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उच्च शिक्षा में समानता का नया अध्याय: UGC 2026 नियम और विवाद

उच्च शिक्षा में समानता का नया अध्याय: UGC 2026 नियम और विवाद

       जनवरी 2026 में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) ने “Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations, 2026” (उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने संबंधी विनियम, 2026) जारी किए। इन नियमों का उद्देश्य जाति-आधारित भेदभाव, लिंग, धर्म, स्थान और विकलांगता के कारण उत्पीड़न को रोकना और हर उच्च शिक्षण संस्थान में समान अवसर और समावेशन सुनिश्चित करना था। नए विनियम में Equal Opportunity Centres, Equity Committees, 24×7 हेल्पलाइन और शिकायत निवारण तंत्र जैसी व्यवस्था शामिल की गई।

       लेकिन सूचना मिलने पर कि नियम UGC Act, 1956 के भीतर कुछ प्रावधानों को नया कानूनी ढांचा देता है, विवाद भी तेज़ी से उभरा। इन विनियमों में से एक — नियम 3(c) — को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देकर कहा गया है कि यह “गैर-समावेशी (non-inclusionary)” है और संविधान के अनुच्छेद 14, 15(1) और 21 के खिलाफ है।


नियम 3(c): विवाद का केंद्र

       नए UGC विनियम के अंतर्गत Regulation 3(c) ने “जाति-आधारित भेदभाव (caste-based discrimination)” को परिभाषित किया है। विवादित हिस्सा यह है कि विनियमन भेदभाव की सुरक्षा केवल कुछ श्रेणियों के लिए प्रदान करता है — मुख्यतः अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST), और अन्य पिछड़े वर्ग (OBC) के छात्रों और शिक्षकों को। याचिका दायर करने वालों का दावा है कि:

  • नियम की परिभाषा केवल इन आरक्षित श्रेणियों को कवर करती है,
  • “सामान्य” या नॉन-आरक्षित श्रेणी के छात्र/शिक्षक जो जाति-आधारित उत्पीड़न का शिकार हो रहे हैं उन्हें सुरक्षा नहीं मिल पा रही,
  • इससे संवैधानिक समानता और जांच-समस्याओं में भेद हो रहा है।

       याचिका में कहा गया है कि जाति-आधारित भेदभाव का दायरा केवल SC/ST/OBC तक सीमित करना एक तरह से “संरक्षण में पदानुक्रम” बनाता है, जो अनुच्छेद 14 के तहत “समानता के अधिकार” तथा अनुच्छेद 15 के तहत “भेदभाव निषेध” के सिद्धांतों के विपरीत है। इसके अलावा, यह Article 21 (आत्मिक मर्यादा और स्वाभाविक जीवन का अधिकार) का भी उल्लंघन करता है क्योंकि भेदभाव-पीड़ित व्यक्ति को संस्थागत सहायता तंत्र (Equal Opportunity Centre, Ombudsperson) तक पहुँच नहीं मिल पा रही।


सुप्रीम कोर्ट में चुनौती: मुख्य दावे और राहत की मांग

याचिका, जिसे अधिवक्ता विनीत जिंदल द्वारा दायर किया गया बताया गया है, सुप्रीम कोर्ट से नियम 3(c) के मौजूदा स्वरूप को लागू होने से रोकने की मांग करती है। इस याचिका में आग्रह किया गया है कि:

  • जब तक नियम की परिभाषा “जाति-तटस्थ (caste-neutral)” और संवैधानिक रूप से स्वीकार्य रूप में पुनर्परिभाषित नहीं हो जाती, तब तक इसे लागू न किया जाए।
  • Equal Opportunity Centres, Equity Helplines और Ombudsperson mechanisms सभी छात्रों और कर्मचारियों के लिए निष्पक्ष-तटस्थ तरीके से उपलब्ध कराए जाएँ, जबकि नियम की समीक्षा चल रही हो।

याचिका का तर्क है कि वर्तमान विनियमन “निहित रूप से संविधान-शत्रु” है, क्योंकि यह कुछ समूहों को संरक्षित करता है और अन्य को संस्थागत संरचना से बाहर रखता है, जिससे उच्च शिक्षा में समान अवसर का लक्ष्य अधूरा रह जाता है।


समर्थन और विरोध — शिक्षा, राजनीति और सामाजिक प्रतिक्रिया

यद्यपि UGC और सरकार का कहना है कि ये नियम उच्च शिक्षा में समावेशन (inclusion) को मजबूती से लागू करने के लिए हैं, आलोचना भी व्यापक रूप ले रही है:

  • कुछ छात्रों, शिक्षकों और सामाजिक समूहों ने विरोध प्रदर्शनों का आयोजन किया है, यह दावा करते हुए कि नियम गैर-आरक्षित श्रेणी के छात्रों के हितों को कमजोर कर सकते हैं
  • विरोध के अनुभवों में यह भी शामिल है कि सामान्य श्रेणी के छात्रों और शिक्षक संगठनों ने नियम 3(c) को “पक्षपाती” बताया और न्यायालय से संरक्षण की मांग की है।
  • विरोध केवल याचिका तक सीमित नहीं है; कई स्थानों पर छात्र और सामाजिक समूह UGC के समग्र दृष्टिकोण पर व्यापक सार्वजनिक बहस भी कर रहे हैं।

इसके विपरीत, सरकार और शिक्षा मंत्री ने भी इन नियमों का कानूनी पक्ष और उद्देश्य स्पष्ट किया है। केंद्रीय शिक्षा मंत्री ने कहा है कि विनियमों का उद्देश्य “भेदभाव को रोकना और उनमें किसी भी तरह के दुरुपयोग को रोकने के स्पष्ट उपाय सुनिश्चित करना है।” उन्होंने यह भी कहा कि कोई भी नियम गलत इस्तेमाल या अन्याय का कारण नहीं बनेगा


संवैधानिक विचार — अनुच्छेद 14, 15 और 21 का संतुलन

इस विवाद के संवैधानिक आधार को समझने के लिए यह आवश्यक है कि हम भारत के मौलिक अधिकारों की भावना को देखें:

अनुच्छेद 14 — समानता का अधिकार

यह अधिकार सभी नागरिकों को विधि के सम्मुख बराबरी प्रदान करता है। लागू नियम में यदि कुछ समूहों को संरक्षण मिलेगा और अन्य को नहीं, तो यह “समान संरक्षण के सिद्धांत” पर प्रश्न उठा सकता है।

अनुच्छेद 15 — भेदभाव निषेध

राज्य किसी भी नागरिक के साथ धर्म, जाति, लिंग आदि के आधार पर भेदभाव नहीं कर सकता। यदि किसी को भेदभाव का शिकार मानते हुए भी संरक्षण से बाहर रखा जाता है, तो यह अनुच्छेद 15 के सिद्धांत के विपरीत माना जा सकता है।

अनुच्छेद 21 — जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार

यह व्यापक अधिकार “जीवन के अर्थ” में सामाजिक सम्मान और आत्म-सम्वर्द्धन शामिल करता है। कोई भी नीतिगत ढांचा जो किसी व्यक्ति के सम्मान या गरिमा को प्रभावित करता है, वह अनुच्छेद 21 के दायरे में भी आता है।


समावेशन और समता: शिक्षा नीति और स्पष्टता की जरूरत

इस विवाद को केवल मुकदमा के रूप में नहीं देखा जा सकता; यह भारत की उच्च शिक्षा नीति का एक बड़ा दर्शनात्मक प्रश्न भी पूछता है:

  • क्या “समानता” का लक्ष्य केवल विशेष समूहों को संरक्षित करना है?
  • या क्या सभी को बिना भेदभाव के सुरक्षा और न्याय मिलने चाहिए?
  • क्या संवैधानिक मूल्यों को केवल कई वर्षों के संघर्ष ने ही स्थापित किया है?

ये प्रश्न नीति-निर्माताओं, न्यायपालिका और शैक्षणिक समुदाय के सामने अब खुलकर आए हैं।


निष्कर्ष: संविधान बनाम नियमन — कहाँ रेखा तय होगी?

UGC Regulation 2026 के तहत जारी Regulation 3(c) पर सुप्रीम कोर्ट में उठाई गई चुनौती अब उच्च शिक्षा में समानता और समावेशन की परिभाषा को संविधान के साथ संतुलित करने का मामला बन चुकी है। यह विवाद न केवल नियम की शब्दावली तक सीमित है, बल्कि भारत में लोकतांत्रिक न्याय, सामाजिक न्याय और शिक्षा के अधिकार के मूल सिद्धांतों से जुड़ा है।

आगे की सुनवाई इस बात को स्पष्ट करेगी कि क्या समावेशन की दृष्टि में “जाति-तटस्थ” सुरक्षा को संवैधानिक रूप से लागू किया जाना चाहिए, या क्या आगामी नियम संविधान की व्यापक समता-केन्द्रित धारा को अपनाने में विफल रहेंगे — एक निर्णय जिसका प्रभाव सभी केंद्र और राज्य विश्वविद्यालयों एवं कॉलेजों पर पड़ेगा।