दिल्ली दंगों के ‘बड़ी साजिश’ मामले में बड़ा मोड़—उमर ख़ालिद, शरजील इमाम, गुलफ़िशा फ़ातिमा समेत अन्य की ज़मानत याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट सोमवार को सुनाएगा फैसला
देश की सर्वोच्च अदालत सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया सोमवार को एक ऐसे मामले में अपना फैसला सुनाने जा रही है, जिस पर न केवल कानूनी जगत बल्कि पूरा देश लंबे समय से नज़र बनाए हुए है। दिल्ली दंगों की कथित ‘बड़ी साजिश’ (Larger Conspiracy) से जुड़े मामलों में उमर ख़ालिद, शरजील इमाम, गुलफ़िशा फ़ातिमा सहित अन्य आरोपियों की ज़मानत याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट का निर्णय आने वाला है।
यह मामला केवल ज़मानत तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें यूएपीए (UAPA) जैसे कठोर कानून, व्यक्तिगत स्वतंत्रता, राज्य की सुरक्षा, सबूतों की प्रकृति, और न्यायिक विवेक जैसे बुनियादी संवैधानिक प्रश्न भी गहराई से जुड़े हुए हैं। इसलिए यह फैसला आने वाले समय में आतंकवाद-रोधी कानूनों और असहमति की सीमाओं को लेकर एक महत्वपूर्ण नज़ीर (precedent) बन सकता है।
मामले की पृष्ठभूमि: दिल्ली दंगे और ‘बड़ी साजिश’ का आरोप
साल 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए सांप्रदायिक दंगों ने देश को झकझोर कर रख दिया था। इन दंगों में—
- 50 से अधिक लोगों की मौत
- सैकड़ों लोग घायल
- भारी मात्रा में सार्वजनिक और निजी संपत्ति को नुकसान
हुआ था।
दिल्ली पुलिस ने इन दंगों के पीछे एक सुनियोजित और संगठित साजिश होने का दावा किया और इसे नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) के विरोध से जोड़ा। पुलिस के अनुसार, कुछ छात्र कार्यकर्ताओं, सामाजिक संगठनों और बुद्धिजीवियों ने मिलकर दंगों को भड़काने की योजना बनाई।
इसी कथित साजिश के तहत उमर ख़ालिद, शरजील इमाम, गुलफ़िशा फ़ातिमा, नताशा नरवाल, देवांगना कलिता समेत कई लोगों को गिरफ्तार किया गया।
यूएपीए का इस्तेमाल: विवाद की जड़
इस मामले की सबसे विवादास्पद बात यह रही कि दिल्ली पुलिस ने आरोपियों पर गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम, 1967 — UAPA की कठोर धाराएँ लगाईं।
यूएपीए के तहत:
- ज़मानत पाना बेहद कठिन होता है
- अदालत को यह देखना होता है कि आरोप “प्रथम दृष्टया सत्य” हैं या नहीं
- लंबी अवधि तक बिना ट्रायल जेल में रखा जा सकता है
आरोपियों का तर्क है कि—
- उनके खिलाफ कोई प्रत्यक्ष हिंसक कृत्य का प्रमाण नहीं है
- भाषण, व्हाट्सएप चैट और विचारों को अपराध बना दिया गया है
- असहमति और विरोध को ‘आतंकवादी गतिविधि’ के रूप में पेश किया गया है
ज़मानत याचिकाओं की लंबी न्यायिक यात्रा
इन आरोपियों ने पहले—
- ट्रायल कोर्ट
- दिल्ली हाईकोर्ट
का दरवाज़ा खटखटाया, लेकिन अधिकांश मामलों में ज़मानत याचिकाएँ खारिज कर दी गईं।
दिल्ली हाईकोर्ट ने अपने कुछ आदेशों में कहा कि:
- आरोपों की प्रकृति गंभीर है
- सामग्री प्रथम दृष्टया यूएपीए के दायरे में आती है
- इस स्तर पर ज़मानत नहीं दी जा सकती
हालाँकि, कुछ मामलों में हाईकोर्ट के भीतर भी मतभेद देखने को मिले, जिससे यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुँचा।
सुप्रीम कोर्ट में बहस: दो विपरीत दृष्टिकोण
सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों ने बेहद सशक्त तर्क रखे।
आरोपियों की ओर से दलीलें
आरोपियों के वकीलों ने तर्क दिया कि:
- यह मामला सबूतों से अधिक कथाओं (narratives) पर आधारित है
- हिंसा से सीधा कोई संबंध नहीं दिखाया गया
- केवल भाषण, लेखन और विचारधारा को आधार बनाया गया है
- यूएपीए का इस्तेमाल संवैधानिक स्वतंत्रता को कुचलने के लिए किया जा रहा है
उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि:
“ज़मानत नियम है, जेल अपवाद।”
साथ ही यह भी कहा गया कि वर्षों से ट्रायल शुरू नहीं हुआ है, जिससे अनुच्छेद 21 के तहत त्वरित न्याय के अधिकार का उल्लंघन हो रहा है।
राज्य (दिल्ली पुलिस) की ओर से तर्क
दूसरी ओर, दिल्ली पुलिस और अभियोजन पक्ष ने कहा कि:
- यह साधारण दंगा नहीं, बल्कि देश को अस्थिर करने की साजिश थी
- आरोपियों की भूमिका ‘आइडियोलॉजिकल मास्टरमाइंड’ की है
- हर अपराध में हथियार उठाना ज़रूरी नहीं होता
- यूएपीए के तहत साजिश और समर्थन भी अपराध है
राज्य ने यह भी तर्क दिया कि यदि ऐसे आरोपियों को ज़मानत दी जाती है, तो इससे—
- गवाहों को प्रभावित करने
- सबूतों से छेड़छाड़
- और कानून-व्यवस्था पर असर
पड़ सकता है।
‘प्रथम दृष्टया सत्य’ की कसौटी
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि—
क्या आरोपियों के खिलाफ लगाए गए आरोप यूएपीए की धारा 43D(5) के तहत “प्रथम दृष्टया सत्य” माने जा सकते हैं या नहीं?
