धारा 112 की वैधानिकता बनाम सत्य की खोज: पितृत्व की कानूनी उपधारणा और डीएनए युग में न्याय का नया विमर्श
प्रस्तावना: जब कानून और जैविक सत्य आमने-सामने खड़े हों
न्यायालय का मूल दायित्व केवल कानून की शब्दशः व्याख्या करना नहीं, बल्कि सत्य के आधार पर न्याय स्थापित करना है। किंतु विधि के इतिहास में कुछ ऐसी कानूनी उपधारणाएँ (Legal Presumptions) बनाई गईं, जिनका उद्देश्य सामाजिक स्थिरता और कमजोर वर्गों की सुरक्षा था — भले ही वे हर मामले में वास्तविक सत्य से मेल न खाएँ।
भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 112 (अब भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 की धारा 116) ऐसी ही एक व्यवस्था है, जो कहती है कि यदि कोई बच्चा वैध विवाह के दौरान जन्म लेता है, तो वह पति का ही वैध संतान माना जाएगा — और यह “Conclusive Proof” है।
लेकिन सवाल यह है:
क्या कानून की यह निश्चायक उपधारणा वैज्ञानिक सत्य (DNA) के सामने भी अडिग रह सकती है?
क्या किसी व्यक्ति को केवल सामाजिक संरक्षण के नाम पर जैविक असत्य स्वीकार करने के लिए बाध्य किया जा सकता है?
इन्हीं प्रश्नों के संदर्भ में मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के हालिया दृष्टिकोण ने एक बड़ा सिद्धांत सामने रखा — धारा 112 सत्य को दबाने का औज़ार नहीं बन सकती।
1. धारा 112 / धारा 116 BSA: पितृत्व की “निश्चायक उपधारणा”
धारा 112 का मूल उद्देश्य पितृत्व के विवादों को सीमित करना था। इसके तीन प्रमुख तत्व हैं:
- वैध विवाह के दौरान जन्म – यदि बच्चा पति-पत्नी के वैध विवाह के दौरान जन्म लेता है, तो पति को पिता माना जाएगा।
- विवाह विच्छेद के 280 दिन के भीतर जन्म – यदि इस अवधि में जन्म हो और माँ पुनर्विवाहित न हो।
- एकमात्र अपवाद — Non-Access – केवल तभी इस उपधारणा को चुनौती दी जा सकती है, जब यह साबित हो जाए कि पति-पत्नी के बीच गर्भाधान के समय शारीरिक संबंध की संभावना ही नहीं थी।
यह धारा धारा 4 (Conclusive Proof) से जुड़ी है — यानी न्यायालय को इस तथ्य को अंतिम मानना होगा।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
1872 के समय न तो DNA विज्ञान था और न ही जैविक पितृत्व निर्धारण का कोई विश्वसनीय तरीका। इसलिए सामाजिक बदनामी से बच्चे को बचाने हेतु यह कठोर उपधारणा बनाई गई।
2. विवाद की जड़: सामाजिक वैधता बनाम जैविक सत्य
आज स्थिति बदल चुकी है। विज्ञान 99.9% सटीकता से पितृत्व सिद्ध कर सकता है। ऐसे में टकराव खड़ा होता है:
| कानून का उद्देश्य | आधुनिक प्रश्न |
|---|---|
| बच्चे को अवैधता के कलंक से बचाना | क्या झूठे पितृत्व पर आधारित संबंध बच्चे के हित में है? |
| विवाह संस्था की स्थिरता | क्या धोखे पर आधारित विवाह संरक्षित होना चाहिए? |
| सामाजिक शांति | क्या जैविक सत्य दबाकर न्याय संभव है? |
मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने इसी द्वंद्व को केंद्र में रखा।
3. न्यायालय का दृष्टिकोण: “न्याय की आत्मा सत्य है”
उच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि:
धारा 112 का उद्देश्य सत्य को दबाना नहीं, बल्कि सामाजिक संरक्षण देना है।
जब मामला व्यभिचार के आधार पर तलाक से जुड़ा हो, और पति स्पष्ट रूप से कहे कि बच्चा उसका नहीं है, तब उसे अपनी बात सिद्ध करने का अवसर मिलना चाहिए।
यदि अदालत केवल धारा 112 का हवाला देकर DNA परीक्षण से इंकार कर दे, तो:
- पति का बचाव का अधिकार (Right to Defence) प्रभावित होता है
- तलाक याचिका का वास्तविक आधार जांच से बाहर रह जाता है
- न्यायालय सत्य की खोज से विमुख हो जाता है
4. सुप्रीम कोर्ट की पूर्व दृष्टांतों से सामंजस्य
उच्चतम न्यायालय ने भी कई मामलों में विज्ञान को प्राथमिकता दी है:
(1) Nandlal Wasudeo Badwaik v. Lata Badwaik
अदालत ने कहा:
“यदि कानून की उपधारणा और वैज्ञानिक सत्य में टकराव हो, तो सत्य को वरीयता दी जानी चाहिए।”
(2) Dipanwita Roy v. Ronobroto Roy
पत्नी के व्यभिचार के आरोप में DNA परीक्षण को अनुमति दी गई, क्योंकि इससे न्यायिक निष्कर्ष पर सीधा प्रभाव पड़ता था।
(3) Banarsi Dass v. Teeku Dutta
हालाँकि अदालत ने सावधानी बरतने की बात कही, पर DNA को पूरी तरह खारिज नहीं किया।
मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय का दृष्टिकोण इन सिद्धांतों की स्वाभाविक प्रगति है।
5. क्या धारा 112 अब अप्रासंगिक हो गई है?
