IndianLawNotes.com

चिकित्सकीय लापरवाही पर बड़ा फैसला: पश्चिम बंगाल क्लिनिकल एस्टैब्लिशमेंट्स आयोग को मुआवजा देने का अधिकार — सुप्रीम कोर्ट

चिकित्सकीय लापरवाही और रोगी अधिकारों की न्यायिक सुरक्षा: ‘पश्चिम बंगाल क्लिनिकल एस्टैब्लिशमेंट्स अधिनियम, 2017’ के तहत गठित आयोग को रोगी सेवा में कमी पर निर्णय एवं मुआवजा देने का अधिकार — सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला


भूमिका

        भारत में स्वास्थ्य सेवा (Healthcare) केवल एक व्यवसाय नहीं, बल्कि जीवन और गरिमा से जुड़ा हुआ एक संवेदनशील क्षेत्र है। जब कोई रोगी किसी चिकित्सक या अस्पताल के पास जाता है, तो वह केवल इलाज ही नहीं, बल्कि विश्वास और सुरक्षा भी सौंपता है। किंतु, जब इस सेवा में लापरवाही होती है, तो परिणाम केवल आर्थिक नहीं, बल्कि शारीरिक, मानसिक और कभी-कभी अपूरणीय क्षति के रूप में सामने आते हैं।

       इसी पृष्ठभूमि में सुप्रीम कोर्ट का हालिया निर्णय अत्यंत महत्वपूर्ण है, जिसमें यह स्पष्ट किया गया कि पश्चिम बंगाल क्लिनिकल एस्टैब्लिशमेंट्स अधिनियम, 2017 के तहत गठित आयोग (Commission) को न केवल रोगी सेवा में कमी (Deficiency in Patient Care Service) का निर्णय करने का अधिकार है, बल्कि वह मुआवजा (Compensation) भी प्रदान कर सकता है।

यह फैसला चिकित्सकीय लापरवाही के मामलों में रोगियों के अधिकारों को मजबूत करने वाला एक मील का पत्थर है।


चिकित्सकीय लापरवाही की अवधारणा

चिकित्सकीय लापरवाही क्या है?

चिकित्सकीय लापरवाही वह स्थिति है जब—

  • कोई चिकित्सक, नर्सिंग स्टाफ या अस्पताल
  • अपने पेशेगत कर्तव्य (Duty of Care) का
  • उचित मानकों के अनुरूप पालन नहीं करता

और इसके परिणामस्वरूप रोगी को क्षति होती है।

सुप्रीम कोर्ट के अनुसार—

“चिकित्सकीय लापरवाही का निर्धारण इस बात पर निर्भर करता है कि क्या चिकित्सा पेशेवर ने वह सावधानी बरती, जो समान परिस्थितियों में एक सामान्य दक्ष चिकित्सक से अपेक्षित थी।”


West Bengal Clinical Establishments Act, 2017: एक परिचय

पश्चिम बंगाल क्लिनिकल एस्टैब्लिशमेंट्स अधिनियम, 2017 का उद्देश्य है—

  • निजी एवं सरकारी अस्पतालों का विनियमन
  • रोगियों के अधिकारों की रक्षा
  • चिकित्सा सेवाओं में पारदर्शिता सुनिश्चित करना

इस अधिनियम के अंतर्गत—

  • एक Clinical Establishments Regulatory Commission की स्थापना की गई
  • आयोग को अस्पतालों एवं क्लिनिकों के विरुद्ध शिकायतें सुनने का अधिकार दिया गया

विवाद का मूल प्रश्न

विवाद इस प्रश्न पर केंद्रित था कि—

क्या अधिनियम के तहत गठित आयोग को केवल प्रशासनिक/नियामक शक्तियाँ प्राप्त हैं, या वह रोगी सेवा में कमी का निर्णय करते हुए मुआवजा भी दे सकता है?

कुछ अस्पतालों और चिकित्सकीय संस्थानों का तर्क था कि—

  • मुआवजा देने का अधिकार केवल
    • सिविल कोर्ट
    • उपभोक्ता आयोग
    • या उच्च न्यायालयों
      के पास है।

सुप्रीम कोर्ट के समक्ष मामला

सुप्रीम कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत मामले में—

  • रोगी ने चिकित्सा सेवा में गंभीर कमी का आरोप लगाया
  • राज्य आयोग ने अस्पताल को दोषी ठहराते हुए
    मुआवजा देने का निर्देश दिया

इस आदेश को यह कहते हुए चुनौती दी गई कि—

  • आयोग के पास मुआवजा देने का अधिकार नहीं है
  • यह अधिकार क्षेत्र (Jurisdiction) से परे है

