चुनाव बनाम शिक्षा: लोकतांत्रिक प्रक्रिया की मर्यादा और छात्रों का शिक्षा का अधिकार — विश्वविद्यालयों व कॉलेजों को मतदान केंद्र बनाने से परहेज़ पर राजस्थान हाईकोर्ट की ऐतिहासिक टिप्पणी
भारतीय लोकतंत्र में चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन का माध्यम नहीं, बल्कि संविधान में निहित जन–सार्वभौमिकता का जीवंत उत्सव हैं। वहीं दूसरी ओर, शिक्षा वह आधार है जिस पर राष्ट्र का भविष्य, सामाजिक चेतना और संवैधानिक मूल्यों की समझ टिकी होती है। जब ये दोनों महत्वपूर्ण क्षेत्र—चुनाव और शिक्षा—एक ही समय व स्थान पर टकराते हैं, तो संवैधानिक संतुलन की आवश्यकता सबसे अधिक महसूस होती है। इसी संतुलन को रेखांकित करते हुए राजस्थान हाईकोर्ट ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की है कि विश्वविद्यालयों और कॉलेजों को मतदान केंद्र अथवा चुनावी कार्यों के लिए उपयोग करने से यथासंभव बचा जाना चाहिए, क्योंकि इससे शैक्षणिक गतिविधियाँ बाधित होती हैं और छात्रों के निर्बाध शिक्षा के अधिकार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
पृष्ठभूमि और मामला
राजस्थान हाईकोर्ट के समक्ष प्रस्तुत याचिका में यह प्रश्न उठाया गया था कि बार–बार विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों को चुनावी ड्यूटी, मतदान केंद्र, मतगणना स्थल या प्रशासनिक चुनाव कार्यों के लिए अधिगृहीत किया जाता है, जिसके कारण कक्षाएँ स्थगित करनी पड़ती हैं, परीक्षाएँ टल जाती हैं और छात्रों का शैक्षणिक कैलेंडर प्रभावित होता है। याचिकाकर्ता का तर्क था कि यह स्थिति केवल असुविधा तक सीमित नहीं, बल्कि संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत निहित जीवन और गरिमा के अधिकार, तथा शिक्षा से जुड़े अधिकारों का उल्लंघन है।
न्यायालय की प्रमुख टिप्पणियाँ
राजस्थान हाईकोर्ट ने चुनाव आयोग को निर्देशात्मक टिप्पणी करते हुए कहा कि—
- चुनाव लोकतंत्र के लिए अनिवार्य हैं, लेकिन उन्हें इस प्रकार संचालित किया जाना चाहिए कि शैक्षणिक संस्थानों का मूल उद्देश्य प्रभावित न हो।
- विश्वविद्यालय और कॉलेज ज्ञान के मंदिर हैं, न कि प्रशासनिक सुविधा केंद्र।
- छात्रों का निर्बाध शिक्षा पाने का अधिकार किसी भी प्रशासनिक आवश्यकता से कमतर नहीं आंका जा सकता।
- चुनाव आयोग और राज्य प्रशासन को वैकल्पिक स्थानों—जैसे सामुदायिक भवन, पंचायत भवन, सरकारी कार्यालय या अन्य सार्वजनिक स्थल—का अधिकाधिक उपयोग करना चाहिए।
शिक्षा का अधिकार: संवैधानिक और मानवीय दृष्टिकोण
हालाँकि संविधान का अनुच्छेद 21A 6 से 14 वर्ष के बच्चों के लिए शिक्षा के अधिकार की गारंटी देता है, लेकिन उच्च शिक्षा भी अनुच्छेद 21 के व्यापक दायरे में आती है, जहाँ जीवन का अर्थ केवल जीवित रहना नहीं, बल्कि गरिमा, विकास और अवसरों से युक्त जीवन है। उच्च शिक्षा संस्थानों में बार–बार चुनावी हस्तक्षेप छात्रों के अध्ययन, शोध, प्रयोगशालाओं, पुस्तकालयों और शैक्षणिक संवाद को बाधित करता है।
न्यायालय ने अप्रत्यक्ष रूप से यह भी स्वीकार किया कि शिक्षा का वातावरण निरंतरता और अनुशासन पर आधारित होता है। जब महीनों पहले से तय सेमेस्टर, परीक्षाएँ और प्रोजेक्ट अचानक चुनावी कारणों से स्थगित होते हैं, तो इसका मनोवैज्ञानिक और अकादमिक प्रभाव छात्रों पर पड़ता है।
