दिल्ली की हवा पर न्यायिक ‘पहरा’: प्रदूषण संकट के स्थायी समाधान के लिए सुप्रीम कोर्ट का सख्त संदेश
प्रस्तावना: जब सांस लेना भी संघर्ष बन जाए
दिल्ली में रहने वाले लोगों के लिए “हवा” अब जीवनदायिनी नहीं, बल्कि एक जोखिम कारक बन चुकी है। हर साल सर्दियों के आते ही राजधानी और उसके आसपास के क्षेत्रों में धुंध की मोटी चादर छा जाती है, आँखों में जलन, गले में खराश और सांस लेने में तकलीफ आम हो जाती है। एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) के आँकड़े टीवी स्क्रीन और मोबाइल ऐप्स पर लाल रंग में चमकते हैं—मानो चेतावनी दे रहे हों कि हालात सामान्य नहीं हैं।
इसी गंभीर पृष्ठभूमि में 22 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली की बिगड़ती हवा को लेकर एक बार फिर सख्त रुख अपनाया। कोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया कि अब केवल आपातकालीन कदमों—जैसे स्कूल बंद करना, निर्माण गतिविधियों पर अस्थायी रोक या ऑड-ईवन स्कीम—से समस्या का समाधान संभव नहीं है। अदालत ने केंद्र, दिल्ली सरकार, नगर निगम (MCD) और पड़ोसी एनसीआर राज्यों को निर्देश दिया कि वे वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) की सिफारिशों पर आधारित एक ठोस और तथ्यात्मक ‘एक्शन टेकन प्लान’ पेश करें।
यह आदेश केवल प्रशासनिक निर्देश नहीं, बल्कि एक संवैधानिक चेतावनी है—कि यदि राज्य अपने नागरिकों को स्वच्छ हवा देने में विफल रहता है, तो न्यायपालिका चुप नहीं बैठेगी।
प्रदूषण का संकट: एक मौसमी बहाना या स्थायी प्रशासनिक विफलता?
सरकारी हलकों में वर्षों से यह तर्क दिया जाता रहा है कि दिल्ली का प्रदूषण “मौसमी” है—दीपावली के पटाखे, पराली जलाना और सर्दियों में हवा की गति कम होना इसके मुख्य कारण हैं। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने अपने हालिया निर्देश में इस सोच पर अप्रत्यक्ष रूप से सवाल खड़े कर दिए हैं।
अदालत का संकेत साफ है—यदि समस्या केवल कुछ हफ्तों की होती, तो हर साल हालात इतने भयावह क्यों होते? सच्चाई यह है कि दिल्ली का प्रदूषण एक संरचनात्मक समस्या (Structural Problem) बन चुका है, जिसमें कई कारक एक साथ काम करते हैं—
- सड़कों और निर्माण स्थलों से उड़ती धूल
- डीजल-पेट्रोल वाहनों का अत्यधिक उत्सर्जन
- खुले में कचरा जलाना
- औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाला धुआँ
- लैंडफिल साइट्स से उठती जहरीली गैसें
CAQM ने इन सभी बिंदुओं पर समय-समय पर विस्तृत सिफारिशें दी हैं, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, सबसे बड़ी समस्या नीति की नहीं, बल्कि उसके क्रियान्वयन की है।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश: जवाबदेही का नया अध्याय
गुरुवार को हुई सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अब “फाइलों में बंद योजनाओं” का समय खत्म हो चुका है। अदालत ने सभी संबंधित एजेंसियों से यह बताने को कहा कि उन्होंने अब तक वास्तव में क्या किया है।
कोर्ट के निर्देशों के प्रमुख बिंदु इस प्रकार हैं:
1. जवाबदेही तय करने पर जोर
सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली सरकार और एनसीआर राज्यों से पूछा कि CAQM की सिफारिशों में से कितनी पर अमल हुआ और कितनी केवल प्रस्ताव बनकर रह गईं। अदालत ने संकेत दिया कि भविष्य में जिम्मेदारी तय करने से कोई नहीं बच पाएगा।
2. दीर्घकालिक समाधान की मांग
कोर्ट ने कहा कि GRAP (Graded Response Action Plan) केवल फायर-फाइटिंग है। असली जरूरत उन उपायों की है जो पूरे साल प्रदूषण को नियंत्रित रखें, न कि केवल नवंबर-दिसंबर में।
3. एजेंसियों के बीच समन्वय
