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‘जेल सजा नहीं बन सकती’—एनडीपीएस मामले में पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट का संवैधानिक संदेश

एनडीपीएस अधिनियम में जमानत और संविधान का अनुच्छेद 21: व्यावसायिक मात्रा के बावजूद व्यक्तिगत स्वतंत्रता की विजय लगभग 10 माह की लंबी हिरासत, एक भी गवाह की जांच नहीं—पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय का ऐतिहासिक निर्णय


मादक पदार्थों से जुड़े अपराधों को नियंत्रित करने के लिए बनाया गया नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रॉपिक सब्सटेंस एक्ट, 1985 (NDPS Act) भारत के सबसे कठोर दंडात्मक कानूनों में से एक माना जाता है। इस कानून की धारा 37 जमानत के संबंध में अत्यंत सख्त शर्तें लगाती है, विशेष रूप से तब जब मामला व्यावसायिक मात्रा (Commercial Quantity) से जुड़ा हो।

लेकिन हाल ही में पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण और दूरगामी निर्णय देते हुए यह स्पष्ट किया है कि—

“जब अभियुक्त लंबे समय से हिरासत में है, मुकदमे में कोई प्रगति नहीं हुई है और एक भी गवाह की जांच नहीं हुई है, तब संविधान का अनुच्छेद 21, एनडीपीएस अधिनियम की धारा 37 पर हावी होगा।”

इस आधार पर उच्च न्यायालय ने व्यावसायिक मात्रा के गंभीर आरोपों के बावजूद अभियुक्त को जमानत प्रदान की। यह निर्णय न केवल एनडीपीएस कानून की व्याख्या में नया आयाम जोड़ता है, बल्कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता, त्वरित न्याय और मानवाधिकारों की संवैधानिक अवधारणा को भी सुदृढ़ करता है।


1. मामले की पृष्ठभूमि: आरोप, हिरासत और जमानत याचिका

प्रस्तुत मामले में अभियुक्त के विरुद्ध एनडीपीएस अधिनियम के अंतर्गत मामला दर्ज किया गया था। पुलिस का आरोप था कि अभियुक्त के कब्जे से व्यावसायिक मात्रा में मादक पदार्थ बरामद हुआ है।

मामले के प्रमुख तथ्य इस प्रकार थे—

  • अभियुक्त लगभग 10 महीनों से न्यायिक हिरासत में था
  • चार्जशीट दाखिल होने के बावजूद
  • आज तक एक भी गवाह की जांच नहीं हुई थी
  • ट्रायल वस्तुतः प्रारंभ ही नहीं हुआ था
  • अभियोजन की ओर से मुकदमे में प्रगति का कोई स्पष्ट संकेत नहीं था

इन परिस्थितियों में अभियुक्त ने यह तर्क देते हुए नियमित जमानत की मांग की कि उसकी हिरासत अब दंडात्मक स्वरूप ले चुकी है, जो संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है।


2. एनडीपीएस अधिनियम की धारा 37: जमानत पर कानूनी अवरोध

एनडीपीएस अधिनियम की धारा 37 को जमानत के संदर्भ में “नॉन-ऑब्स्टेंटे क्लॉज” माना जाता है। इसका अर्थ है कि यह सामान्य आपराधिक कानूनों से ऊपर प्रभाव रखती है।

धारा 37 के अनुसार—

  • यदि मामला व्यावसायिक मात्रा से जुड़ा हो
  • तो जमानत तभी दी जा सकती है जब न्यायालय यह संतुष्ट हो कि:
    1. अभियुक्त प्रथम दृष्टया दोषी नहीं है, और
    2. अभियुक्त जमानत पर रहते हुए कोई अपराध नहीं करेगा

व्यावहारिक रूप से, इन शर्तों को पूरा करना अभियुक्त के लिए अत्यंत कठिन होता है। यही कारण है कि एनडीपीएस मामलों में जमानत को अपवाद माना जाता है।


3. संविधान का अनुच्छेद 21: जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का आधार

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 प्रत्येक व्यक्ति को यह मौलिक अधिकार देता है कि—

“किसी व्यक्ति को उसके जीवन या व्यक्तिगत स्वतंत्रता से वंचित नहीं किया जाएगा, सिवाय विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार।”

सुप्रीम कोर्ट ने समय-समय पर यह स्पष्ट किया है कि—

  • त्वरित न्याय (Speedy Trial)
  • अनिश्चितकालीन हिरासत से मुक्ति
  • निष्पक्ष प्रक्रिया

अनुच्छेद 21 के अभिन्न अंग हैं। यदि कोई व्यक्ति वर्षों तक बिना ट्रायल के जेल में रखा जाता है, तो यह संवैधानिक अधिकारों का स्पष्ट उल्लंघन है।


4. हाईकोर्ट का विश्लेषण: हिरासत बनाम न्याय

पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने मामले के तथ्यों का गहन विश्लेषण करते हुए कहा—

