“तेलंगाना स्पीकर कोर्ट की अवमानना में?” — सुप्रीम कोर्ट ने दिया अंतिम आदेश, कहा: सदस्यता अयोग्यता याचिकाओं पर तुरंत निर्णय लें
परिचय : सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख और तेलंगाना विधानसभा का संवैधानिक संकट
तेलंगाना विधानसभा में विधायकों की अयोग्यता (Disqualification) याचिकाओं पर लम्बे समय से लंबित निर्णय को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने अत्यंत कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि “स्पीकर की यह हरकत न्यायपालिका के प्रति गंभीर असम्मान यानी Gross Contempt of Court है।”
सुप्रीम कोर्ट ने स्पीकर को अल्टीमेटम देते हुए निर्देश दिया है कि वे लंबित अयोग्यता याचिकाओं पर निर्धारित समय सीमा के भीतर फैसला करें। अदालत ने चेतावनी दी कि यदि आदेश का पालन नहीं हुआ, तो कोर्ट कठोर कदम उठाने में संकोच नहीं करेगी।
यह मामला भारतीय संवैधानिक कानून, विशेष रूप से दसवीं अनुसूची (Anti-Defection Law) और विधायी स्वायत्तता बनाम न्यायिक समीक्षा के बीच संतुलन से जुड़ा एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। इस लेख में हम पूरे मामले, सुप्रीम कोर्ट के निर्देश, कानूनी मुद्दों और संभावित परिणामों की विस्तृत पड़ताल करेंगे।
1. मामला क्या है? : अयोग्यता याचिकाओं पर स्पीकर की चुप्पी
तेलंगाना विधानसभा में विपक्ष के कुछ विधायकों ने आरोप लगाया कि सत्तारूढ़ दल में शामिल कुछ विधायकों ने दल-बदल (Defection) किया है और इसलिए उन्हें दसवीं अनुसूची के तहत अयोग्य घोषित किया जाना चाहिए।
इन विधायकों ने स्पीकर के समक्ष अयोग्यता याचिकाएँ दायर की थीं, लेकिन महीनों बीत जाने के बावजूद स्पीकर ने कोई निर्णय नहीं लिया।
इसके बाद याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया और कहा—
- स्पीकर जानबूझकर निर्णय नहीं ले रहे
- यह लोकतंत्र की मूल भावना के खिलाफ है
- अयोग्य विधायकों को बिना रोक-टोक सदन में बैठने की अनुमति है
- इससे सत्ता समीकरण प्रभावित हो रहे हैं
याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि स्पीकर का यह रवैया संविधान के प्रति असम्मान है और अदालत को हस्तक्षेप करना चाहिए।
2. सुप्रीम कोर्ट की नाराज़गी : “यह Gross Contempt है”
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने बेहद कठोर टिप्पणियाँ कीं।
अदालत ने कहा—
“स्पीकर बार-बार इस कोर्ट के आदेशों को नजरअंदाज कर रहे हैं। यह न्यायपालिका का सीधा-सीधा अपमान है। यह Gross Contempt of Court है।”
“दसवीं अनुसूची के मामलों पर तुरन्त निर्णय होना चाहिए, महीनों तक लंबित रखना लोकतंत्र की हत्या जैसा है।”
अदालत ने आगे कहा कि स्पीकर संवैधानिक पद पर होते हुए भी कोर्ट के आदेशों की अवहेलना नहीं कर सकते। विधायी विशेषाधिकार का मतलब न्यायिक निर्देशों की अनदेखी नहीं है।
3. स्पीकर का रुख और राज्य की दलीलें
राज्य की ओर से दलील दी गई कि—
- स्पीकर व्यस्त हैं
- कई मामलों का अध्ययन करना होता है
- पार्टी विरोधी गतिविधियों के सबूतों की जांच में समय लगता है
- विधानसभा का सत्र भी चल रहा था
लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसे स्वीकार नहीं किया और कहा—