यदि अदालत यह मानती है कि अभियोजन की सामग्री प्रथम दृष्टया पर्याप्त नहीं है, तो ज़मानत का रास्ता खुल सकता है। लेकिन यदि अदालत इसे पर्याप्त मानती है, तो ज़मानत खारिज रह सकती है।
व्यक्तिगत स्वतंत्रता बनाम राज्य की सुरक्षा
यह मामला भारतीय संविधान के दो मूलभूत मूल्यों के टकराव को सामने लाता है:
- व्यक्तिगत स्वतंत्रता (Article 21)
- राज्य की सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था
सुप्रीम कोर्ट को यह तय करना है कि—
- क्या लंबे समय तक बिना ट्रायल जेल में रखना उचित है?
- क्या असहमति को साजिश माना जा सकता है?
- और यूएपीए की व्याख्या कितनी व्यापक होनी चाहिए?
पहले के फैसलों का प्रभाव
सुप्रीम कोर्ट इससे पहले भी यूएपीए मामलों में अहम टिप्पणियाँ कर चुका है। कुछ मामलों में अदालत ने—
- ज़मानत देते हुए स्वतंत्रता को प्राथमिकता दी
- जबकि कुछ मामलों में राष्ट्रीय सुरक्षा को तरजीह दी
इसलिए यह फैसला इस बात पर भी निर्भर करेगा कि अदालत किस दिशा में संतुलन बनाती है।
देशभर की निगाहें फैसले पर
उमर ख़ालिद, शरजील इमाम और गुलफ़िशा फ़ातिमा जैसे नाम केवल आरोपी भर नहीं हैं, बल्कि—
- छात्र राजनीति
- सामाजिक आंदोलन
- और वैचारिक बहस
से जुड़े हुए हैं।
इसलिए यह फैसला:
- नागरिक स्वतंत्रताओं के समर्थकों
- मानवाधिकार संगठनों
- और सुरक्षा एजेंसियों
— सभी के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
संभावित प्रभाव और नजीर
सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय:
- भविष्य के यूएपीए मामलों में ज़मानत की दिशा तय करेगा
- निचली अदालतों को मार्गदर्शन देगा
- और यह स्पष्ट करेगा कि “साजिश” की कानूनी सीमा क्या है
यदि ज़मानत दी जाती है, तो यह व्यक्तिगत स्वतंत्रता के पक्ष में मजबूत संदेश होगा।
यदि ज़मानत खारिज होती है, तो यह कठोर आतंकवाद-रोधी नीति को न्यायिक समर्थन माना जाएगा।
निष्कर्ष: सिर्फ ज़मानत नहीं, संविधान की परीक्षा
दिल्ली दंगों के ‘बड़ी साजिश’ मामले में आने वाला सुप्रीम कोर्ट का फैसला केवल कुछ व्यक्तियों की ज़मानत का प्रश्न नहीं है। यह—
- कानून और असहमति
- सुरक्षा और स्वतंत्रता
- राज्य की शक्ति और नागरिक अधिकार
के बीच संतुलन की एक संवैधानिक परीक्षा है।
सोमवार को आने वाला यह निर्णय तय करेगा कि भारत की सर्वोच्च अदालत किस मूल्य को किस हद तक प्राथमिकता देती है। यही कारण है कि इस फैसले को भारत के हालिया कानूनी इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण निर्णयों में से एक माना जा रहा है।