  • अभियुक्त लगभग 10 महीने से जेल में है
  • अभियोजन एक भी गवाह पेश करने में विफल रहा है
  • ट्रायल के शीघ्र समाप्त होने की कोई वास्तविक संभावना नहीं है
  • अभियुक्त को इस स्थिति में जेल में बनाए रखना न्याय नहीं, बल्कि दंड के समान है

न्यायालय ने स्पष्ट किया कि—

“कानून की कठोरता का उद्देश्य अपराध को रोकना है, न कि अभियुक्त को बिना दोष सिद्ध हुए दंडित करना।”


5. अनुच्छेद 21 बनाम धारा 37: संवैधानिक सर्वोच्चता

यह निर्णय इसलिए ऐतिहासिक है क्योंकि इसमें अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा कि—

  • जब धारा 37 एनडीपीएस और
  • अनुच्छेद 21 के बीच टकराव उत्पन्न हो

तो संविधान की सर्वोच्चता को प्राथमिकता दी जाएगी।

अदालत ने माना कि यदि अभियुक्त की हिरासत लंबी और अनिश्चित हो जाए तथा ट्रायल आगे न बढ़े, तो धारा 37 की कठोरता स्वतः शिथिल हो जाती है।


6. “जमानत नियम है, जेल अपवाद”: एनडीपीएस के संदर्भ में

सामान्य आपराधिक कानून में यह स्थापित सिद्धांत है कि—

“Bail is the rule, jail is the exception.”

हालाँकि एनडीपीएस मामलों में इस सिद्धांत का प्रयोग सीमित है, फिर भी उच्च न्यायालय ने कहा कि—

  • जमानत से इंकार करना पूर्व-दंड का रूप नहीं ले सकता
  • यदि अभियोजन स्वयं मुकदमा आगे नहीं बढ़ा पा रहा है, तो अभियुक्त को जेल में रखना अनुचित है

इस प्रकार, अदालत ने इस सिद्धांत को संवैधानिक परिप्रेक्ष्य में पुनर्जीवित किया।


7. अभियोजन की निष्क्रियता: गंभीर न्यायिक टिप्पणी

हाईकोर्ट ने अभियोजन की भूमिका पर भी गंभीर सवाल उठाए—

  • 10 महीनों में एक भी गवाह का परीक्षण नहीं
  • देरी के लिए कोई ठोस कारण प्रस्तुत नहीं
  • ट्रायल को गति देने के लिए कोई सक्रिय प्रयास नहीं

न्यायालय ने स्पष्ट किया कि—

“राज्य की निष्क्रियता का दुष्परिणाम अभियुक्त की स्वतंत्रता पर नहीं डाला जा सकता।”


8. एनडीपीएस मामलों में इस फैसले का व्यापक प्रभाव

यह निर्णय भविष्य में एनडीपीएस अधिनियम के तहत जमानत से संबंधित मामलों में मील का पत्थर साबित हो सकता है—

  • लंबी हिरासत वाले मामलों में अदालतें अधिक संवेदनशील होंगी
  • अभियोजन पर समयबद्ध ट्रायल का दबाव बढ़ेगा
  • निचली अदालतों को भी अनुच्छेद 21 के सिद्धांत को ध्यान में रखना होगा
  • “केवल व्यावसायिक मात्रा” जमानत से इंकार का एकमात्र आधार नहीं रहेगा

9. समाज बनाम व्यक्ति: संतुलन का प्रश्न

अदालत ने यह भी स्वीकार किया कि—

  • नशे के विरुद्ध सख्त कानून आवश्यक हैं
  • समाज को मादक पदार्थों से बचाना राज्य का दायित्व है

लेकिन साथ ही यह भी कहा कि—

  • किसी निर्दोष या अपरीक्षित व्यक्ति को वर्षों तक जेल में रखना समाधान नहीं है
  • न्याय का उद्देश्य संतुलन है, न कि केवल दमन

10. मानवाधिकार और आपराधिक न्याय प्रणाली

यह निर्णय इस तथ्य को रेखांकित करता है कि—

  • मानवाधिकार कोई विलासिता नहीं
  • बल्कि आपराधिक न्याय प्रणाली का मूल आधार हैं

लंबी हिरासत, विलंबित ट्रायल और अभियोजन की लापरवाही—ये सभी मानवाधिकार उल्लंघन के रूप में देखे जाने चाहिए।


11. निष्कर्ष: कठोर कानून भी संविधान से नीचे

पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय का यह फैसला एक स्पष्ट संदेश देता है कि—

“कठोर से कठोर कानून भी संविधान से ऊपर नहीं हो सकता।”

लगभग 10 माह की हिरासत, एक भी गवाह की जांच नहीं और ट्रायल में पूर्ण ठहराव—इन परिस्थितियों में जमानत देना न केवल न्यायसंगत था, बल्कि संविधान की आत्मा के अनुरूप भी था।

यह निर्णय एनडीपीएस अधिनियम के कठोर ढांचे में मानवीय दृष्टिकोण और संवैधानिक विवेक की पुनर्स्थापना करता है और यह स्थापित करता है कि—

व्यक्तिगत स्वतंत्रता, राज्य की निष्क्रियता की बलि नहीं चढ़ाई जा सकती।