तलाक और भरण-पोषण (Divorce and Maintenance): महिला और पति दोनों के अधिकार – एक विस्तृत कानूनी विश्लेषण
भूमिका
भारतीय समाज में विवाह केवल सामाजिक नहीं बल्कि धार्मिक और कानूनी संस्था भी है। विवाह के माध्यम से पति-पत्नी दोनों एक-दूसरे के प्रति अधिकारों और कर्तव्यों से बंधे होते हैं। परंतु जब यह संबंध असहनीय हो जाता है, तो तलाक (Divorce) एक वैधानिक उपाय के रूप में सामने आता है। तलाक के पश्चात भरण-पोषण (Maintenance) का प्रश्न उत्पन्न होता है — जिसमें महिला और पति दोनों को कुछ निश्चित अधिकार प्राप्त होते हैं।
भारत में तलाक और भरण-पोषण से संबंधित प्रावधान विभिन्न व्यक्तिगत कानूनों जैसे हिंदू विवाह अधिनियम, 1955; मुस्लिम कानून; ईसाई विवाह अधिनियम, 1872; पारसी विवाह एवं तलाक अधिनियम, 1936 तथा धारा 125 दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) के अंतर्गत निहित हैं।
1. तलाक की अवधारणा (Concept of Divorce)
तलाक का अर्थ विवाह का कानूनी अंत है। यह वह प्रक्रिया है जिसके माध्यम से पति-पत्नी के बीच वैवाहिक संबंध समाप्त हो जाते हैं। भारतीय कानून में तलाक के दो प्रमुख प्रकार हैं:
- न्यायालय द्वारा तलाक (Judicial Divorce)
- आपसी सहमति से तलाक (Mutual Consent Divorce)
तलाक का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि जब विवाहिक संबंधों में समरसता समाप्त हो जाए और पुनर्मिलन असंभव हो, तो दोनों पक्ष स्वतंत्र जीवन जी सकें।
2. हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के तहत तलाक के आधार (Grounds of Divorce under Hindu Law)
धारा 13 के अंतर्गत निम्न आधारों पर तलाक दिया जा सकता है:
- व्यभिचार (Adultery)
- क्रूरता (Cruelty)
- परित्याग (Desertion)
- मानसिक विकार (Mental Disorder)
- रूपांतरण (Conversion to another religion)
- धार्मिक संन्यास (Renunciation)
- सात वर्ष या उससे अधिक की अनुपस्थिति (Presumed Death)
महिलाओं को अतिरिक्त अधिकार दिए गए हैं जैसे – पति की उपपत्नी के साथ रहने की स्थिति में, या यदि पति ने विवाह पूर्व वादा तोड़ दिया हो।
3. आपसी सहमति से तलाक (Mutual Consent Divorce)
धारा 13B के तहत पति और पत्नी दोनों आपसी सहमति से तलाक के लिए आवेदन कर सकते हैं, यदि वे कम से कम एक वर्ष से अलग रह रहे हों और पुनर्मिलन की संभावना न हो।
इस प्रक्रिया में कोई पक्ष दूसरे को दोष नहीं देता और न्यायालय केवल यह देखता है कि सहमति स्वेच्छा से दी गई है या नहीं।
4. मुस्लिम कानून में तलाक और अधिकार
मुस्लिम कानून में तलाक धार्मिक और सामाजिक दोनों आधारों पर मान्य है। पुरुष द्वारा “तलाक”, महिला द्वारा “खुला” या “मुबारत” के रूप में विवाह विच्छेद किया जा सकता है।
2019 में मुस्लिम महिला (विवाह पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 ने Triple Talaq (तुरंत तीन तलाक) को अवैध और दंडनीय घोषित किया।
महिलाओं को ‘इद्दत अवधि’ के दौरान और उसके बाद भरण-पोषण का अधिकार दिया गया है, जैसा कि सुप्रीम कोर्ट के प्रसिद्ध मामले शाह बानो बनाम भारत संघ (1985 AIR 945) में स्थापित किया गया।
5. ईसाई और पारसी कानून के तहत तलाक
ईसाई विवाह अधिनियम, 1872 और भारतीय तलाक अधिनियम, 1869 के तहत क्रूरता, व्यभिचार, परित्याग आदि कारणों से तलाक संभव है।
पारसी विवाह और तलाक अधिनियम, 1936 के तहत भी दोनों पक्षों को समान रूप से अधिकार प्राप्त हैं, और भरण-पोषण का दावा न्यायालय में किया जा सकता है।
6. तलाक के पश्चात भरण-पोषण का अधिकार (Right to Maintenance after Divorce)
तलाक के बाद महिला और पुरुष दोनों को भरण-पोषण का अधिकार प्राप्त है।
धारा 125 दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) के अंतर्गत — यदि पत्नी अपने आप का पालन-पोषण नहीं कर सकती, तो पति को न्यायालय आदेश द्वारा भरण-पोषण देना होगा।
यह प्रावधान सभी धर्मों पर समान रूप से लागू होता है।
भरण-पोषण का उद्देश्य आर्थिक रूप से कमजोर पक्ष को जीवनयापन के लिए सहायता देना है, न कि दंड देना।
7. महिला के भरण-पोषण अधिकार (Wife’s Right to Maintenance)
