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थिरुपरनकुंद्रम मुरुगन मंदिर पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा कदम: ASI नियंत्रण और ‘अखंड ज्योति’ पर केंद्र सरकार से मांगा जवाब

थिरुपरनकुंद्रम मुरुगन मंदिर पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा कदम: ASI नियंत्रण और ‘अखंड ज्योति’ पर केंद्र सरकार से मांगा जवाब

प्रस्तावना: आस्था, इतिहास और संविधान के संगम पर खड़ा एक प्राचीन मंदिर

तमिलनाडु के मदुरै जनपद में स्थित थिरुपरनकुंद्रम भगवान मुरुगन सुब्रमण्यम स्वामी मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि दक्षिण भारत की सभ्यता, संस्कृति और स्थापत्य परंपरा का जीवंत प्रतीक है। यह मंदिर भगवान मुरुगन के छह प्रमुख ‘पदई वीदु’ (युद्ध गृह) में प्रथम माना जाता है और इसकी गिनती भारत के सबसे प्राचीन शैल-कृत (Rock-cut) मंदिरों में होती है।

ऐसे ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व वाले मंदिर को लेकर जब मामला भारत के सर्वोच्च न्यायालय तक पहुँचता है, तो यह स्वाभाविक रूप से केवल एक स्थानीय विवाद नहीं रह जाता, बल्कि धार्मिक स्वतंत्रता, सांस्कृतिक संरक्षण और प्रशासनिक नियंत्रण से जुड़ा एक राष्ट्रीय प्रश्न बन जाता है।

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने हिंदू धर्म परिषद द्वारा दायर एक रिट याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) को नोटिस जारी किया है। याचिका में दो प्रमुख मांगें की गई हैं—
(1) मंदिर का नियंत्रण ASI को सौंपा जाए, और
(2) मंदिर के शीर्ष पर स्थित ‘दीपथून’ पर 24 घंटे अखंड ज्योति जलाने की अनुमति दी जाए।


थिरुपरनकुंद्रम मंदिर: इतिहास, आस्था और स्थापत्य का अद्भुत संगम

थिरुपरनकुंद्रम मंदिर का इतिहास संगम युग से भी पूर्व का माना जाता है। यह मंदिर एक विशाल पहाड़ी को काटकर निर्मित किया गया है, जिसमें—

  • ग्रेनाइट शैल-कृत संरचना
  • जटिल मूर्तिकला
  • गुफा स्थापत्य
  • प्राचीन शिलालेख

आज भी विद्यमान हैं।

यह वही स्थान माना जाता है जहाँ भगवान मुरुगन ने सूरपद्मन नामक असुर पर विजय प्राप्त की थी। इसलिए यह मंदिर केवल पूजा-पाठ का केंद्र नहीं, बल्कि धर्म और धर्मयुद्ध की प्रतीकात्मक स्मृति भी है।

यही कारण है कि इस मंदिर से जुड़ा हर प्रशासनिक या धार्मिक निर्णय करोड़ों श्रद्धालुओं की भावनाओं को प्रभावित करता है।


विवाद की जड़: याचिका में उठाए गए मुख्य प्रश्न

1. मंदिर को ASI के नियंत्रण में देने की मांग

याचिकाकर्ता हिंदू धर्म परिषद का तर्क है कि—

  • वर्तमान में मंदिर का प्रबंधन तमिलनाडु सरकार के HR&CE (Hindu Religious and Charitable Endowments) विभाग के अधीन है।
  • प्रशासनिक नियंत्रण के कारण मंदिर की प्राचीन संरचना, शिलालेखों और मूल स्थापत्य के संरक्षण में लापरवाही हो रही है।
  • मंदिर का पुरातात्विक महत्व इतना अधिक है कि इसका संरक्षण केवल ASI जैसे विशेषज्ञ निकाय द्वारा ही संभव है।

याचिका में यह भी कहा गया है कि ASI के नियंत्रण में आने से मंदिर—

  • राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त रहेगा
  • वैज्ञानिक संरक्षण पद्धतियों के अंतर्गत सुरक्षित रहेगा
  • और आने वाली पीढ़ियों के लिए संरक्षित रह सकेगा

2. दीपथून पर 24 घंटे ‘अखंड ज्योति’ की मांग

मंदिर के शीर्ष पर स्थित दीपथून (पत्थर का विशाल दीप स्तंभ) इस विवाद का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू है।

परंपरागत रूप से—

  • विशेष पर्वों और धार्मिक अवसरों पर
  • इस दीपथून पर दीप प्रज्वलित किया जाता रहा है

याचिकाकर्ता का दावा है कि—

  • यह स्तंभ आध्यात्मिक ऊर्जा का केंद्र है
  • यहाँ निरंतर दीप जलना शास्त्रसम्मत और परंपरागत है
  • अखंड ज्योति से मंदिर की पवित्रता और भक्तों की आस्था जुड़ी है

