‘कर्मयोद्धा’ कॉपीराइट मामला: स्क्रिप्ट लेखक को ₹30 लाख मुआवज़ा, लेखकत्व अधिकारों की न्यायिक पुष्टि
भूमिका
भारतीय फिल्म उद्योग में अक्सर यह बहस उठती रही है कि कहानी और पटकथा (Script) का वास्तविक मालिक कौन होता है—निर्देशक, निर्माता या लेखक? वर्षों तक पर्दे के पीछे रहने वाले लेखकों के अधिकारों को लेकर अस्पष्टता और शोषण के आरोप लगते रहे हैं। इसी पृष्ठभूमि में केरल के कोट्टायम स्थित वाणिज्यिक न्यायालय (Commercial Court) का हालिया निर्णय एक मील का पत्थर साबित हुआ है।
प्रसिद्ध मलयालम फिल्म ‘कर्मयोद्धा’ (Karmayodha) से जुड़े इस कॉपीराइट विवाद में न्यायालय ने मेजर रवि (निर्देशक) और फिल्म के निर्माता को कॉपीराइट उल्लंघन का दोषी ठहराते हुए स्क्रिप्ट लेखक रेजी मैथ्यू (Regi Mathew) को ₹30 लाख का मुआवज़ा देने का आदेश दिया है। साथ ही, अदालत ने यह भी स्पष्ट रूप से मान्यता दी कि फिल्म की कहानी और पटकथा के मूल लेखक रेजी मैथ्यू ही हैं।
यह फैसला न केवल एक व्यक्ति को न्याय देता है, बल्कि रचनात्मक लेखकों के अधिकारों की मजबूत न्यायिक स्वीकार्यता भी स्थापित करता है।
मामले की पृष्ठभूमि
फिल्म ‘कर्मयोद्धा’, जो एक एक्शन-थ्रिलर फिल्म है, को दर्शकों और आलोचकों दोनों से सराहना मिली थी। फिल्म का निर्देशन मेजर रवि ने किया था और यह एक बड़े बजट की व्यावसायिक फिल्म थी।
लेकिन फिल्म की रिलीज़ के बाद स्क्रिप्ट लेखक रेजी मैथ्यू ने यह आरोप लगाया कि—
- फिल्म की कहानी, पटकथा और मूल अवधारणा (Core Concept) उनकी रचना है,
- उन्होंने यह स्क्रिप्ट पहले ही लिखी थी और संबंधित पक्षों को सौंपी थी,
- इसके बावजूद फिल्म का निर्माण और प्रदर्शन उनकी अनुमति और श्रेय (Credit) के बिना किया गया,
- और उन्हें न तो उचित पारिश्रमिक दिया गया, न ही लेखक के रूप में मान्यता।
इन आरोपों के आधार पर रेजी मैथ्यू ने कॉपीराइट उल्लंघन (Copyright Infringement) का मुकदमा दायर किया।
मुख्य विधिक प्रश्न
कोट्टायम वाणिज्यिक न्यायालय के समक्ष मुख्य प्रश्न थे—
- क्या रेजी मैथ्यू ही ‘कर्मयोद्धा’ की कहानी और पटकथा के मूल लेखक हैं?
- क्या फिल्म का निर्माण और प्रदर्शन कॉपीराइट अधिनियम, 1957 का उल्लंघन है?
- यदि उल्लंघन हुआ है, तो लेखक को कितना और किस प्रकार का मुआवज़ा मिलना चाहिए?
