घरेलू हिंसा क्या है? घर की चारदीवारी के भीतर होने वाला अत्याचार, पीड़िता के अधिकार और घरेलू हिंसा अधिनियम, 2005 के अंतर्गत संपूर्ण कानूनी संरक्षण
भूमिका: जब घर ही सुरक्षित न रहे
“घर” शब्द सुनते ही सुरक्षा, अपनापन और विश्वास का भाव आता है। परंतु सच्चाई यह है कि भारत में बड़ी संख्या में महिलाएँ, बच्चे और कभी-कभी बुज़ुर्ग भी अपने ही घर में हिंसा और उत्पीड़न का सामना करते हैं। यह हिंसा अक्सर चुप्पी, डर, सामाजिक दबाव और बदनामी के भय के कारण छिपी रह जाती है।
इसी वास्तविकता को ध्यान में रखते हुए भारत सरकार ने घरेलू हिंसा अधिनियम, 2005 (Protection of Women from Domestic Violence Act – PWDVA) लागू किया, ताकि पीड़िता को तुरंत सुरक्षा, रहने का अधिकार, आर्थिक सहायता और न्याय मिल सके।
घरेलू हिंसा की परिभाषा: कानून क्या कहता है?
घरेलू हिंसा का अर्थ केवल मारपीट नहीं है। कानून के अनुसार:
घर के भीतर या घरेलू संबंध में रहते हुए किसी महिला के साथ किया गया ऐसा कोई भी कार्य, आचरण या चूक, जो उसके शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक, आर्थिक या यौन स्वास्थ्य को नुकसान पहुँचाए — घरेलू हिंसा है।
यह हिंसा पति-पत्नी तक सीमित नहीं, बल्कि किसी भी घरेलू संबंध में हो सकती है, जैसे:
- सास–बहू
- देवर–भाभी
- पिता-पुत्री
- भाई-बहन
- या लिव-इन रिलेशनशिप
घरेलू हिंसा के प्रमुख प्रकार
घरेलू हिंसा अधिनियम चार मुख्य प्रकार की हिंसा को मान्यता देता है:
शारीरिक हिंसा (Physical Violence)
यह सबसे प्रत्यक्ष और पहचाने जाने वाला रूप है।
इसमें शामिल हैं:
- थप्पड़, मुक्का, लात मारना
- बाल पकड़कर घसीटना
- धक्का देना
- किसी वस्तु या हथियार से चोट पहुँचाना
- जलाना या जलाने की धमकी
महत्वपूर्ण बात यह है कि चोट का स्थायी निशान होना आवश्यक नहीं, दर्द पहुँचाना या डर पैदा करना भी पर्याप्त है।
मानसिक और भावनात्मक हिंसा (Mental & Emotional Abuse)
यह हिंसा दिखाई नहीं देती, लेकिन इसका प्रभाव सबसे गहरा और लंबे समय तक रहने वाला होता है।
इसके उदाहरण:
- गाली-गलौज
- बार-बार अपमान
- चरित्र पर शक
- मायके से रिश्ते तोड़ने का दबाव
- बच्चों को छीन लेने की धमकी
- लगातार डर और तनाव में रखना
अदालतें मानती हैं कि लगातार मानसिक उत्पीड़न भी गंभीर हिंसा है।
आर्थिक हिंसा (Economic Abuse)
आर्थिक नियंत्रण भी घरेलू हिंसा का एक प्रमुख रूप है।
इसमें शामिल हैं:
- खर्च के पैसे न देना
- पति की कमाई पर पूरा नियंत्रण
- महिला को नौकरी करने से रोकना
- उसके गहने, नकदी या संपत्ति छीन लेना
- बैंक खाते या दस्तावेज़ अपने पास रखना
कानून मानता है कि आर्थिक निर्भरता का दुरुपयोग भी अत्याचार है।
यौन हिंसा (Sexual Abuse)
यह विषय संवेदनशील है, लेकिन अत्यंत महत्वपूर्ण भी।
इसमें शामिल हैं:
- महिला की इच्छा के विरुद्ध शारीरिक संबंध
- अप्राकृतिक या अपमानजनक यौन कृत्य
- यौन संबंध के लिए दबाव या धमकी
विवाह का अर्थ यह नहीं कि महिला की सहमति महत्वहीन हो जाए।
दहेज और घरेलू हिंसा का संबंध
दहेज माँगना और दहेज के लिए प्रताड़ित करना घरेलू हिंसा का गंभीर रूप है।
इसके उदाहरण:
- शादी के बाद नकद, गाड़ी या संपत्ति की माँग
- दहेज न लाने पर ताने
- मायके से पैसे लाने का दबाव
- दहेज के कारण मारपीट
दहेज उत्पीड़न घरेलू हिंसा अधिनियम के साथ-साथ अन्य आपराधिक कानूनों के अंतर्गत भी दंडनीय है।
घरेलू हिंसा अधिनियम, 2005 का उद्देश्य
इस कानून के मुख्य उद्देश्य हैं:
- पीड़िता को तुरंत सुरक्षा देना
- उसे घर से निकाले जाने से बचाना
- आर्थिक रूप से सशक्त बनाना
- लंबी आपराधिक प्रक्रिया से बचाते हुए त्वरित राहत देना
यह कानून सिविल प्रकृति का है, यानी इसका उद्देश्य सज़ा से अधिक संरक्षण और पुनर्वास है।
घरेलू हिंसा की शिकायत कैसे करें?