महिलाओं को विवाह के दौरान, अलगाव की स्थिति में और तलाक के बाद भरण-पोषण का अधिकार प्राप्त है।
हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 24 (अंतरिम भरण-पोषण) और धारा 25 (स्थायी भरण-पोषण) इस संदर्भ में विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं।
यदि पत्नी कार्यशील नहीं है या आय का कोई साधन नहीं है, तो पति को उसकी आर्थिक सहायता करनी होती है।
सुप्रीम कोर्ट ने Kalyan Dey Chowdhury v. Rita Dey Chowdhury (2017) में कहा कि पति की आय का लगभग 25% तक भरण-पोषण के रूप में दिया जा सकता है।
8. पति के अधिकार (Husband’s Right to Maintenance)
2015 के बाद न्यायालयों ने यह स्वीकार किया है कि यदि पत्नी आर्थिक रूप से सक्षम है और पति बेरोजगार या असमर्थ है, तो पति भी भरण-पोषण का दावा कर सकता है।
धारा 24 के अंतर्गत “either spouse” शब्द का प्रयोग किया गया है, जिससे पति को भी समान अधिकार प्राप्त होते हैं।
उदाहरण के लिए, Rajnesh v. Neha (2020 SCC) में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि भरण-पोषण न्यायसंगत और दोनों पक्षों की आर्थिक स्थिति के अनुरूप होना चाहिए।
9. राजनेश बनाम नेहा (2020): एक महत्वपूर्ण निर्णय
इस ऐतिहासिक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने भरण-पोषण के निर्धारण हेतु विस्तृत दिशा-निर्देश दिए।
न्यायालय ने कहा कि –
- पति-पत्नी दोनों को अपनी आय, संपत्ति और देनदारियों की पूरी जानकारी देनी होगी।
- अंतरिम भरण-पोषण तय करने के लिए एक समान फार्मेट बनाया जाए।
- भरण-पोषण आदेशों का पालन न करने पर दंडात्मक कार्रवाई की जा सकती है।
यह निर्णय भारत में पारिवारिक न्यायालयों के लिए मील का पत्थर माना गया है।
10. तलाक और भरण-पोषण में बच्चों के अधिकार
यदि दंपत्ति के बच्चे हैं, तो उनका भरण-पोषण सर्वोपरि है।
धारा 125 CrPC और हिंदू अल्पसंख्यक और अभिभावकता अधिनियम, 1956 के तहत बच्चों को जीवन, शिक्षा, और स्वास्थ्य के लिए आर्थिक सहायता मिलती है।
न्यायालय यह सुनिश्चित करता है कि बच्चे के सर्वोत्तम हित (Best Interest of the Child) को प्राथमिकता दी जाए।
11. भरण-पोषण की अवधि और समाप्ति
भरण-पोषण तब तक दिया जाता है जब तक पत्नी पुनर्विवाह नहीं कर लेती या स्वयं अपनी आय से जीवनयापन करने में सक्षम नहीं हो जाती।
पति के लिए भी यही नियम लागू होता है यदि उसे पत्नी से सहायता मिल रही हो।
भरण-पोषण आदेश को न्यायालय परिस्थितियों के अनुसार संशोधित कर सकता है।
12. न्यायालय का दृष्टिकोण और सामाजिक परिवर्तन
न्यायालय अब पारंपरिक सोच से आगे बढ़कर समानता आधारित दृष्टिकोण अपनाने लगा है।
अब पति और पत्नी दोनों को समान आर्थिक अधिकार दिए जा रहे हैं।
भरण-पोषण को केवल “महिला सुरक्षा” का साधन नहीं बल्कि “न्यायसंगत आर्थिक संतुलन” के रूप में देखा जाने लगा है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि विवाह टूटने के बाद भी मानवीय गरिमा और जीवन का अधिकार (Article 21) दोनों पक्षों को समान रूप से प्राप्त है।
13. चुनौतियाँ और सुधार की आवश्यकता
तलाक और भरण-पोषण से जुड़े मुकदमों में सबसे बड़ी समस्या देरी और आदेशों के पालन न होने की है।
कई बार पति अपनी आय छिपाते हैं या पत्नी बढ़ा-चढ़ाकर दावा करती है।
इस स्थिति में राजनेश बनाम नेहा (2020) जैसे फैसले सुधारात्मक साबित हुए हैं।
इसके बावजूद, एक एकीकृत “पारिवारिक न्याय कोड” (Uniform Family Law) की आवश्यकता महसूस की जा रही है ताकि सभी धर्मों के लिए समान नियम लागू हो सकें।
निष्कर्ष (Conclusion)
तलाक और भरण-पोषण भारतीय कानूनी प्रणाली का संवेदनशील और आवश्यक हिस्सा हैं।
जहाँ एक ओर यह महिलाओं को आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा प्रदान करता है, वहीं दूसरी ओर यह पुरुषों के लिए भी समान अधिकार सुनिश्चित करता है।
आज न्यायालयों का दृष्टिकोण “दंड” से “न्याय और पुनर्संतुलन” की ओर अग्रसर है।
भविष्य में पारिवारिक कानूनों में समानता, पारदर्शिता और तेजी से न्याय सुनिश्चित करने के लिए डिजिटल पारिवारिक न्याय प्रणाली, समयबद्ध आदेश और वैकल्पिक विवाद निपटान तंत्र (ADR) को अपनाना आवश्यक होगा।