न्यायालय का विस्तृत विश्लेषण
न्यायालय ने मामले में प्रस्तुत—
- मूल स्क्रिप्ट दस्तावेज़,
- लेखन की तारीखें,
- गवाहों के बयान,
- और फिल्म की पटकथा से तुलना
करते हुए यह पाया कि—
- फिल्म की कहानी और प्रमुख कथानक तत्व
- रेजी मैथ्यू द्वारा लिखी गई स्क्रिप्ट से
- काफी हद तक मेल खाते हैं,
और यह समानता सामान्य प्रेरणा (Inspiration) से कहीं आगे जाकर प्रत्यक्ष नकल (Substantial Copying) की श्रेणी में आती है।
लेखकत्व (Authorship) पर न्यायालय की स्पष्ट टिप्पणी
न्यायालय ने अपने फैसले में स्पष्ट कहा—
“कहानी और पटकथा का लेखक ही उस रचना का प्रथम स्वामी (First Owner of Copyright) होता है, जब तक कि इसके विपरीत कोई वैध अनुबंध न हो।”
अदालत ने यह भी कहा कि—
- केवल फिल्म का निर्देशन या निर्माण करने से
- लेखक के अधिकार स्वतः समाप्त नहीं हो जाते,
- और न ही लेखक को श्रेय से वंचित किया जा सकता है।
यह टिप्पणी भारतीय फिल्म उद्योग के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, जहाँ अक्सर लेखकों को हाशिए पर रखा जाता रहा है।
₹30 लाख मुआवज़े का आधार
कोर्ट ने मुआवज़े की राशि तय करते समय कई कारकों पर विचार किया—
- फिल्म की व्यावसायिक सफलता,
- लेखक को हुई आर्थिक और पेशेवर क्षति,
- लेखकत्व से वंचित किए जाने का प्रभाव,
- और कॉपीराइट उल्लंघन की गंभीरता।
इन सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए अदालत ने ₹30 लाख का मुआवज़ा न्यायसंगत और उचित माना।
मेजर रवि और निर्माता की जिम्मेदारी
न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि—
- निर्देशक और निर्माता दोनों
- कॉपीराइट उल्लंघन के लिए
- संयुक्त रूप से उत्तरदायी (Jointly Liable) हैं।
यह तर्क अस्वीकार कर दिया गया कि—
- निर्देशक केवल रचनात्मक भूमिका में था
- और निर्माता केवल वित्तीय भूमिका में।
अदालत ने कहा कि फिल्म निर्माण एक सामूहिक प्रक्रिया है, और यदि उसमें अवैध रूप से किसी की रचना का उपयोग किया जाता है, तो सभी प्रमुख निर्णयकर्ता जिम्मेदार होंगे।
कॉपीराइट अधिनियम, 1957 की भूमिका
यह निर्णय भारतीय कॉपीराइट अधिनियम, 1957 की मूल भावना को सुदृढ़ करता है, जिसके अनुसार—
- साहित्यिक कृतियों (Literary Works) में
- कहानी
- पटकथा
- संवाद
शामिल हैं,
- और इन पर लेखक का विशेष अधिकार होता है।
बिना अनुमति उपयोग, संशोधन या व्यावसायिक शोषण कानूनन अपराध है।
भारतीय फिल्म उद्योग पर प्रभाव
इस फैसले के दूरगामी प्रभाव होंगे—
- स्क्रिप्ट लेखकों को
- अपने अधिकारों के प्रति
- अधिक आत्मविश्वास मिलेगा,
- निर्माता और निर्देशक
- कानूनी अनुबंधों को
- अधिक गंभीरता से लेंगे,
- “बिना क्रेडिट के उपयोग” की
- प्रथा पर
- प्रभावी रोक लगेगी।
यह फैसला लेखकों के लिए एक संदेश है कि कानून उनके साथ खड़ा है।
रचनात्मक स्वतंत्रता बनाम कानूनी उत्तरदायित्व
अदालत ने यह भी संतुलन बनाया कि—
- रचनात्मक स्वतंत्रता महत्वपूर्ण है,
- लेकिन वह किसी अन्य की रचना के अधिकारों का हनन करके नहीं हो सकती।
प्रेरणा और नकल के बीच की रेखा को न्यायालय ने स्पष्ट रूप से परिभाषित किया।
आलोचनात्मक दृष्टिकोण
कुछ लोगों का मानना है कि—
- इस तरह के फैसले
- फिल्म निर्माण प्रक्रिया को
- जटिल बना सकते हैं।
लेकिन इसका उत्तर यह है कि—
- स्पष्ट अनुबंध और पारदर्शिता
- रचनात्मक उद्योग को
- अधिक पेशेवर और निष्पक्ष बनाएगी।
निष्कर्ष
‘कर्मयोद्धा’ कॉपीराइट मामले में कोट्टायम वाणिज्यिक न्यायालय का निर्णय भारतीय रचनात्मक उद्योग में लेखकों के अधिकारों की ऐतिहासिक पुष्टि है।
₹30 लाख का मुआवज़ा केवल आर्थिक राहत नहीं, बल्कि यह एक सशक्त संदेश है कि—
कहानी लिखने वाला ही उसका वास्तविक स्वामी होता है, और उसकी अनुमति के बिना उस रचना का उपयोग कानूनन अस्वीकार्य है।
यह फैसला भविष्य में लेखकों, पटकथा लेखकों और अन्य रचनाकारों के लिए एक मजबूत कानूनी ढाल बनेगा और भारतीय सिनेमा को अधिक न्यायपूर्ण और उत्तरदायी दिशा में आगे बढ़ाएगा।