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चिकित्सकीय आयु निर्धारण में त्रुटि की संभावना को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता: ‘किशोर को वयस्क की तरह नहीं माना जा सकता’ — सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला

चिकित्सकीय आयु निर्धारण में त्रुटि की संभावना को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता: ‘किशोर को वयस्क की तरह नहीं माना जा सकता’ — गणेश यादव की रिहाई का आदेश, सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला


भूमिका

       भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली में किशोर न्याय (Juvenile Justice) एक संवेदनशील और मानवाधिकार–केंद्रित अवधारणा है। इसका मूल उद्देश्य दंडात्मक दृष्टिकोण के बजाय सुधारात्मक और पुनर्वासात्मक न्याय को बढ़ावा देना है। सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में गणेश यादव के मामले में एक अत्यंत महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए यह स्पष्ट कर दिया कि चिकित्सकीय परीक्षण द्वारा आयु निर्धारण करते समय त्रुटि की गुंजाइश (Margin of Error) को अनदेखा नहीं किया जा सकता और यदि आरोपी किशोर पाया जाता है, तो उसे वयस्क की भांति दंडित नहीं किया जा सकता

        यह फैसला न केवल किशोर न्याय अधिनियम की भावना को पुष्ट करता है, बल्कि न्यायालयों और जांच एजेंसियों के लिए एक स्पष्ट दिशानिर्देश भी स्थापित करता है।


मामले की पृष्ठभूमि

गणेश यादव पर एक गंभीर आपराधिक आरोप लगाया गया था और उसे लंबे समय से कारावास में रखा गया था। मुकदमे के दौरान सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह उठा कि—

अपराध की तिथि पर गणेश यादव की आयु क्या थी?

राज्य का तर्क था कि—

  • चिकित्सकीय परीक्षण (Medical Age Determination Test) के आधार पर
  • गणेश यादव को वयस्क माना जाना चाहिए

जबकि बचाव पक्ष ने यह दलील दी कि—

  • चिकित्सकीय परीक्षण पूर्णतः सटीक नहीं होते
  • उनमें ±1 से 2 वर्ष तक की त्रुटि की संभावना रहती है
  • और संदेह की स्थिति में लाभ आरोपी को मिलना चाहिए

सुप्रीम कोर्ट के समक्ष मुख्य कानूनी प्रश्न

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के समक्ष निम्नलिखित प्रमुख प्रश्न थे—

  1. क्या चिकित्सकीय परीक्षण द्वारा निर्धारित आयु को अंतिम और निर्णायक माना जा सकता है?
  2. क्या आयु निर्धारण में Margin of Error को नजरअंदाज किया जा सकता है?
  3. यदि आरोपी किशोर होने की श्रेणी में आता है, तो क्या उसे वयस्क के रूप में दंडित किया जा सकता है?

सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट और सशक्त दृष्टिकोण

सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में दो टूक शब्दों में कहा—

“चिकित्सकीय आयु निर्धारण परीक्षण अनुमान पर आधारित होते हैं और इनमें त्रुटि की गुंजाइश रहती है। ऐसे में किसी व्यक्ति को केवल मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर वयस्क मान लेना न्यायसंगत नहीं है।”

न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि—

“किशोर को वयस्क की तरह दंडित करना न केवल कानून के विपरीत है, बल्कि यह संविधान के अनुच्छेद 21 में निहित गरिमा और निष्पक्षता के सिद्धांतों का भी उल्लंघन है।”


चिकित्सकीय परीक्षण और उसकी सीमाएँ

मेडिकल एज डिटर्मिनेशन क्या है?