112 पर कॉल
- आपात स्थिति में तुरंत पुलिस सहायता
महिला हेल्पलाइन – 1091
- महिलाओं के लिए विशेष सहायता
Protection Officer
- हर ज़िले में नियुक्त
- शिकायत दर्ज कराने और अदालत तक पहुँचाने में सहायता
थाने में शिकायत
- लिखित या मौखिक शिकायत
- मेडिकल रिपोर्ट अनिवार्य नहीं
पीड़िता की पहचान गोपनीय रखी जाती है।
अदालत से मिलने वाली कानूनी राहतें
अदालत निम्नलिखित आदेश दे सकती है:
Protection Order
- आरोपी को किसी भी प्रकार की हिंसा से रोक
- पीड़िता से संपर्क या पास आने पर प्रतिबंध
Residence Order
- महिला को साझा घर में रहने का अधिकार
- उसे घर से निकाला नहीं जा सकता
Maintenance (भरण-पोषण)
- मासिक खर्च
- बच्चों की पढ़ाई और देखभाल
- इलाज का खर्च
Compensation
- मानसिक, शारीरिक और भावनात्मक पीड़ा के लिए मुआवज़ा
क्या सिर्फ पत्नी ही शिकायत कर सकती है?
नहीं।
शिकायत कर सकती हैं:
- पत्नी
- लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाली महिला
- घरेलू संबंध में रहने वाली कोई भी महिला
आम सामाजिक गलतफहमियाँ
“घर का मामला है, बाहर नहीं जाना चाहिए”
घरेलू हिंसा अपराध है
“मारपीट नहीं हुई तो केस नहीं बनता”
मानसिक और आर्थिक हिंसा भी पर्याप्त है
“महिला को घर छोड़ना पड़ेगा”
कानून घर में रहने का अधिकार देता है
बच्चों पर घरेलू हिंसा का प्रभाव
घरेलू हिंसा केवल महिला तक सीमित नहीं रहती, इसका सीधा असर बच्चों पर भी पड़ता है:
- मानसिक आघात
- पढ़ाई पर असर
- डर और असुरक्षा
- भविष्य में हिंसक व्यवहार की संभावना
इसलिए घरेलू हिंसा रोकना पूरे परिवार के भविष्य की रक्षा है।
सामाजिक और कानूनी महत्व
घरेलू हिंसा अधिनियम:
- महिलाओं को आवाज़ देता है
- चुप्पी और डर को तोड़ता है
- समानता और गरिमा की रक्षा करता है
- समाज को अधिक न्यायपूर्ण बनाता है
निष्कर्ष: चुप्पी नहीं, क़ानून का साथ चुनें
घरेलू हिंसा कोई निजी या पारिवारिक मामला नहीं, बल्कि मानवाधिकार का उल्लंघन है।
कानून स्पष्ट करता है कि:
घर के अंदर होने वाला अत्याचार भी उतना ही गंभीर है, जितना बाहर होने वाला।
अगर आप या कोई परिचित घरेलू हिंसा का शिकार है:
- चुप न रहें
- मदद लें
- कानून आपके साथ है
डर नहीं, अधिकार चुनिए।
अन्याय नहीं, न्याय की राह अपनाइए।