कंपनी अधिनियम के तहत निजी धोखाधड़ी शिकायतों पर सुप्रीम कोर्ट की रोक SFIO को ही अभियोजन का अधिकार, NCLT के रास्ते खुले
प्रस्तावना
कॉर्पोरेट दुनिया में धोखाधड़ी के आरोप आज आम हो चुके हैं। शेयरधारकों, निवेशकों, लेनदारों और प्रतिस्पर्धियों के बीच अक्सर कंपनियों पर ‘फ्रॉड’ के आरोप लगाए जाते हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या कोई भी व्यक्ति सीधे अदालत में जाकर कंपनी या उसके निदेशकों के खिलाफ धोखाधड़ी की आपराधिक शिकायत दर्ज करा सकता है?
इसी महत्वपूर्ण प्रश्न पर सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक ऐतिहासिक और दूरगामी प्रभाव वाला फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि कंपनी अधिनियम, 2013 के तहत धोखाधड़ी (Fraud) के मामलों में निजी व्यक्ति सीधे आपराधिक मुकदमा शुरू नहीं कर सकता। ऐसे मामलों में केवल SFIO (Serious Fraud Investigation Office) ही अभियोजन की प्रक्रिया शुरू कर सकता है।
यह फैसला न केवल कानूनी दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि इसका असर कॉर्पोरेट प्रशासन, निवेश माहौल और व्यापारिक स्थिरता पर भी पड़ेगा।
कंपनी अधिनियम में धोखाधड़ी की कानूनी संरचना
कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 447 धोखाधड़ी को परिभाषित करती है। इसके अंतर्गत यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर किसी को आर्थिक हानि पहुँचाने के उद्देश्य से गलत प्रस्तुतीकरण, छल, कूटनीति या दुराचार करता है, तो उसे कठोर कारावास और भारी जुर्माने की सजा दी जा सकती है।
वहीं धारा 212 SFIO को गंभीर धोखाधड़ी की जांच करने का विशेष अधिकार देती है।
धारा 212(6) के अनुसार, SFIO की रिपोर्ट और केंद्र सरकार की अनुमति के बिना कोई भी अदालत ऐसे अपराधों का संज्ञान नहीं ले सकती।
विवाद की पृष्ठभूमि
कई मामलों में देखा गया कि निजी व्यक्ति या निवेशक मजिस्ट्रेट के समक्ष जाकर सीधे कंपनी निदेशकों के खिलाफ धारा 447 के तहत आपराधिक शिकायतें दाखिल कर रहे थे। इससे निदेशकों को गिरफ्तारी का खतरा, व्यापारिक छवि को नुकसान और कंपनी संचालन में बाधा उत्पन्न हो रही थी।
इसी पृष्ठभूमि में यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुँचा, जहाँ प्रश्न यह था —
“क्या कंपनी अधिनियम के तहत धोखाधड़ी के मामलों में निजी शिकायत स्वीकार की जा सकती है?”
सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट उत्तर
सुप्रीम कोर्ट ने दो टूक शब्दों में कहा —
कंपनी अधिनियम के तहत धोखाधड़ी एक विशेष श्रेणी का अपराध है, जिसकी जांच और अभियोजन केवल विधि द्वारा अधिकृत एजेंसी के माध्यम से ही हो सकता है।
कोर्ट ने माना कि:
- निजी शिकायतें स्वीकार करना कानून की संरचना को कमजोर करेगा।
- इससे व्यापारिक प्रतिस्पर्धा को आपराधिक हथियार बना दिया जाएगा।
- यह निवेश माहौल को अस्थिर करेगा।
केवल SFIO को अभियोजन का अधिकार
कोर्ट ने कहा कि:
- धोखाधड़ी के मामलों में तकनीकी, वित्तीय और लेखा विशेषज्ञता की आवश्यकता होती है।
- सामान्य पुलिस या निजी व्यक्ति इन मामलों की निष्पक्ष जांच करने में सक्षम नहीं होते।
- इसलिए संसद ने जानबूझकर SFIO को यह विशेष अधिकार सौंपा है।
अतः जब तक:
- SFIO जांच न करे,
- रिपोर्ट सरकार को न दे,
- और सरकार अभियोजन की अनुमति न दे,
तब तक कोई अदालत संज्ञान नहीं ले सकती।
निजी शिकायतों पर रोक का उद्देश्य
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि निजी शिकायतों पर रोक लगाने का उद्देश्य यह नहीं है कि पीड़ित को न्याय न मिले, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि:
- झूठे आरोपों से कंपनियों को नुकसान न पहुँचे,
- निदेशकों को अनावश्यक आपराधिक मुकदमों में न घसीटा जाए,
- और कानून का दुरुपयोग रोका जाए।
NCLT का रास्ता अब भी खुला
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह फैसला निजी व्यक्तियों के अधिकारों को समाप्त नहीं करता।
यदि किसी शेयरधारक या निवेशक को लगता है कि कंपनी में:
- दमन (Oppression)
- कुप्रबंधन (Mismanagement)
- धोखाधड़ीपूर्ण संचालन
- या अधिकारों का उल्लंघन
हो रहा है, तो वह NCLT में याचिका दायर कर सकता है।
NCLT के पास अधिकार है कि वह:
- निदेशकों को हटाए,
- कंपनी संचालन पर रोक लगाए,
- मुआवजा दिलाए,
- संपत्तियों की कुर्की कराए,
- और कंपनी के ढांचे में सुधार करे।
कॉर्पोरेट जगत पर प्रभाव
1. व्यापारिक स्थिरता
अब कंपनियों को यह डर नहीं रहेगा कि कोई भी व्यक्ति झूठी शिकायत से उन्हें आपराधिक मुकदमे में फंसा देगा।
2. निवेशकों का भरोसा
विदेशी और घरेलू निवेशकों को यह भरोसा मिलेगा कि भारत में कानून निष्पक्ष और संतुलित है।
3. ब्लैकमेलिंग पर लगाम
अब निजी शिकायतों के जरिए ब्लैकमेलिंग का चलन काफी हद तक रुकेगा।
आलोचना के स्वर
कुछ कानूनी विशेषज्ञों और सामाजिक संगठनों का मानना है कि:
- इससे छोटे निवेशकों की पहुंच सीमित हो सकती है।
- SFIO तक पहुंचना आसान नहीं होता।
- सरकार की अनुमति प्रक्रिया में देरी हो सकती है।
हालांकि कोर्ट ने कहा कि प्रक्रिया में देरी कानून को गलत नहीं बनाती।
अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण
अमेरिका, ब्रिटेन और यूरोप जैसे देशों में भी कॉर्पोरेट धोखाधड़ी की जांच विशेष एजेंसियों द्वारा ही की जाती है। भारत का यह फैसला वैश्विक कॉर्पोरेट न्याय प्रणाली के अनुरूप माना जा रहा है।
कानूनी संतुलन का उदाहरण
यह फैसला दिखाता है कि:
- कानून निवेशकों के हितों की रक्षा भी करता है,
- और व्यापारिक स्वतंत्रता को भी संतुलित रखता है।
यह न तो कंपनियों को खुली छूट देता है, न ही निजी शिकायतों के जरिए अराजकता फैलने देता है।
निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय भारतीय कॉर्पोरेट कानून में एक मील का पत्थर है। यह फैसला बताता है कि धोखाधड़ी जैसे गंभीर आरोप भावनाओं या व्यक्तिगत रंजिश के आधार पर नहीं, बल्कि संस्थागत जांच और विधिक प्रक्रिया के तहत ही तय किए जाएंगे।
यह फैसला संदेश देता है —
“न्याय केवल अधिकार नहीं, प्रक्रिया भी है।”
अब भारत का कॉर्पोरेट न्याय तंत्र अधिक संतुलित, परिपक्व और विश्वसनीय दिखाई देता है।