“यदि कोर्ट कोई समयसीमा तय करे और स्पीकर उसका पालन न करें तो यह संविधान व्यवस्था पर कुठाराघात है।”
4. सुप्रीम कोर्ट का अल्टीमेटम : समय सीमा तय
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट निर्देश जारी किए—
- स्पीकर को निर्दिष्ट समय सीमा में सभी अयोग्यता याचिकाओं पर निर्णय देना होगा।
- यदि आदेश का पालन नहीं किया गया, तो अदालत कठोर कार्रवाई कर सकती है।
- स्पीकर व्यक्तिगत रूप से अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकते।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दसवीं अनुसूची की आत्मा यही है कि दल-बदल करने वाले सदस्य को तुरंत निर्णय का सामना करना चाहिए। देरी का लाभ केवल विधेयक और सरकार को मिलता है, जिससे लोकतांत्रिक समानता बिगड़ती है।
5. दसवीं अनुसूची (Tenth Schedule) : मूल कानूनी ढांचा
1985 में 52वें संविधान संशोधन द्वारा दसवीं अनुसूची जोड़ी गई, जिसे Anti-Defection Law कहा जाता है।
इसमें प्रावधान है कि—
- यदि कोई विधायक स्वेच्छा से पार्टी छोड़ दे
- या पार्टी व्हिप के खिलाफ मतदान करे
- या किसी अन्य दल में सम्मिलित हो जाए
तो स्पीकर उसे अयोग्य घोषित कर सकते हैं।
लेकिन प्रश्न यह है कि स्पीकर कब निर्णय देंगे?
यही देरी भारतीय लोकतंत्र में विवाद का कारण बन रही है।
6. क्या सुप्रीम कोर्ट स्पीकर पर दबाव डाल सकता है? : संवैधानिक बहस
ऐसे मामलों में एक संवैधानिक प्रश्न उठता है—
क्या स्पीकर न्यायालय के निर्देशों का पालन न करने पर दोषी ठहराए जा सकते हैं?
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि—
- स्पीकर संविधान के तहत कार्य करते हैं
- वे न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) से बाहर नहीं हैं
- वे न्यायालय से “ऊपर” नहीं हैं
- यदि वे कोर्ट के आदेश का पालन न करें तो उन्हें Contempt का सामना करना पड़ सकता है
यह बात पहले से भी कई मामलों में स्थापित हो चुकी है, जैसे—
- Kihoto Hollohan v. Zachillhu (1992)
- Keisham Meghachandra Singh Case (2020)
मेघाचंद्र सिंह केस में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि—
“स्पीकर दल-बदल मामलों पर 3 महीनों के भीतर निर्णय दें।”
लेकिन तेलंगाना मामले में यह समयसीमा भी पार कर दी गई थी।
7. सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी : “लोकतंत्र कमजोर हो रहा है”
अदालत ने कहा कि—
- दल-बदल की संस्कृति लोकतंत्र को खोखला कर रही है
- स्पीकर की निष्क्रियता सरकार के पक्ष में असंतुलन पैदा करती है
- कोर्ट के आदेश की अवहेलना मनमानी है
- संविधान केवल कागज का दस्तावेज नहीं, बल्कि उसका पालन अनिवार्य है
अदालत ने यह भी कहा कि—
“स्पीकर अदालत को यह नहीं कह सकते कि यह उनका ‘अंदरूनी मामला’ है। संविधान सब पर समान रूप से लागू होता है।”
8. विपक्ष का आरोप : सरकार बचाने के लिए स्पीकर निर्णय नहीं ले रहे
विपक्ष ने आरोप लगाया है कि—
- स्पीकर जानबूझकर अयोग्यता पर निर्णय नहीं ले रहे,
- क्योंकि कुछ दोषी विधायक सरकार की स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण हैं।
इस प्रकार की देरी का राजनीतिक लाभ सत्तारूढ़ दल को मिलता है।
यह स्थिति संविधान के तटस्थ स्पीकर की अवधारणा पर प्रश्नचिह्न लगाती है।
9. क्या सुप्रीम कोर्ट स्पीकर को हटाने का आदेश दे सकता है?