सुप्रीम कोर्ट का निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि—

“West Bengal Clinical Establishments Act, 2017 के तहत गठित आयोग को रोगी सेवा में कमी का निर्धारण करने और उपयुक्त मुआवजा प्रदान करने का पूर्ण अधिकार है।”

न्यायालय ने यह भी कहा कि—

  • अधिनियम की व्याख्या संकीर्ण (Narrow) नहीं
  • बल्कि उद्देश्यपरक (Purposive Interpretation) की जानी चाहिए

रोगी सेवा में कमी (Deficiency in Patient Care Service)

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि—

  • रोगी सेवा केवल इलाज तक सीमित नहीं
  • बल्कि इसमें शामिल हैं—
    • सही निदान
    • समय पर उपचार
    • आवश्यक चिकित्सा सुविधाएँ
    • पारदर्शी शुल्क
    • और गरिमामय व्यवहार

यदि इनमें से किसी भी तत्व में कमी हो, तो वह Deficiency in Patient Care मानी जाएगी।


आयोग को मुआवजा देने का अधिकार क्यों?

न्यायालय ने निम्न आधारों पर आयोग के अधिकार को सही ठहराया—

1. अधिनियम का उद्देश्य

अधिनियम का मूल उद्देश्य रोगियों की सुरक्षा है। यदि आयोग केवल दोष तय करे और मुआवजा न दे सके, तो कानून निष्प्रभावी हो जाएगा।

2. त्वरित और सुलभ न्याय

रोगियों को वर्षों तक सिविल कोर्ट में भटकने से बचाने के लिए आयोग को प्रभावी शक्तियाँ दी गई हैं।

3. न्यायपूर्ण प्रतिकर (Just Compensation)

जहाँ अधिकार का उल्लंघन हुआ है, वहाँ प्रतिकर देना न्याय का अभिन्न अंग है।


उपभोक्ता संरक्षण कानून से तुलना

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि—

  • चिकित्सा सेवा पहले ही Consumer Protection Act के अंतर्गत आती है
  • जब उपभोक्ता आयोग मुआवजा दे सकता है,
  • तो राज्य द्वारा गठित विशेष आयोग को इससे वंचित नहीं किया जा सकता

दोनों कानून सह-अस्तित्व (Co-exist) में कार्य कर सकते हैं।


चिकित्सकीय पेशे पर प्रभाव

यह निर्णय—

  • चिकित्सकों को
    • अधिक जवाबदेह
    • और सावधान
      बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण है।

न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि—

यह फैसला ईमानदार और दक्ष डॉक्टरों के विरुद्ध नहीं, बल्कि लापरवाह चिकित्सा सेवाओं के विरुद्ध है।


अस्पतालों और क्लिनिकों की जिम्मेदारी

अब अस्पतालों को—

  • रिकॉर्ड संधारण
  • रोगी से स्पष्ट संवाद
  • और मानक प्रोटोकॉल का पालन

और अधिक गंभीरता से करना होगा, क्योंकि आयोग के समक्ष उनकी सीधी जवाबदेही होगी।


संवैधानिक परिप्रेक्ष्य

यह निर्णय—

  • अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार)
  • और स्वास्थ्य के अधिकार

को सुदृढ़ करता है।

सुप्रीम कोर्ट पहले ही कह चुका है कि—

स्वास्थ्य का अधिकार, जीवन के अधिकार का अभिन्न अंग है।


न्यायिक दृष्टांतों की निरंतरता

यह फैसला—

  • चिकित्सकीय लापरवाही पर
  • रोगी-केंद्रित न्याय
    की दिशा में सुप्रीम कोर्ट की निरंतर सोच को दर्शाता है।

संभावित प्रभाव और भविष्य

इस निर्णय के बाद—

  • अन्य राज्यों में भी
    • समान अधिनियमों के अंतर्गत
    • आयोगों की शक्तियों को
      व्यापक रूप से समझा जाएगा
  • रोगियों का न्याय प्रणाली पर विश्वास बढ़ेगा

निष्कर्ष

सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय स्पष्ट करता है कि—

  • स्वास्थ्य सेवा में लापरवाही को
    अब केवल तकनीकी बहानों से
    नजरअंदाज नहीं किया जा सकता

West Bengal Clinical Establishments Act, 2017 के तहत गठित आयोग—

  • रोगी सेवा में कमी का निर्णय कर सकता है
  • और उपयुक्त मुआवजा भी प्रदान कर सकता है

यह फैसला—

रोगी अधिकारों की जीत और चिकित्सकीय जवाबदेही की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है।


यह निर्णय स्पष्ट संदेश देता है कि चिकित्सा सेवा में लापरवाही अब केवल नैतिक नहीं, बल्कि कानूनी दायित्व भी है।