जब जन्म प्रमाण पत्र, स्कूल रिकॉर्ड या अन्य दस्तावेज उपलब्ध नहीं होते, तब—

  • हड्डियों का एक्स-रे
  • दंत परीक्षण
  • शारीरिक विकास का आकलन

के माध्यम से आयु का अनुमान लगाया जाता है।

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

न्यायालय ने माना कि—

  • ये परीक्षण Exact Science नहीं हैं
  • इनमें ±1 या ±2 वर्ष तक का अंतर संभव है
  • इसलिए इन्हें केवल सहायक साक्ष्य माना जाना चाहिए, न कि निर्णायक

किशोर न्याय अधिनियम, 2015 की भूमिका

Juvenile Justice (Care and Protection of Children) Act, 2015 का उद्देश्य है—

  • बच्चों को अपराधी नहीं, बल्कि सुधार योग्य व्यक्ति के रूप में देखना
  • कठोर दंड के बजाय पुनर्वास और सुधार पर जोर देना

अधिनियम की धारा 94 स्पष्ट करती है कि—

  • आयु निर्धारण में दस्तावेजी साक्ष्य को प्राथमिकता दी जाएगी
  • चिकित्सकीय परीक्षण अंतिम विकल्प होगा

संदेह का लाभ (Benefit of Doubt) का सिद्धांत

सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि—

“यदि आरोपी की आयु को लेकर संदेह है, तो उस संदेह का लाभ आरोपी को दिया जाना चाहिए, विशेषकर तब जब मामला किशोर न्याय से जुड़ा हो।”

यह सिद्धांत—

  • आपराधिक न्याय प्रणाली की आत्मा
  • और मानवाधिकार संरक्षण का मूल आधार
    है।

गणेश यादव की रिहाई का आदेश

इन सभी तथ्यों और विधिक सिद्धांतों के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने—

  • गणेश यादव को किशोर माना
  • यह कहा कि उसे वयस्क के रूप में निरुद्ध रखना अवैध है
  • और तत्काल रिहाई का आदेश दिया

न्यायालय ने यह भी माना कि—

  • गणेश यादव ने पहले ही किशोर न्याय अधिनियम के तहत निर्धारित अधिकतम अवधि से अधिक समय हिरासत में बिता दिया है

संवैधानिक परिप्रेक्ष्य

यह निर्णय सीधे तौर पर—

  • अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार)
  • अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता)

से जुड़ा हुआ है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि—

कानून की प्रक्रिया ऐसी नहीं होनी चाहिए जो किसी किशोर को उसके अधिकारों से वंचित कर दे।


न्यायिक दृष्टांतों की निरंतरता

यह फैसला पूर्व के अनेक निर्णयों के अनुरूप है, जहाँ सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि—

  • किशोर न्याय कानून की व्याख्या
    उदार और मानवोचित होनी चाहिए
  • तकनीकी या संकीर्ण दृष्टिकोण से
    बच्चों के भविष्य को नष्ट नहीं किया जा सकता

जांच एजेंसियों और निचली अदालतों के लिए संदेश

इस निर्णय से यह स्पष्ट संदेश जाता है कि—

  1. आयु निर्धारण में दस्तावेजों की गंभीरता से जांच की जाए
  2. चिकित्सकीय परीक्षण को अंतिम सत्य न माना जाए
  3. किशोर न्याय अधिनियम की भावना का पालन किया जाए

समाज और न्याय व्यवस्था पर प्रभाव

यह निर्णय—

  • बाल अधिकारों को मजबूती देता है
  • न्याय व्यवस्था में मानवीय दृष्टिकोण को बढ़ावा देता है
  • और यह सुनिश्चित करता है कि कोई भी किशोर
    प्रणाली की कठोरता का शिकार न बने

आलोचनात्मक दृष्टि

हालाँकि कुछ लोग यह तर्क दे सकते हैं कि—

  • गंभीर अपराधों में कठोर रुख आवश्यक है

लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि—

कानून की अवहेलना कर कठोरता अपनाना न्याय नहीं है।


निष्कर्ष

        गणेश यादव की रिहाई से संबंधित सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय किशोर न्याय प्रणाली में एक मील का पत्थर है। यह फैसला स्पष्ट करता है कि—

  • चिकित्सकीय आयु निर्धारण अंतिम सत्य नहीं
  • किशोर को वयस्क की तरह दंडित करना असंवैधानिक
  • और संदेह की स्थिति में न्याय, करुणा के पक्ष में होना चाहिए

यह निर्णय न्याय की आत्मा को तकनीकीता पर प्राथमिकता देता है।