को समान न्याय मिले

6. अनुच्छेद 21 और निष्पक्ष प्रक्रिया (Fair Trial)

अदालत ने अपने निर्णय को संविधान के अनुच्छेद 21 से जोड़ते हुए कहा कि:

  • निष्पक्ष जाँच और निष्पक्ष सुनवाई जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अभिन्न हिस्सा है
  • त्रुटिपूर्ण या अपूर्ण वैज्ञानिक साक्ष्य के आधार पर किसी व्यक्ति को अभियोजन के दायरे में रखना संवैधानिक उल्लंघन है

NDPS अधिनियम की कठोरता को देखते हुए अदालत ने कहा कि प्रमाण का स्तर और भी ऊँचा होना चाहिए, न कि कम।


7. पूर्व न्यायिक दृष्टांत और सुसंगतता

हालाँकि यह निर्णय अपने आप में महत्वपूर्ण है, लेकिन यह उस न्यायिक परंपरा का हिस्सा है जिसमें उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय ने बार-बार कहा है कि:

  • NDPS मामलों में प्रक्रियात्मक त्रुटियाँ घातक होती हैं
  • सख्त कानून का अर्थ यह नहीं कि अभियोजन को ढील दी जाए
  • वैज्ञानिक साक्ष्य में अभियोजन की लापरवाही का लाभ आरोपी को मिलना चाहिए

कर्नाटक हाईकोर्ट का यह फैसला उसी सिद्धांत को आगे बढ़ाता है।


8. कानून प्रवर्तन एजेंसियों के लिए संदेश

यह निर्णय पुलिस और जाँच एजेंसियों के लिए एक स्पष्ट चेतावनी है कि:

  • NDPS मामलों में जल्दबाजी या शॉर्टकट स्वीकार्य नहीं
  • हर चरण पर कानून और विज्ञान दोनों का पालन आवश्यक है
  • निजी अस्पतालों की अधूरी रिपोर्ट पर निर्भरता भविष्य में मामलों को कमजोर कर सकती है

9. व्यापक प्रभाव और भविष्य की दिशा

इस फैसले का प्रभाव केवल एक मामले तक सीमित नहीं रहेगा। इसके परिणामस्वरूप:

  • धारा 27 NDPS के तहत दर्ज कई मामलों की जाँच पर पुनर्विचार हो सकता है
  • अदालतें वैज्ञानिक साक्ष्य की गुणवत्ता पर अधिक सख्ती दिखा सकती हैं
  • अभियोजन एजेंसियों को मानकीकृत प्रक्रिया अपनाने के लिए बाध्य होना पड़ेगा

यह निर्णय न्याय और मानवाधिकारों की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा सकता है।


निष्कर्ष

          कर्नाटक हाईकोर्ट का यह फैसला स्पष्ट करता है कि NDPS अधिनियम की कठोरता प्रक्रिया की शुचिता की कीमत पर नहीं हो सकती। धारा 27 के तहत केवल निजी अस्पताल की मूत्र जाँच, वह भी बिना पुष्टि परीक्षण के, न तो वैज्ञानिक रूप से निर्णायक है और न ही कानूनी रूप से टिकाऊ।

यह निर्णय एक मजबूत संदेश देता है कि:

कानून का उद्देश्य अपराध को दंडित करना है, न कि अपूर्ण जाँच के आधार पर निर्दोष को फँसाना।

न्यायपालिका ने एक बार फिर यह सिद्ध किया है कि कठोर कानूनों के दौर में भी संवैधानिक मूल्यों की रक्षा सर्वोपरि है