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तिरुपरंकुंड्रम पहाड़ी विवाद धार्मिक स्वतंत्रता, साझा पवित्र स्थल, और संवैधानिक धर्मनिरपेक्षता का न्यायिक संतुलन

तिरुपरंकुंड्रम पहाड़ी विवाद धार्मिक स्वतंत्रता, साझा पवित्र स्थल, और संवैधानिक धर्मनिरपेक्षता का न्यायिक संतुलन (Executive Officer बनाम रामा रविकुमार एवं अन्य)


प्रस्तावना: जब आस्था भूगोल से टकराती है

        भारत केवल भौगोलिक सीमाओं से बना राष्ट्र नहीं है, बल्कि यह आस्थाओं, परंपराओं, धार्मिक स्मृतियों और सांस्कृतिक सह-अस्तित्व से निर्मित सभ्यता है। यहाँ पर्वत केवल पत्थर नहीं होते, नदियाँ केवल जलधाराएँ नहीं होतीं, और स्थल केवल भूमि नहीं होते — वे सांस्कृतिक प्रतीक होते हैं।

     तिरुपरंकुंड्रम पहाड़ी विवाद इसी सभ्यतागत संरचना का विधिक प्रतिबिंब है। यह मामला केवल एक दीपक जलाने का प्रश्न नहीं था, बल्कि यह इस बात की परीक्षा थी कि—

क्या भारतीय संविधान विविध धार्मिक आस्थाओं को एक ही भौगोलिक क्षेत्र में सह-अस्तित्व का अधिकार देता है?
क्या राज्य केवल नियंत्रणकर्ता है या सांस्कृतिक संतुलनकर्ता भी है?
और क्या कानून समाज को बाँटने का उपकरण बनेगा या जोड़ने का?


1. तिरुपरंकुंड्रम: एक पहाड़ी, अनेक आस्थाएँ

तिरुपरंकुंड्रम (Thirupparankundram) तमिलनाडु के मदुरै जिले में स्थित एक प्राचीन धार्मिक स्थल है। यह पहाड़ी केवल भौगोलिक संरचना नहीं, बल्कि धार्मिक स्मृति स्थल (Religious Memory Site) है।

हिंदू परंपरा में:

यहाँ स्थित सुब्रमण्यम स्वामी मंदिर भगवान मुरुगन के अरुपदई वीडु (छह दिव्य निवासों) में प्रथम स्थान रखता है। यह स्थान हजारों वर्षों से धार्मिक अनुष्ठानों, यात्राओं और दीपम परंपराओं का केंद्र रहा है।

मुस्लिम परंपरा में:

इसी पहाड़ी पर स्थित सिकंदर शाह औलिया दरगाह मुस्लिम समुदाय के लिए आध्यात्मिक महत्व रखती है। यह स्थान सूफी परंपरा, श्रद्धा और आध्यात्मिक साधना से जुड़ा है।

इस प्रकार यह पहाड़ी एक Shared Sacred Geography का उदाहरण है — जहाँ दो धर्मों की स्मृतियाँ एक ही स्थल पर विद्यमान हैं।


2. विवाद का मूल: परंपरा बनाम नियंत्रण

विवाद का केंद्र बना एक पत्थर का स्तंभ, जहाँ हिंदू समुदाय का दावा था कि वहाँ सदियों से दीपम (दीपक) प्रज्वलित किया जाता रहा है।

हिंदू पक्ष का तर्क:

  • दीपम एक धार्मिक अधिकार है
  • यह परंपरा ऐतिहासिक है
  • यह सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है
  • इसे रोकना धार्मिक स्वतंत्रता पर आघात है

दरगाह प्रशासन का तर्क:

  • यह क्षेत्र धार्मिक रूप से संवेदनशील है
  • नई गतिविधियाँ तनाव उत्पन्न कर सकती हैं
  • इससे शांति भंग हो सकती है
  • कानून-व्यवस्था खतरे में पड़ सकती है

यह विवाद मूलतः तीन स्तरों पर खड़ा था:

  1. ऐतिहासिकता का प्रश्न (Historical Continuity)
  2. अधिकार क्षेत्र का प्रश्न (Jurisdiction)
  3. सार्वजनिक शांति का प्रश्न (Public Order)

3. मद्रास उच्च न्यायालय: परंपरा की विधिक मान्यता

(क) एकल न्यायाधीश का दृष्टिकोण

न्यायालय ने कहा कि:

धार्मिक परंपरा केवल ग्रंथों से नहीं बनती, वह सामाजिक स्मृति (social memory) से बनती है।

अदालत ने:

  • स्थानीय परंपराओं
  • ऐतिहासिक साक्ष्यों
  • सामाजिक प्रचलन
  • जनस्मृति

का अध्ययन कर यह निष्कर्ष निकाला कि दीपम प्रज्वलन एक पारंपरिक धार्मिक अभ्यास है, कोई नया प्रयोग नहीं।

(ख) खंडपीठ का निर्णय

खंडपीठ ने कहा:

यदि कोई धार्मिक अभ्यास शांतिपूर्ण है और किसी अन्य समुदाय के अधिकारों का प्रत्यक्ष उल्लंघन नहीं करता, तो उसे रोका नहीं जा सकता।

यहाँ न्यायालय ने धार्मिक सह-अस्तित्व (Religious Co-existence Doctrine) को स्पष्ट रूप से मान्यता दी।


4. सर्वोच्च न्यायालय: अधिकार नहीं, संतुलन

जब मामला सुप्रीम कोर्ट पहुँचा, तो न्यायालय ने इसे केवल “धार्मिक अधिकार” के रूप में नहीं देखा, बल्कि संवैधानिक संतुलन समस्या के रूप में देखा।

प्रमुख कानूनी प्रश्न:

  • क्या धार्मिक स्वतंत्रता पूर्ण (absolute) है?
  • क्या सार्वजनिक शांति धार्मिक अधिकारों से ऊपर है?
  • क्या राज्य का कर्तव्य केवल नियंत्रण है या संतुलन भी?

5. संवैधानिक ढाँचा: अधिकार + सीमाएँ

अनुच्छेद 25:

धार्मिक स्वतंत्रता देता है
लेकिन शर्त के साथ:
Public Order, Morality, Health

अनुच्छेद 26:

धार्मिक संस्थाओं को स्वशासन का अधिकार
लेकिन यह भी Public Policy के अधीन

धर्मनिरपेक्षता:

भारत का धर्मनिरपेक्ष मॉडल =
सभी धर्मों के प्रति सम्मान, किसी धर्म का प्रभुत्व नहीं


6. संतुलनकारी न्यायशास्त्र (Balancing Jurisprudence)

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया:

अधिकार तभी मान्य हैं जब वे समाज में स्थिरता उत्पन्न करें, अस्थिरता नहीं।

न्यायालय का सिद्धांत था:

  • धार्मिक अधिकार ≠ अराजकता का लाइसेंस
  • परंपरा ≠ कानून से ऊपर
  • आस्था ≠ प्रशासन से मुक्त

7. राज्य की भूमिका: नियंत्रक नहीं, समन्वयक

यह मामला Administrative State Theory को नया रूप देता है।

राज्य की भूमिका बनी:

  1. नियंत्रक (Regulator)
  2. संरक्षक (Protector)
  3. संतुलनकर्ता (Balancer)
  4. मध्यस्थ (Mediator)

राज्य अब केवल पुलिसिंग एजेंसी नहीं, बल्कि सांस्कृतिक प्रबंधक (Cultural Manager) बनता है।


8. साझा पवित्र स्थल (Shared Sacred Spaces) का सिद्धांत

यह मामला भारतीय विधि में एक नया सिद्धांत स्थापित करता है:

जब एक ही स्थल पर कई आस्थाएँ जुड़ी हों, तो समाधान “अधिकार आधारित” नहीं बल्कि “सह-अस्तित्व आधारित” होना चाहिए।

यह दृष्टिकोण:

  • टकराव की जगह संवाद
  • वर्चस्व की जगह संतुलन
  • प्रभुत्व की जगह साझेदारी

को प्राथमिकता देता है।


9. सामाजिक प्रभाव: न्यायालय एक सामाजिक वास्तुकार

यह फैसला बताता है कि अदालतें केवल विवाद हल नहीं करतीं, बल्कि समाज की संरचना भी गढ़ती हैं।

यह निर्णय:

  • सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को रोकता है
  • संवाद की संस्कृति को बढ़ाता है
  • धार्मिक सहिष्णुता को मजबूत करता है
  • साझा विरासत की अवधारणा को वैधता देता है

10. विधिक दर्शन: भारतीय न्यायपालिका का मौलिक मॉडल

यह मामला दर्शाता है कि भारतीय न्यायपालिका का दर्शन पश्चिमी मॉडल से अलग है:

पश्चिमी मॉडल:
Rights-Centric (अधिकार-केंद्रित)

भारतीय मॉडल:
Harmony-Centric (सद्भाव-केंद्रित)

यहाँ “अधिकार” अंतिम लक्ष्य नहीं, बल्कि “सामाजिक संतुलन” अंतिम लक्ष्य है।


निष्कर्ष: दीपक एक, अर्थ अनेक

तिरुपरंकुंड्रम विवाद केवल एक दीपक जलाने का प्रश्न नहीं था। यह प्रश्न था:

  • धर्म का
  • संविधान का
  • समाज का
  • सह-अस्तित्व का
  • और भारत की सभ्यतागत आत्मा का

यह फैसला यह सिखाता है कि:

भारत में न्याय केवल कानून से नहीं चलता,
वह संस्कृति से चलता है,
इतिहास से चलता है,
और सामाजिक विवेक से चलता है।

अंतिम शब्दों में:

यह फैसला परंपरा की जीत नहीं, संतुलन की जीत है।
यह धर्म की जीत नहीं, संविधान की जीत है।
यह अधिकार की जीत नहीं, सद्भाव की जीत है।
और यह किसी एक समुदाय की नहीं, पूरे समाज की जीत है।