इसलिए उन्होंने 24×7 दीप प्रज्वलन की अनुमति की मांग की है।


सुप्रीम कोर्ट की भूमिका: अभी फैसला नहीं, लेकिन संकेत स्पष्ट

सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल—

  • कोई अंतिम निर्णय नहीं दिया है
  • लेकिन केंद्र सरकार और ASI को नोटिस जारी किया है

कानूनी दृष्टि से यह अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि—

नोटिस जारी करना दर्शाता है कि न्यायालय को प्रथम दृष्टया (Prima Facie) मामला विचारणीय प्रतीत हुआ है।

अब—

  • केंद्र सरकार को अपना पक्ष रखना होगा
  • ASI को यह बताना होगा कि
    • क्या मंदिर राष्ट्रीय महत्व का स्मारक घोषित हो सकता है?
    • क्या अखंड ज्योति से संरचना को कोई खतरा है?

संवैधानिक और कानूनी आयाम

1. अनुच्छेद 25 बनाम अनुच्छेद 49

यह मामला सीधे तौर पर दो संवैधानिक प्रावधानों के बीच संतुलन से जुड़ा है—

  • अनुच्छेद 25: धर्म की स्वतंत्रता
  • अनुच्छेद 49: राष्ट्रीय महत्व के स्मारकों का संरक्षण

प्रश्न यह है कि—

  • क्या धार्मिक आस्था के नाम पर
  • किसी ऐतिहासिक संरचना को जोखिम में डाला जा सकता है?

या फिर—

  • क्या संरक्षण के नाम पर
  • धार्मिक परंपराओं पर पूर्ण रोक लगाई जा सकती है?

सुप्रीम कोर्ट को इन्हीं प्रश्नों का संतुलित उत्तर देना होगा।


2. राज्य बनाम ASI: प्रशासनिक नियंत्रण की बहस

तमिलनाडु में मंदिरों के सरकारी नियंत्रण को लेकर दशकों से विवाद चलता आ रहा है। यह याचिका उसी बहस का विस्तार है।

यदि मंदिर ASI के अधीन जाता है—

  • पूजा-पाठ और संरक्षण के बीच संतुलन बनाना चुनौती होगी
  • ASI के नियम कई बार धार्मिक प्रथाओं पर सीमाएँ लगाते हैं

पूर्व में—

  • सबरीमला
  • पद्मनाभस्वामी
  • जगन्नाथ मंदिर

जैसे मामलों में अदालतें इसी संतुलन की तलाश कर चुकी हैं।


धार्मिक परंपरा बनाम सुरक्षा और संरक्षण

अखंड ज्योति की मांग केवल धार्मिक नहीं, बल्कि—

  • अग्नि सुरक्षा
  • संरचनात्मक सुरक्षा
  • पर्यावरणीय प्रभाव

से भी जुड़ी है।

ASI को यह जांच करनी होगी कि—

  • लगातार दीप जलने से
  • पत्थर, शिलालेख या गुफा संरचना को नुकसान तो नहीं होगा?

यदि वैज्ञानिक रूप से सुरक्षित समाधान निकाला जाता है, तो अदालत धार्मिक परंपरा के पक्ष में झुक सकती है।


वकालत के दृष्टिकोण से यह मामला क्यों महत्वपूर्ण है

एक विधि छात्र या वकील के लिए यह मामला—

  • संवैधानिक कानून
  • प्रशासनिक कानून
  • धार्मिक संस्थानों का कानून

तीनों का जीवंत उदाहरण है।

यह सिखाता है कि—

  • अदालतें भावनाओं से नहीं
  • बल्कि संतुलन और तर्क से निर्णय करती हैं

व्यवसाय और नैतिकता का अप्रत्यक्ष संबंध

मंदिरों में दीप प्रज्वलन के लिए—

  • शुद्ध देसी घी
  • धार्मिक दृष्टि से अनिवार्य माना जाता है

यदि अखंड ज्योति की अनुमति मिलती है, तो—

  • गुणवत्ता
  • शुद्धता
  • सात्विकता

सबसे बड़ा मापदंड बनेगा।

ऐसे में—

  • विश्वसनीय
  • पारदर्शी
  • नैतिक आपूर्ति

का महत्व बढ़ेगा।


निष्कर्ष: परंपरा और संविधान के बीच संतुलन की परीक्षा

थिरुपरनकुंद्रम मुरुगन मंदिर से जुड़ा यह मामला केवल—

  • एक मंदिर
  • एक दीप
  • या एक प्रशासनिक आदेश

का विषय नहीं है।

यह मामला है—

  • आस्था बनाम संरक्षण
  • परंपरा बनाम आधुनिक प्रशासन
  • और धर्म बनाम संवैधानिक व्यवस्था

का।

सुप्रीम कोर्ट का अंतिम निर्णय आने वाले समय में—

  • मंदिर प्रशासन
  • ASI की भूमिका
  • और धार्मिक स्वतंत्रता

तीनों पर दूरगामी प्रभाव डालेगा।

यह प्रकरण भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में “संस्कृति और संविधान के संतुलन” की एक महत्वपूर्ण नजीर बनेगा।