सूत्रों और विशेषज्ञों के अनुसार—
नहीं — सुप्रीम कोर्ट सीधे स्पीकर को पद से हटाने का आदेश नहीं दे सकता।
लेकिन
- अदालत उन्हें Contempt में दोषी ठहरा सकती है
- आदेश का पालन न करने पर जुर्माना, चेतावनी, या कठोर टिप्पणी कर सकती है
- राज्य सरकार या विधानसभा को निर्देश जारी कर सकती है
कुछ संवैधानिक विशेषज्ञों का मानना है कि अदालत भविष्य में ऐसी स्थितियों के लिए स्वतंत्र ट्रिब्यूनल बनाने की सिफारिश भी कर सकती है।
10. देश की अन्य विधानसभाओं पर प्रभाव
सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी सिर्फ तेलंगाना तक सीमित नहीं है।
देश के कई राज्यों में—
- दल-बदल
- स्पीकर की निष्क्रियता
- न्यायिक अवमानना
- लंबित याचिकाएँ
जैसी समस्याएँ आम हो चुकी हैं।
यह फैसला आने वाले महीनों में—
- महाराष्ट्र
- राजस्थान
- गोवा
- अरुणाचल
- मणिपुर
- कर्नाटक
जैसे राज्यों में भी प्रभाव डाल सकता है।
11. विशेषज्ञों की राय : न्यायपालिका का सक्रिय होना आवश्यक
कई संवैधानिक विशेषज्ञ इस बात से सहमत हैं कि—
- दल-बदल मामलों में स्पीकर अक्सर निष्पक्ष नहीं रहते
- निर्णय में देरी राजनीतिक लाभ के लिए होती है
- इस कारण न्यायपालिका का हस्तक्षेप आवश्यक हो जाता है
- सुप्रीम कोर्ट के आदेश लोकतंत्र को मज़बूत करेंगे
कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि—
“जब तक स्पीकर को किसी पक्ष का ‘राजनीतिक प्रतिनिधि’ माना जाएगा, तब तक दल-बदल कानून कमजोर रहेगा।”
12. आगे की संभावित स्थिति : क्या हो सकता है?
सुप्रीम कोर्ट ने अंतिम चेतावनी दे दी है।
अब आने वाले समय में:
- स्पीकर को मजबूरन फैसला सुनाना होगा
- यदि आदेश नहीं मानते, तो Contempt proceedings शुरू हो सकती हैं
- विपक्ष को राजनीतिक रूप से बड़ा लाभ मिलेगा
- अयोग्य विधायकों की संख्या सरकार की स्थिरता को प्रभावित कर सकती है
- भविष्य में स्वतंत्र Constitutional Tribunal बनाने की सिफारिश हो सकती है
यह मामला आने वाले महीनों में भारतीय संवैधानिक कानून की दिशा निर्धारित कर सकता है।
निष्कर्ष : न्यायपालिका बनाम स्पीकर — लोकतंत्र की परीक्षा
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी “Gross Contempt of Court” और अल्टीमेटम इस बात का स्पष्ट संकेत हैं कि—
- अदालत अब इस तरह की देरी को सामान्य राजनीतिक प्रक्रिया नहीं मानती
- स्पीकर का पद तटस्थ और संवैधानिक होना चाहिए
- संविधान सर्वोपरि है, चाहे कोई भी संवैधानिक पद धारण करे
- न्यायपालिका लोकतंत्र के बुनियादी ढांचे की रक्षा के लिए जिम्मेदार है
तेलंगाना का यह मामला यह दर्शाता है कि दल-बदल कानून को और अधिक मजबूत और पारदर्शी बनाने की आवश्यकता है तथा स्पीकर के बजाय एक स्वतंत्र प्राधिकरण द्वारा अयोग्यता मामलों का निर्णय किया जाना चाहिए।