नहीं। अदालत ने यह नहीं कहा कि धारा 112 समाप्त हो गई। बल्कि:
✔ जहाँ पितृत्व पर गंभीर विवाद न हो
✔ जहाँ DNA परीक्षण केवल उत्पीड़न हेतु माँगा गया हो
✔ जहाँ बच्चे के हितों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़े
वहाँ यह उपधारणा अभी भी प्रभावी है।
लेकिन अब यह अभेद्य कवच (Impenetrable Shield) नहीं रही।
6. निजता का अधिकार बनाम न्याय का अधिकार
DNA परीक्षण सीधे व्यक्ति के शरीर और आनुवंशिक पहचान से जुड़ा है, इसलिए यह अनुच्छेद 21 के तहत निजता से जुड़ा प्रश्न है (देखें: K.S. Puttaswamy case)।
संतुलन कैसे?
| पक्ष | अधिकार |
|---|---|
| पति | न्यायपूर्ण सुनवाई, मानसिक गरिमा |
| पत्नी | शारीरिक स्वायत्तता, निजता |
| बच्चा | सामाजिक सुरक्षा, पहचान |
न्यायालय ने कहा — DNA परीक्षण स्वचालित नहीं होगा, बल्कि:
- prima facie मामला हो
- आरोप गंभीर हों
- परीक्षण न्याय के लिए आवश्यक हो
तभी अनुमति दी जानी चाहिए।
7. बच्चे के हित: क्या वह “अवैध” हो जाएगा?
यह एक भावनात्मक और कानूनी भ्रम है।
भारत में अब “अवैध संतान” शब्द की सामाजिक कठोरता कम हो चुकी है।
संपत्ति अधिकार, संरक्षकता, और वैधानिक संरक्षण अलग-अलग कानूनों से नियंत्रित होते हैं।
न्यायालय का तर्क:
झूठे पितृत्व पर आधारित पहचान भी बच्चे के मनोवैज्ञानिक हितों के विरुद्ध हो सकती है।
8. साक्ष्य कानून का विकास: 1872 से 2023 तक
BSA, 2023 ने संरचना बदली है, पर सिद्धांत वही हैं।
अब न्यायालयों को पुराने सिद्धांतों को आधुनिक तकनीक के साथ संतुलित करना है।
“Conclusive Proof” की अवधारणा अब निरपेक्ष नहीं रही — बल्कि न्यायसंगत व्याख्या के अधीन है।
9. व्यापक प्रभाव
(I) तलाक मामलों में साक्ष्य का नया आयाम
व्यभिचार के मामलों में अब वैज्ञानिक साक्ष्य निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं।
(II) झूठे आरोपों पर अंकुश
कोई पक्ष केवल आरोप लगाकर DNA की मांग नहीं कर सकेगा — न्यायालय विवेक से निर्णय देगा।
(III) विधिक दर्शन में बदलाव
यह निर्णय बताता है कि कानून स्थिर नहीं — वह सत्य और विज्ञान के साथ विकसित होता है।
10. संवैधानिक दृष्टि से महत्व
यह निर्णय अनुच्छेद 21 की व्यापक व्याख्या को दर्शाता है:
- गरिमा (Dignity)
- व्यक्तिगत स्वतंत्रता
- न्यायपूर्ण प्रक्रिया (Fair Trial)
सभी को संतुलित कर न्यायालय ने यह संदेश दिया कि कानून का उद्देश्य सामाजिक ढाँचा बचाना है, सत्य को नकारना नहीं।
निष्कर्ष: उपधारणा बनाम वास्तविकता
धारा 112 का ऐतिहासिक महत्व असंदिग्ध है — इसने अनगिनत बच्चों को सामाजिक अपमान से बचाया।
परंतु आज:
विज्ञान ने सत्य का ऐसा दर्पण दे दिया है जिसे कानून अनदेखा नहीं कर सकता।
मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय का दृष्टिकोण यह स्थापित करता है:
✔ कानून समाज के लिए है, सत्य के विरुद्ध नहीं
✔ वैज्ञानिक साक्ष्य न्याय का शत्रु नहीं, सहयोगी है
✔ उपधारणाएँ न्याय की सहायता के लिए हैं, अवरोध के लिए नहीं
अंतिम पंक्ति
“पितृत्व की कानूनी उपधारणा अब सत्य की कसौटी पर परखी जाएगी — और जहाँ सत्य स्पष्ट हो, वहाँ कानून को भी आँखें खोलनी होंगी।”