MCD, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और अन्य स्थानीय निकायों को निर्देश दिया गया कि वे धूल नियंत्रण, कचरा प्रबंधन और सड़क सफाई पर विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत करें।
CAQM की सिफारिशें: समाधान मौजूद हैं, इच्छाशक्ति की कमी है
वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग ने बीते वर्षों में कई व्यावहारिक और तकनीकी सुझाव दिए हैं। समस्या यह नहीं है कि समाधान उपलब्ध नहीं हैं, बल्कि यह है कि वे आधे-अधूरे रूप में लागू किए गए।
कुछ प्रमुख सिफारिशें इस प्रकार हैं:
- सार्वजनिक परिवहन का विस्तार:
इलेक्ट्रिक बसों की संख्या बढ़ाना, मेट्रो और बस सेवाओं के बीच बेहतर तालमेल और अंतिम छोर (Last Mile Connectivity) को मजबूत करना। - धूल नियंत्रण के उपाय:
सड़कों की नियमित मशीनीकृत सफाई, निर्माण स्थलों पर कवरिंग और पानी का छिड़काव। - पराली प्रबंधन:
बायो-डीकंपोजर तकनीक का व्यापक उपयोग और किसानों को आर्थिक प्रोत्साहन। - औद्योगिक सुधार:
फैक्ट्रियों को कोयले और डीजल से हटाकर PNG या अन्य स्वच्छ ईंधन पर स्थानांतरित करना।
इन सिफारिशों के बावजूद जमीनी हकीकत यह है कि दिल्ली और एनसीआर में प्रदूषण का स्तर हर साल नए रिकॉर्ड बना रहा है।
एजेंसियों की भूमिका और चुनौतियाँ
| एजेंसी | जिम्मेदारी | प्रमुख चुनौती |
|---|---|---|
| दिल्ली सरकार | परिवहन, बसें, प्रदूषण नियंत्रण | फंड, इंफ्रास्ट्रक्चर |
| एनसीआर राज्य | पराली, औद्योगिक उत्सर्जन | किसानों का सहयोग |
| MCD | कचरा व धूल प्रबंधन | लैंडफिल और जागरूकता |
यह तालिका स्पष्ट करती है कि समस्या बहु-स्तरीय है और इसका समाधान भी सामूहिक प्रयास से ही संभव है।
संवैधानिक दृष्टिकोण: स्वच्छ हवा केवल नीति नहीं, मौलिक अधिकार है
सुप्रीम कोर्ट ने अपने कई फैसलों में यह दोहराया है कि अनुच्छेद 21 के तहत जीवन का अधिकार केवल जीवित रहने तक सीमित नहीं है, बल्कि गरिमापूर्ण जीवन को भी समाहित करता है। स्वच्छ हवा में सांस लेना इसी गरिमा का हिस्सा है।
जब राज्य प्रदूषण को नियंत्रित करने में विफल रहता है, तो अदालतें पब्लिक ट्रस्ट डॉक्ट्रिन के तहत हस्तक्षेप करती हैं। आज का आदेश इसी संवैधानिक दायित्व का विस्तार है, जिसमें कोर्ट यह सुनिश्चित करना चाहता है कि प्रदूषण को “त्योहारी समस्या” नहीं, बल्कि स्थायी स्वास्थ्य संकट के रूप में लिया जाए।
वकालत और व्यवसाय के दृष्टिकोण से सीख
चूँकि आप वकालत की पढ़ाई कर रहे हैं और साथ-साथ शुद्ध घी का व्यवसाय शुरू करने की योजना बना रहे हैं, यह मामला आपके लिए कई व्यावहारिक संदेश देता है।
1. साक्ष्य की ताकत
सुप्रीम कोर्ट ने भाषण नहीं, रिपोर्ट मांगी है। यह सिखाता है कि कानून में भावनाओं से अधिक महत्व तथ्यों का होता है। इसी तरह, आपके व्यवसाय में भी शुद्धता के प्रमाण—लैब रिपोर्ट, सर्टिफिकेट—आपकी सबसे मजबूत दलील होंगे।
2. स्वास्थ्य और व्यापार का संबंध
जब लोग शुद्ध हवा के लिए संघर्ष कर रहे हैं, तब वे शुद्ध भोजन के प्रति और अधिक सचेत होते हैं। ऐसे समय में शुद्ध देसी घी केवल उत्पाद नहीं, बल्कि स्वास्थ्य का भरोसा बन सकता है।
3. सामाजिक जिम्मेदारी
जैसे कोर्ट सरकारों को उनकी जिम्मेदारी याद दिला रहा है, वैसे ही एक व्यवसायी के रूप में आपकी जिम्मेदारी उपभोक्ताओं के प्रति है। ईमानदारी—चाहे कोर्टरूम हो या डेयरी—सबसे बड़ी नीति है।
निष्कर्ष: न्यायिक सक्रियता से आगे की राह
सुप्रीम कोर्ट का यह हस्तक्षेप एक स्पष्ट संदेश देता है कि अब प्रदूषण पर आँख मूंदना स्वीकार्य नहीं है। ‘एक्शन टेकन प्लान’ केवल एक दस्तावेज़ नहीं, बल्कि भविष्य की जवाबदेही का आधार बनेगा।
दिल्ली-एनसीआर को गैस चैंबर बनने से बचाने के लिए न्यायिक निगरानी, प्रशासनिक इच्छाशक्ति और नागरिक भागीदारी—तीनों का एक साथ आना अनिवार्य है। अदालत ने अपना काम कर दिया है; अब बारी कार्यपालिका और समाज की है।