चुनाव आयोग की भूमिका और जिम्मेदारी
चुनाव आयोग को संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत व्यापक शक्तियाँ प्राप्त हैं, लेकिन ये शक्तियाँ निरंकुश नहीं, बल्कि संवैधानिक नैतिकता और संतुलन के अधीन हैं। राजस्थान हाईकोर्ट की टिप्पणी यह स्पष्ट करती है कि चुनाव आयोग को अपनी प्रशासनिक सुविधा से आगे बढ़कर सार्वजनिक हित और मौलिक अधिकारों के बीच संतुलन बनाना होगा।
अदालत ने यह नहीं कहा कि विश्वविद्यालयों का उपयोग पूर्णतः प्रतिबंधित किया जाए, बल्कि यह कहा कि “जहाँ तक संभव हो” उनसे परहेज़ किया जाए। यह लचीलापन प्रशासनिक वास्तविकताओं को स्वीकार करता है, लेकिन साथ ही शिक्षा को प्राथमिकता देता है।
पूर्व न्यायिक दृष्टांत और व्यापक परिप्रेक्ष्य
भारत के विभिन्न उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय ने समय–समय पर यह कहा है कि—
- प्रशासनिक कार्यों के लिए शैक्षणिक संस्थानों का अत्यधिक उपयोग अनुचित है।
- छात्रों को “आकस्मिक व्यवस्था” का शिकार नहीं बनाया जा सकता।
- शिक्षा केवल सेवा नहीं, बल्कि राज्य का दायित्व है।
राजस्थान हाईकोर्ट की यह टिप्पणी उसी न्यायिक परंपरा की अगली कड़ी है, जो राज्य की हर कार्रवाई को मौलिक अधिकारों की कसौटी पर परखती है।
सामाजिक और नीतिगत प्रभाव
इस फैसले का प्रभाव केवल राजस्थान तक सीमित नहीं रहेगा। यह निर्णय—
- अन्य राज्यों के लिए मार्गदर्शक सिद्धांत बनेगा।
- चुनाव आयोग को दीर्घकालिक योजना बनाने के लिए प्रेरित करेगा।
- शिक्षा विभाग और विश्वविद्यालय प्रशासन को भी अपने अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति सजग बनाएगा।
इसके अतिरिक्त, यह निर्णय यह भी संकेत देता है कि लोकतंत्र केवल मतदान तक सीमित नहीं, बल्कि उन संस्थाओं की रक्षा भी है जो लोकतांत्रिक चेतना को जन्म देती हैं—और शिक्षा उन्हीं में से एक है।
छात्रों के दृष्टिकोण से निर्णय का महत्व
छात्र केवल मतदाता नहीं, बल्कि राष्ट्र के भावी नागरिक, नीति–निर्माता और विचारक हैं। जब उनके शैक्षणिक जीवन में बार–बार व्यवधान आता है, तो इसका प्रभाव दीर्घकालिक होता है। राजस्थान हाईकोर्ट का यह रुख छात्रों को यह विश्वास देता है कि न्यायपालिका उनकी आवाज़ को समझती है और उनके हितों की रक्षा के लिए तत्पर है।
निष्कर्ष
राजस्थान हाईकोर्ट की यह टिप्पणी एक साधारण प्रशासनिक सुझाव नहीं, बल्कि संवैधानिक संतुलन का घोष है। यह निर्णय याद दिलाता है कि लोकतंत्र और शिक्षा परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। चुनाव लोकतंत्र की प्रक्रिया हैं, और शिक्षा लोकतंत्र की आत्मा। जब आत्मा को आघात पहुँचता है, तो प्रक्रिया भी खोखली हो जाती है।
अतः विश्वविद्यालयों और कॉलेजों को मतदान केंद्र बनाने से यथासंभव बचना न केवल प्रशासनिक विवेक का प्रश्न है, बल्कि यह संवैधानिक कर्तव्य, सामाजिक दायित्व और मानवीय संवेदनशीलता का विषय भी है। राजस्थान हाईकोर्ट का यह दृष्टिकोण भविष्य में एक अधिक संतुलित, संवेदनशील और अधिकार–सम्मत चुनावी व्यवस्था की नींव रखता है—जहाँ लोकतंत्र मजबूत हो, और शिक्षा निर्बाध।